काठमांडू, दो सितंबर (भाषा) बाढ़ से तबाह नेपाल के पहाड़ी इलाकों में ड्रोन अब केवल हवाई तस्वीरें खींचने या नक्शे बनाने तक सीमित नहीं रह गए हैं बल्कि वे शवों को भी घरों तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं।
‘द काठमांडू पोस्ट’ में बुधवार को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, इस सप्ताह नुवाकोट के देवीघाट-3 से सात शवों को ड्रोन के जरिए देवीघाट-5 पहुंचाया गया। यह इलाका इतना दुर्गम और खतरनाक था कि बचावकर्मी वहां सुरक्षित रूप से नहीं पहुंच सकते थे।
रिपोर्ट में कहा गया कि यह ‘‘ड्रोन की अब तक की सबसे असामान्य भूमिकाओं में से एक’’ है।
इस अभियान में नेपाल पुलिस, नेपाल सेना और ड्रोन बनाने वाली कंपनी गरुड़एक्स के कर्मी शामिल थे।
यह अभियान इस बात का उदाहरण है कि किस तरह मानवरहित हवाई वाहन (यूएवी) नेपाल में आपदा प्रबंधन के दौरान अतिरिक्त मददगार के रूप में तेजी से अपनी भूमिका निभा रहे हैं।
नेपाल में ड्रोन अब केवल फोटोग्राफी और मानचित्रण के उपकरण नहीं रह गए हैं, बल्कि आपदा के समय जीवन रक्षक साधन बनते जा रहे हैं। ये कटे हुए इलाकों में भोजन और दवाइयां पहुंचाने, दुर्गम स्थानों पर जीवित बचे लोगों की तलाश करने और ऐसे स्थानों से शव निकालने में मदद कर रहे हैं, जहां बचावकर्मियों के लिए पहुंचना बेहद जोखिम भरा है।
सबसे अधिक प्रभावित इलाकों में शामिल देवीघाट-3 में हाल ही में कृत्रिम मेधा(एआई) से लैस एक ड्रोन ने फंसे हुए ग्रामीणों के ऊपर उड़ान भरी। ड्रोन में लगे लाउडस्पीकर के जरिए लोगों से पूछा गया- क्या आपके पास पानी है? भोजन है? दवा है?
ग्रामीणों से जवाब देने के लिए हाथ उठाने को कहा गया।
ड्रोन पायलट और एयरलिफ्ट टेक्नोलॉजी के निदेशक मिलन पांडे ने रिपोर्ट में कहा, ‘‘ग्रामीणों की प्रतिक्रिया के आधार पर हम उनकी जरूरतों का आकलन करते हैं और फिर ड्रोन के जरिए सामान भेजते हैं।’’
ड्रोन ने लोगों से फोन नंबर या पता बताने को भी कहा, इससे ड्रोन संचालकों को उनकी स्थिति और जरूरतों की पहचान करने में मदद मिली।
हाल की बाढ़ जैसी आपदा में यह व्यवस्था बेहद उपयोगी साबित हुई क्योंकि सड़कें और पुल बह गए हैं तथा उफनती नदियों के कारण कई समुदाय एक-दूसरे से कट गए हैं।
पांडे ने कहा, ‘‘हमने तीन दिनों में प्रभावित इलाकों में भोजन समेत कम से कम 1.5 टन आपातकालीन सामग्री पहुंचाई।’’
एक अन्य अभियान में ‘ऊपरी त्रिशूली-1’ जलविद्युत परियोजना की सुरंग के अंदर ड्रोन भेजा गया, जहां बाढ़ के बाद बड़ी संख्या में मजदूरों के फंसे होने की आशंका जताई जा रही थी।
ड्रोन संचालक आदर्श भुसाल ने कहा, ‘‘हम परियोजना के प्लेटफॉर्म-1 तक पहुंचे और देखा कि सुरंग पानी और मलबे से भरी हुई थी। अंदर जाना जोखिम भरा और चुनौतीपूर्ण था।’’
उन्होंने बताया कि ड्रोन को सुरंग के अंदर जीवन के कोई संकेत नहीं मिले।
नेपाल के स्वतंत्र बिजली उत्पादक संघ के अनुसार, त्रिशूली और भोटेकोशी नदियों के किनारे स्थित विभिन्न जलविद्युत परियोजनाओं में करीब 900 मजदूरों के लापता होने की सूचना है।
नेपाल में ड्रोन तकनीक का विकास 2015 के भूकंप के बाद शुरू हुआ, जब अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने नुकसान का आकलन और राहत कार्यों के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल किया था। अब इस क्षमता को नेपाली कंपनियां और युवा ड्रोन विशेषज्ञ आगे बढ़ा रहे हैं।
भाषा शोभना नरेश
नरेश