वीडियो गेम्स का विरोधाभास: हिंसा के महिमामंडन के बीच नैतिक चेतना का उभार

वीडियो गेम्स का विरोधाभास: हिंसा के महिमामंडन के बीच नैतिक चेतना का उभार

वीडियो गेम्स का विरोधाभास: हिंसा के महिमामंडन के बीच नैतिक चेतना का उभार
Modified Date: April 27, 2026 / 12:58 pm IST
Published Date: April 27, 2026 12:58 pm IST

( इमैनिएुल पेटिट, बोरदू यूनिवर्सिटी )

बोरदू (फ्रांस), 27 अप्रैल (द कन्वरसेशन) 1970 के दशक के शुरुआती हिंसक वीडियो गेम के बाद से इनके प्रभाव को लेकर बहस लगातार विभाजनकारी रही है—क्या ये बच्चों को बिगाड़ते हैं या शिक्षित करते हैं? हमारे शोध के अनुसार, असली मुद्दा केवल हिंसा नहीं, बल्कि यह है कि गेम अपने डिजाइन और कथानक के जरिए खिलाड़ियों में, उदासीनता से लेकर नैतिक जागरूकता तक, किस तरह की भावनाएं पैदा करते हैं।

पांच फरवरी 2026 को एक साक्षात्कार के दौरान फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि समाज में युवाओं के बीच बढ़ती हिंसा का एक कारण यह भी है कि बच्चे और किशोर वीडियो के माध्यम से हिंसा के अधिक संपर्क में हैं। उन्होंने कहा कि ‘फोर्टनाइट’ सहित अन्य वीडियो गेम वास्तविक जीवन नहीं हैं, क्योंकि वे हिंसा के प्रति दृष्टिकोण को विकृत करते हैं।

हालांकि, हाल में चर्चित गेम ‘क्लेयर ऑब्सकर : एक्सपेडिशन 33’ जिसे 2025 के गेम अवॉर्ड्स और पेगासेस अवॉर्ड्स में उसकी कथा और नैतिक दुविधाओं के लिए सराहा गया, यह दिखाता है कि वीडियो गेम गहन चिंतन का माध्यम भी बन सकते हैं। यह गेम इस बात का उदाहरण है कि कैसे खेल मनोरंजन से आगे बढ़कर जटिल भावनाओं को जन्म दे सकता है।

राष्ट्रपति मैक्रों की टिप्पणी के बाद गेमर्स ने नाराजगी जताई और इससे यह बहस फिर तेज हो गई कि क्या हिंसक गेम युवाओं के व्यवहार को प्रभावित करते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि सभी गेम को एक जैसा नहीं माना जा सकता और कुछ उपयोगी एवं सकारात्मक भी होते हैं।

अर्थशास्त्री एग्ने सुजिएडेलिटे के शोध के अनुसार, नए हिंसक गेम के आने के बाद बच्चों द्वारा की जाने वाली हिंसा में वृद्धि का ठोस प्रमाण मिलना मुश्किल है। ऐसे में नाबालिगों को गेम की बिक्री पर प्रतिबंध जैसी नीतियां हिंसा कम करने में प्रभावी नहीं हो सकतीं।

जब मनोरंजन नैतिकता पर हावी हो जाता है

वीडियो गेम मूल रूप से नियमों और गेमप्ले का संयोजन होते हैं, जिनका उद्देश्य खिलाड़ी को आकर्षित रखना है। डिजाइनर इस संतुलन को बनाए रखते हैं कि खिलाड़ी को चुनौती भी मिले और आनंद भी।

कई युद्ध-आधारित गेम—जैसे ‘कॉल ऑफ ड्यूटी’, ‘काउंटर स्ट्राइक’, ‘बैटलफील्ड’, ‘हलो’ और ‘रैनबो सिक्स’ हिंसा को इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि युद्ध की वास्तविकता धुंधली हो जाती है। इनमें अक्सर दुश्मनों को अमानवीय दिखाया जाता है, पीड़ितों को अदृश्य बना दिया जाता है और युद्ध के दुष्परिणामों को छिपा लिया जाता है। इससे हिंसा सामान्य लगने लगती है और सहानुभूति कम हो सकती है।

नैतिक दुविधा और गेम्स

कुछ गेम खिलाड़ी को नैतिक विकल्पों के सामने खड़ा करते हैं। उदाहरण के लिए ‘पेपर्स’ और ‘प्लीज’ में खिलाड़ी को अपने हित और दूसरों की मदद के बीच चुनाव करना पड़ता है, जबकि ‘अनटिल डॉन’ में किसी पात्र को बचाने या बलिदान करने का निर्णय लेना होता है।

इसी तरह, ‘कॉल ऑफ ड्यूटी : मॉडर्न वारफेयर’ के एक संस्करण में खिलाड़ी एक सैनिक नहीं, बल्कि एक घायल बच्चे की भूमिका निभाता है, जिससे युद्ध में आम नागरिकों की पीड़ा का अनुभव कराया जाता है।

कुछ गेम्स—जैसे ‘स्पेस ऑप्स : द लाइन’ और ‘दिस वार ऑफ माइन’ युद्ध विरोधी माने जाते हैं, क्योंकि वे युद्ध के महिमामंडन के बजाय उसकी मानवीय त्रासदी को सामने लाते हैं। ये गेम खिलाड़ी को असहज अनुभव कराते हैं और हिंसा का समर्थन नहीं करते।

डिजाइन और नैतिक संवेदनशीलता

शोध के अनुसार, वीडियो गेम में हिंसा का प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उसे कैसे प्रस्तुत किया गया है। यदि गेम केवल हिंसा को प्रोत्साहित करते हैं, तो खिलाड़ी उसमें उदासीन हो सकता है। लेकिन यदि गेम इस तरह का हो कि खिलाड़ी भावनात्मक रूप से जुड़ सके, तो वह नैतिक निष्कर्ष भी निकाल सकता है।

कुछ गेम जानबूझकर असहज परिस्थितियां पैदा करते हैं—जैसे युद्ध में बच्चों की मौजूदगी—ताकि खिलाड़ी में सहानुभूति और नैतिक प्रतिक्रिया उत्पन्न हो।

अंततः, वीडियो गेम में हिंसा का प्रभाव संयोग नहीं है, बल्कि यह उनके डिजाइन, कथा, पात्रों की प्रस्तुति और नैतिक दुविधाओं की गहराई पर निर्भर करता है। यही पहलू गेम डिजाइनर की जिम्मेदारी को भी रेखांकित करता है, जो अपने बनाए कंटेंट के माध्यम से खिलाड़ियों के अनुभव और सोच को प्रभावित करते हैं।

( द कन्वरसेशन ) मनीषा अविनाश

अविनाश


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