तालिबान शासन में अफगान महिला शिक्षाविदों का भविष्य अंधकारमय

तालिबान शासन में अफगान महिला शिक्षाविदों का भविष्य अंधकारमय

तालिबान शासन में अफगान महिला शिक्षाविदों का भविष्य अंधकारमय
Modified Date: June 2, 2026 / 03:07 pm IST
Published Date: June 2, 2026 3:07 pm IST

( शाहिरा शाहिर एवं शियोनी रेन – कार्डिफ मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी, शाइस्ता नूर – टीसाइड यूनिवर्सिटी )

लंदन, दो जून (द कन्वरसेशन) कल्पना कीजिए कि आपने अपना करियर बनाने में दशकों लगा दिए हैं। आपके पास मास्टर डिग्री है। आपने सैकड़ों विद्यार्थियों को पढ़ाया है। आप हर सुबह उद्देश्य और उत्साह के साथ अपने कार्यस्थल पहुंचती हैं। फिर रातोंरात आपके लिए संस्थान के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। आपको बता दिया जाता है कि अब आप वापस नहीं आ सकतीं।

ऐसा किसी गलती की वजह से नहीं हुआ, बल्कि इसलिए हुआ क्योंकि आप एक महिला हैं। अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद पूरे अफगानिस्तान में महिला शिक्षाविदों के साथ यही हुआ।

हमने टेलीग्राम और व्हाट्सएप के माध्यम से 12 अफगान महिला शिक्षाविदों से बातचीत की। इनमें से आठ उस समय अफगानिस्तान में थीं, जबकि चार हाल ही में देश छोड़ चुकी थीं।

जो महिलाएं अफगानिस्तान में थीं, उनमें से केवल एक ही बाद में देश छोड़ने में सफल हुई। बाकी सभी अब भी वहीं हैं। उन्होंने जो कुछ हमें बताया, वह बेहद पीड़ादायक था।

जब तालिबान ने 1996 से 2001 के बीच पहली बार अफगानिस्तान पर शासन किया था, तब महिलाओं को शिक्षा और कई प्रकार के रोजगार से वंचित कर दिया गया था।

अमेरिका के नेतृत्व वाले हस्तक्षेप के बाद स्थिति धीरे-धीरे सुधरी। अफगानिस्तान में उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। वर्ष 2001 में जहां केवल 5,000 छात्राएं थीं, वहीं 2021 तक उनकी संख्या बढ़कर एक लाख से अधिक हो गई। विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों में महिलाओं की हिस्सेदारी 28 प्रतिशत और शिक्षकों में 14 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। यह प्रगति वास्तविक थी, भले ही वह नाजुक थी। लेकिन बाद में यह लगभग पूरी तरह पलट गई।

दिसंबर 2022 तक सभी विश्वविद्यालयों ने महिलाओं के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए। लड़कियों की शिक्षा 12 वर्ष की आयु के बाद प्रतिबंधित कर दी गई। महिलाओं को अधिकांश नौकरियों से बाहर कर दिया गया, यात्रा के लिए पुरुष अभिभावक की अनिवार्यता लागू कर दी गई और सार्वजनिक स्थानों पर काला हिजाब पहनना अनिवार्य बना दिया गया।

मानव विकास सूचकांक में अफगानिस्तान अब 193 देशों में 181वें स्थान पर है।

हमने जिन महिलाओं से बात की, उन्होंने अपनी स्थिति को राजनीतिक या सैद्धांतिक शब्दों में नहीं, बल्कि बेहद व्यक्तिगत अनुभवों के रूप में बयान किया।

बीस वर्ष से अधिक का अध्यापन अनुभव रखने वाली एक महिला व्याख्याता ने कहा, ‘‘तालिबान के शासन में एक महिला के रूप में जीना धीरे-धीरे मरने जैसा है। मुझे लगता है कि मैं हर दिन मर रही हूं। मैंने सब कुछ खो दिया है। अब न मेरे ज्ञान की कोई कीमत है और न ही मेरी शिक्षा की।’’

तीन दशक तक पढ़ाने वाली एक अन्य शिक्षिका ने कहा कि उनके जीवन के सबसे सुखद क्षण कक्षा में बीते थे।

उन्होंने कहा, ‘‘मुझे घर से बाहर जाना, पढ़ाना और अपने विद्यार्थियों से मिलना पसंद है। यह स्थिति मेरे लिए तिल-तिल मरने जैसी है।

ये केवल दुख की अभिव्यक्तियां नहीं हैं। हमारी 12 प्रतिभागियों में से 10 ने गंभीर मानसिक तनाव का अनुभव बताया। सभी 12 महिलाओं ने निराशा और हताशा की भावना व्यक्त की। एक महिला ने कहा कि उसने अपनी पूरी पहचान ही खो दी।

उसने कहा, ‘‘मैंने अपनी नौकरी, पद, सम्मान, विश्वसनीयता और समाज में अपनी पहचान सब कुछ खो दिया है।’’

