40 प्रतिशत लोग समाचारों से क्यों दूरी बना रहे: मनोवैज्ञानिक ने समझाया

40 प्रतिशत लोग समाचारों से क्यों दूरी बना रहे: मनोवैज्ञानिक ने समझाया

40 प्रतिशत लोग समाचारों से क्यों दूरी बना रहे: मनोवैज्ञानिक ने समझाया
Modified Date: May 26, 2026 / 11:54 am IST
Published Date: May 26, 2026 11:54 am IST

(अली जैसेमी, विल्फ्रेड लॉरियर विश्वविद्यालय)

वॉटरलू (कनाडा), 26 मई (द कन्वरसेशन) हाल के दिनों में कई लोगों ने मुझसे कहा कि उन्होंने सुबह उठते ही फोन देखना बंद कर दिया है। इसकी वजह यह नहीं है कि कुछ हो नहीं रहा, बल्कि यह है कि बहुत कुछ एक साथ हो रहा है। उनका कहना है कि उन्हें ऐसा महसूस होने लगा है, मानो वे हर समय बुरी खबरों की अंतहीन बाढ़ में घिरे हुए हों।

यह अनुभव कोई अपवाद नहीं है। ‘रॉयटर्स इंस्टीट्यूट’ की 2025 डिजिटल न्यूज रिपोर्ट के अनुसार कनाडा के 69 प्रतिशत लोग अब कभी-कभी खबरों से दूरी बनाने लगे हैं।

वैश्विक स्तर पर 40 प्रतिशत लोगों का कहना है कि वे भी कभी-कभी या अक्सर ऐसा करते हैं। यह अब तक दर्ज किया गया सबसे बड़ा आंकड़ा है। लोगों ने इसके पीछे लगभग एक जैसी वजहें बताईं— खबरें नकारात्मक भावना पैदा कर देती हैं, वे खुद को बोझ से दबा हुआ महसूस करते हैं और उन्हें लगता है कि वे कुछ बदल पाने की स्थिति में नहीं हैं।

विकासात्मक मनोविज्ञान और मानसिक स्वास्थ्य पर शोध करने वाले एक शोधकर्ता के रूप में मेरा मानना है कि खबरों से नकारात्मक भावना का पैदा होना आलस्य, कमजोरी या नागरिक चेतना में गिरावट का संकेत नहीं है। यह दरअसल मानव मस्तिष्क की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है, जिसे ऐसे माहौल से जूझना पड़ रहा है जिसके लिए वह कभी बना ही नहीं था।

नकारात्मक खबरों की ओर ध्यान

स्मार्टफोन या प्रिंटिंग प्रेस के दौर से बहुत पहले इंसानी दिमाग का विकास एक बुनियादी जरूरत के अनुसार हुआ था— किसी तरह जीवित रहना और मानव प्रजाति को आगे बढ़ाना।

हमारे जिन पूर्वजों ने घास में होने वाली हल्की-सी आहट को नजरअंदाज किया, उनके मुकाबले वे लोग ज्यादा जीवित बचे जो तुरंत सतर्क हो जाते थे।

दरअसल, वही दिमाग लंबे समय तक टिक पाया, जो खतरों को जल्दी पहचानने के लिए तैयार रहता था।

यही उस प्रवृत्ति की बुनियाद है जिसे मनोवैज्ञानिक “नेगेटिविटी बायस” कहते हैं। यह संज्ञानात्मक विज्ञान के सबसे अधिक प्रमाणित निष्कर्षों में से एक है। दशकों के शोध बताते हैं कि इंसानी दिमाग नकारात्मक सूचनाओं को सकारात्मक सूचनाओं की तुलना में ज्यादा महत्व देता है, उन पर जल्दी प्रतिक्रिया करता है और उन्हें लंबे समय तक याद रखता है।

किसी शिकारी जानवर की मौजूदगी पर खूबसूरत सूर्यास्त से ज्यादा नजर जाती है। असली खतरे को नजरअंदाज करने की कीमत मौत हो सकती थी, जबकि जरूरत से ज्यादा सतर्क होने की कीमत सिर्फ कुछ मिनटों की बेचैनी थी। यही असमानता इस प्रवृत्ति को हमारे लिए उपयोगी बनाती थी।

लेकिन समस्या यह है कि इंसानी दिमाग बदला नहीं है। हम आज भी वही प्रजाति हैं जो हजारों साल पहले थे। बदला सिर्फ इतना है कि अब हमारे दिमाग को खतरों के लिए पूरी दुनिया पर नजर रखनी पड़ती है।

अब पूरी दुनिया पर नजर रखने का दबाव

मानव इतिहास के अधिकांश दौर में इंसान जिन खतरों से घिरा रहता था, वे उसके आसपास तक सीमित होते थे— जैसे पड़ोसी जनजाति का हमला, सूखा या किसी परिचित बच्चे की बीमारी। दूर-दराज की घटनाओं की खबरें न के बराबर पहुंचती थीं और अगर पहुंच भी जाती थीं, तो उनका हमारी रोजमर्रा की जिंदगी पर बहुत असर नहीं पड़ता था।

लेकिन 2026 में हमारा यही दिमाग अब एक ही सुबह में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से युद्ध, आर्थिक संकट, जलवायु आपदा और हिंसक अपराध जैसी खबरों को देखने व जानने के लिए मजबूर है।

