Amit Shah In Parliament: ‘ये सदन है, कोई मेला नहीं’.. स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को लेकर विपक्ष पर भड़के अमित शाह, लोकसभा में जमकर सुनाई खरी-खोटी
'ये सदन है, कोई मेला नहीं'.. स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को लेकर विपक्ष पर भड़के अमित शाह, Amit Shah in Parliament on no-confidence motion
नई दिल्लीः Amit Shah In Parliament: लोकसभा स्पीकर के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर आधारित चर्चा में बुधवार को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने कहा कि आज इस महान सदन में लोकसभा स्पीकर के सामने जो अविश्वास प्रस्ताव आया है, इस पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए खड़ा हूं। ये कोई सामान्य घटना नहीं है। करीब 4 दशक बाद स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया है। संसदीय राजनीति और इस सदन, दोनों के लिए यह अफसोस की बात है। स्पीकर किसी दल के नहीं होते। सदन के होते हैं। सदन के सभी सदस्यों के अधिकारों के संरक्षक होते हैं।
शाह ने कहा- चर्चा के लिए 10 घंटे तय हुए थे, 13 घंटे चर्चा चली
अमित शाह ने कहा, चर्चा के लिए 10 घंटे तय हुए थे। फिर भी 13 घंटे चर्चा चली। 42 सांसदों ने इसमें हिस्सा लिया। मैं पूरे सदन को बताना चाहता हूं कि स्पीकर की जब नियुक्ति हुई, तब दोनों दलों के नेता ने एक साथ उन्हें आसन पर बैठाया था। इसका मतलब है कि स्पीकर के उनके दायित्वों के निर्वहन के लिए पक्ष और विपक्ष को उनका समर्थन करना है। इस दौरान विपक्ष के सांसद हंगामा करने लगे। अमित शाह ने कहा- आज विपक्ष ने स्पीकर की निष्ठा पर सवाल खड़ा किया है। लोकसभा भारत के लोकतंत्र की सबसे बड़ी पंचायत है। पूरी दुनिया इस लोकतंत्र की प्रतिष्ठा को स्वीकार करती है। आमतौर पर स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव नहीं आता है। चैंबर में बात हो सकती है। दिक्कतें दूर की जाती हैं, लेकिन यहां चैंबर में जाकर उनकी सुरक्षा को खतरा पहुंचाते हैं।
शाह ने कहा- ये सदन कोई मेला नहीं, इसके नियमों के अनुसार चलना होता है
अमित शाह ने कहा कि सदन आपसी विश्वास से चलता है। पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए स्पीकर मध्यस्थता करवाते हैं। ये सदन कोई मेला नहीं है। इसके नियमों के अनुसार चलना पड़ता है। जब आप सदन के नियमों को नजरअंदाज करोगे, तो स्पीकर का दायित्व है कि इसे रोके और टोके। ये अधिकार ये नियम हमने नहीं बनाए। ये नेहरू के समय में बने हैं। अधिकारों के संरक्षण के लिए हम सहमत हैं लेकिन नियमों का क्या। सबको नियमों के अनुसार बोलना पड़ेगा, चाहे वह कोई भी हो। मतभेद तो सभी सदस्यों के हो सकते हैं, लेकिन स्पीकर के फैसलों पर शक नहीं कर सकते। कभी हमें अनुकूल नहीं लगेगा, कभी विपक्ष को अनुकूल नहीं लगेगा। लेकिन स्पीकर की निष्ठा पर सवाल उठाना घोर निंदनीय है। जिसको मध्यस्थता करनी है, उसकी निष्ठा पर आप सवाल करते हो। ये बहुत अफसोस की बात है।
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