कहीं भी नौकरी खोना कठिन होता है और अक्सर इससे परिवार की आय आधी रह जाती है। लेकिन अफगानिस्तान में इसके परिणाम केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं हैं।

एक प्रतिभागी ने कहा, ‘‘समाज में महिलाओं की मौजूदगी कम हो गई है और उनके सामाजिक संबंध तथा समाज के साथ संपर्क लगभग समाप्त हो गए हैं।’’

तालिबान ने ऑनलाइन शिक्षा पर भी प्रतिबंध लगा दिया। दूरस्थ शिक्षा प्रदान करने वाले निजी विश्वविद्यालयों को भी इसे बंद करने का आदेश दिया गया। जिन शिक्षाविदों को उम्मीद थी कि वे डिजिटल माध्यम से पढ़ाना जारी रख सकेंगी, उनके लिए यह रास्ता भी बंद हो गया।

अपने शोध में हमने अफगानिस्तान की महिला शिक्षाविदों के अनुभवों का विश्लेषण ‘इस्लामिक नारीवाद’ के दृष्टिकोण से किया।

शोधकर्ता 1990 के दशक से मुस्लिम समाजों में लैंगिक असमानता के कारणों को समझने का प्रयास कर रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप ‘इस्लामिक नारीवाद’ की अवधारणा विकसित हुई। यह एक ऐसा आंदोलन है जो इस्लामी ढांचे के भीतर महिलाओं के अधिकारों और लैंगिक समानता का समर्थन करता है।

चूंकि अफगानिस्तान एक मुस्लिम देश है, इसलिए यह दृष्टिकोण वहां लैंगिक न्याय के लिए एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है। यह न केवल धार्मिक पितृसत्तात्मक व्याख्याओं को चुनौती देता है, बल्कि पश्चिमी नारीवादी दृष्टिकोणों से भी अलग है, जिन्हें अक्सर स्थानीय संस्कृति से असंगत माना जाता है।

कुछ लोगों को यह अजीब लग सकता है कि जब तालिबान स्वयं इस्लामी कानून लागू करने का दावा करता है, तब इस्लामी ढांचे के भीतर नारीवाद की चर्चा क्यों की जाए। लेकिन यही इस बहस का मूल बिंदु है।

इस्लामिक नारीवाद के विद्वानों के तर्कों के आधार पर कहा जा सकता है कि महिलाओं पर तालिबान द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का वास्तविक इस्लामी शिक्षाओं से कोई संबंध नहीं है। इसके बजाय ये राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करने का माध्यम हैं।

इन विद्वानों का मानना है कि कुरान में महिलाओं के शिक्षा प्राप्त करने, आर्थिक गतिविधियों में भाग लेने और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहने के अधिकार का समर्थन किया गया है। इसलिए महिलाओं पर लगाए गए प्रतिबंधों को धार्मिक ग्रंथों की गलत व्याख्या के रूप में देखा जा सकता है, जिसका उद्देश्य पितृसत्तात्मक सत्ता को बनाए रखना है।

इस्लामिक नारीवाद का मूल तर्क यही है कि समस्या इस्लाम नहीं है, बल्कि कुछ पुरुषों द्वारा अपने हितों की पूर्ति के लिए की गई उसकी व्याख्या है।

अफगान महिलाओं के लिए यह दृष्टिकोण अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह उन्हें अपने ही धर्म और सांस्कृतिक परंपरा के भीतर रहते हुए विरोध और प्रतिरोध का एक ऐसा आधार देता है, जो उनके लिए स्वाभाविक और प्रामाणिक महसूस होता है।

हमने जिन महिलाओं से बात की, उन्होंने हार नहीं मानी है। कुछ महिलाएं चुपचाप पढ़ाने के रास्ते खोज रही हैं। कुछ सामाजिक मीडिया के माध्यम से जुड़े रहने की कोशिश कर रही हैं। कुछ को उम्मीद है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव अंततः बदलाव लाएगा।

एक प्रतिभागी ने कहा, ‘‘ऐसा लगता है कि हम एक चौराहे पर खड़े हैं और आसपास अंधेरा है। एक रास्ता पक्का है, दूसरा कीचड़ भरा है और एक में गड्ढे हैं। हम किसी भी रास्ते को स्पष्ट रूप से नहीं देख पा रहे। सभी रास्ते अंधेरे और अनिश्चित हैं। इसलिए मैं कोई निश्चित योजना नहीं बना सकती क्योंकि भविष्य पूरी तरह अप्रत्याशित है।’’

अंतरराष्ट्रीय समुदाय वैकल्पिक शिक्षा कार्यक्रमों को वित्तीय सहायता देकर, निर्वासन में रह रही अफगान महिलाओं का समर्थन करके तथा तालिबान पर लगातार दबाव बनाए रखकर उनकी मदद कर सकता है।

(द कन्वरसेशन) मनीषा अविनाश

अविनाश


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