वैज्ञानिक पत्रिका ‘नेचर ह्यूमन बिहेवियर’ में प्रकाशित एक अध्ययन में 1,05,000 से अधिक वास्तविक समाचार शीर्षकों का विश्लेषण किया गया, जिन्हें लगभग 60 लाख बार देखा गया था। अध्ययन में पाया गया कि हर अतिरिक्त नकारात्मक शब्द लोगों के उस खबर पर क्लिक करने की संभावना बढ़ा देता है, जबकि सकारात्मक शब्दों का असर उल्टा होता है।

हालिया अध्ययनों से यह भी संकेत मिलता है कि दुनिया भर के लोग सकारात्मक खबरों की तुलना में नकारात्मक खबरों पर कहीं अधिक तीव्र शारीरिक प्रतिक्रिया देते हैं। यानी दिमाग यह तय करे कि खतरा सचमुच महत्वपूर्ण है या नहीं, उससे पहले ही शरीर प्रतिक्रिया देना शुरू कर देता है।

कुछ शोधकर्ताओं ने इस स्थिति को “प्रॉब्लमैटिक न्यूज कंजम्प्शन” (पीएनसी) नाम दिया है। यह खबरों से जुड़ाव का ऐसा रुझान है, जिसमें व्यक्ति जरूरत से ज्यादा उलझ जाता है, भावनात्मक संतुलन बिगड़ने लगता है और रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगती है।

शोधकर्ताओं ने 2022 के एक अध्ययन में पाया कि अमेरिका के 17 प्रतिशत वयस्क गंभीर स्तर के ‘पीएनसी’ से प्रभावित थे। इनमें से 61 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे खुद को काफी ज्यादा या बहुत अधिक अस्वस्थ महसूस करते हैं, जबकि बाकी लोगों में यह आंकड़ा सिर्फ छह प्रतिशत था।

अल्पसंख्यक समुदायों पर खबरों के इस लगातार दबाव का मानसिक असर कहीं अधिक गहरा पड़ सकता है।

जब लोग बार-बार अपने ही समुदाय के खिलाफ हिंसा या नुकसान की खबरें देखते हैं, तब उसका गहरा मानसिक असर पड़ता है, भले ही वे खुद सीधे तौर पर उसका शिकार न हों। प्रवासी और नस्लीय भेदभाव झेलने वाले समुदायों के लिए यह मानसिक बोझ और भारी हो सकता है। उनके लिए खबरों से पूरी तरह दूरी बना लेना आसान नहीं होता, खासकर तब जब खबरें उनके मूल देश से जुड़ी हों।

नजरें फेर लेना समाधान नहीं

तो खबरों से पैदा होने वाली नकारात्मक भावना का समाधान क्या है? इसका जवाब खबरों से पूरी तरह दूरी बना लेना नहीं है। लोकतंत्र जागरूक नागरिकों पर टिका होता है।

आज कई लोग भ्रामक सूचनाओं के फैलाव को भी तनाव की बड़ी वजह मानते हैं। ऐसे में भरोसेमंद और सटीक खबरों से दूरी बनाना समस्या को और बढ़ा देता है। हमारा दिमाग बुरी खबरों की ओर स्वाभाविक रूप से आकर्षित होता है और ऐसा कंटेंट किसी-न-किसी रूप में हमारे सामने पहुंच ही जाता है।

समाधान यह है कि खबरों के चयन और उनके स्रोतों को संतुलित तरीके से नियंत्रित किया जाए।

इसके लिए कई तरीके मददगार हो सकते हैं। मसलन, दिन में सिर्फ तय समय पर खबरें देखना लगातार दबाव महसूस होने से बचाता है। इसी तरह खबरों की संख्या से ज्यादा उनकी गुणवत्ता पर ध्यान देना भी जरूरी है। एक अच्छी तरह से तैयार की गई विस्तृत रिपोर्ट आपको इंस्टाग्राम पर दिखने वाली भावनात्मक, अविश्वसनीय और बिखरी हुई पोस्टों की तुलना में कहीं बेहतर जानकारी देती है।

यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि जानकारी और कार्रवाई दो अलग चीजें हैं। तनाव और “नियंत्रण की भावना” पर हुए शोध लगातार बताते हैं कि किसी समस्या की जानकारी होना और उस पर कुछ कर पाने की क्षमता के बीच का अंतर मानसिक तनाव का बड़ा कारण बनता है। इसलिए यह पहचानना जरूरी है कि खबर पढ़ने के बाद आप वास्तव में क्या कर सकते हैं, चाहे वह कदम कितना भी छोटा क्यों न हो। इससे मानसिक प्रतिक्रिया संतुलित होती है।

साथ ही “रेज बेट” से भी सावधान रहना चाहिए। यह ऐसी सामग्री होती है जिसे सोशल मीडिया पर लोगों की नकारात्मक प्रतिक्रिया भड़काकर ज्यादा लोकप्रियता हासिल करने के लिए जानबूझकर तैयार किया जाता है।

खबरें शायद कभी सामान्य नहीं होंगी। लेकिन उनके साथ हमारा जुड़ाव जरूर अधिक संतुलित और सजग हो सकता है। हमारा दिमाग इतनी सूचनाएं संभालने के लिए नहीं बना था, लेकिन उसमें खुद को परिस्थितियों के मुताबिक ढालने की क्षमता जरूर है।

द कन्वरसेशन खारी वैभव

वैभव


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