ईश्वरी यादव का नवगीत लेखन – एक पड़ताल
ईश्वरी यादव का नवगीत लेखन - एक पड़ताल : Book Review : Review of Ishwari Yadav's book Hamko ki sab Tay karna hai
Book Review हिंदी गीतों के विभिन्न पड़ावों पर चर्चा करते हुए हमें इस बात का खासतौर पर ख्याल रखना होगा कि वह अपनी बनावट और बुनावट में जितना गतिशील रहा है उतना ही उसमें समकालीन युगबोध का धरातल मजबूत रहा है या नहीं ? गीत को पारम्परिकता और आत्मपरकता के साथ अपने जीवन के उतार- चढ़ाव , दुख – पीड़ा , प्रेम पूरित भाव व्यंजना , सफलता – असफलता के मानकों और प्रतिमानों से विलग कर पूर्ववर्ती पीढ़ियों ने काव्य – चेतना के परिवर्तनकामी अवधारणाओं से जोड़कर जो नवीन शिल्प और कथ्य विन्यास दिया वह जन के मध्य कितना स्वीकृत हुआ इस पर भी सम्यक रूप से निगाह डालने की आज जरूरत है ।
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Book Review कविता बदलते समय – सापेक्ष नए मूल्यों के साथ नई कविता , अकविता , प्रयोगवादी कविता जैसे आंदोलनों से आगे चलकर समकालीन कविता के रूप में जो आज प्रचलित हुई है उसी तर्ज पर छान्दसिक अभिव्यक्ति की लयात्मक गेयता गीत से अगीत , जनगीत , नवगीत तक यात्रा करते जिस मुकाम पर है उसे भी समझना वर्तमान सन्दर्भ में आवश्यक जान पड़ता है । यह भी ध्यातव्य है कि इस नवगीत को समकालीन गीत के तौर पर स्वीकार्यता मिली है या नहीं ? यह एक जटिल प्रश्न तो है ही है क्योंकि नवगीत के बाद आज के गीत का कोई नया नामकरण और शिल्पविधान साहित्य जगत में चर्चा का विषय नहीं रहा है इसलिए इसे युगीन चेतना के साथ नवगीत कहना या उसे प्रतिष्ठित रखना अधिक समीचीन जान पड़ता है । हालाँकि गीत सृजन से भटके और चुके हुए लोगों ने दुराग्रहवश इस विधा की समाप्ति और मृत्यु की घोषणा तक कर दी थी पर उन्हें सफलता नहीं मिल पायी । यह जरूर हुआ कि पत्र पत्रिकाओं के साहित्य पृष्ठों से उसे बेदखल करने की बेवजह चेष्टा की गई किंतु उसके सहज प्रवाह और चेतना को गीतधर्मी पूर्ववर्ती तथा नई पीढ़ी के कुछ सजग रचनाकारों ने नवगीत सृजन के विधान को समर्पण भाव से बचाए और जिलाए रखा ।
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जांजगीर छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ कवि एवं गीतकार ईश्वरी यादव का सम्बंध गीत और कविता से रहा है । वे छन्द शास्त्र के अच्छे अध्येता और ज्ञाता होने के साथ साथ कुशल गद्यकार के रूप में भी पहचाने जाते हैं । हाल ही में प्रकाशित उनका संस्मरण ” पल्लू ” इस बात की तसदीक करता है जिसमें कुछ जीवंत चरित्रों के संग उन्होंने बीते दिनों को लेखबद्ध किया है । वे गीत के पारंपरिक छंद विन्यास में पौरुषेय तथा प्रतिरोधी चेतना को सबसे ज्यादा महत्व देने वाले कवि हैं जिन्होंने गीत को लिजलिजी सम्वेदना से इतर हुंकार के तेवर को धार देकर उसे अपनाया और लिखा –
गीतकार ! संगीतकार ! तू मधुवन के मत गीत सुना
गाना हो तो ऐसा गा कि रग रग में अंगार जगे
फुटपाथों पर सोई हैं सड़ती – गलती जिंदा लाशें
शीत प्रकम्पित उंगलियों को छाती के ऊपर फांसे
देख रहा है पापों का अभिशापों का तांडव नर्तन
फिर भी तू गाता है पगले पायल की छूम छनन छनन
पतझर में बेमौसम ही मधुमास जगा मत दीवाने
गाना हो तो ऐसा गा कि पतितों से भी प्यार जगे
यह तकरीबन ईश्वरी यादव का मुख्य तौर पर गीत स्वर रहा है जो उनके स्वभाव के अनुकूल जान पड़ता है । वे जीवन में कर्मपथ को अत्यधिक महत्व देने वाले पुरुषार्थी व्यक्ति हैं जो आज भी 78 वर्ष की आयु में हाड़तोड़ श्रम करते हैं । उनकी रचनाओं में इसकी झलक इस बात का द्योतक है कि वे व्यक्तिगत जीवन और कर्म में सदैव संघर्षचेता रहे हैं । शायद इसीलिए वे कह पाते हैं कि –
दरबारों के गीत नहीं भाते मुझको
लीक छोड़कर में तो बागी गीत लिखा करता हूँ
धारा के अनुकूल बहे क्या हस्ती है
उल्टी धारा चढ़ने की मैं रीत लिखा करता हूँ
उनके लेखन की यह बानगी और विद्रोही मनःस्थिति उन्हें रामधारी सिंह दिनकर के वीरोचित चेतना के आसपास खड़ा करती है। उनके छंद सन्धान में भी गहरे तल पर इस बात की पुष्टि होती है। इस धुन में सधे लिखते – पढ़ते तकरीबन एक दशक पहले ईश्वरी यादव का झुकाव नवगीत लेखन की ओर हुआ और उन्होंने इस विधा के साथ तादात्म्य स्थापित करते हुए बेजोड़ नवगीत लिखे । छंद उनका हमेशा से मंजा हुआ रहा है इसलिए उन्हें नवगीत लेखन में सफलता कम समय में ही मिल गयी । कथ्य की नवीनता भी उन्होंने नए जीवन सन्दर्भों से चुने जिससे उनकी रचनाएं अत्यंत सशक्त और पठनीय बन पड़ी हैं ।
बोधि प्रकाशन जयपुर से कुछ दिनों पहले प्रकाशित उनका नवगीत संग्रह ” हमको ही सब तय करना है ” उनके अब तक के नवगीत रचना विधान का विविधवर्णी भाव – संवेग लिए एक सुंदर गुलदस्ता सा प्रतीत होता है । जैसा कि शीर्षक से ही तय है कि कवि किस तरह मनुष्य की असीम क्षमता तथा उसकी कर्मशीलता पर भरोसा करता है । यह भी रेखांकित करने योग्य है कि मनुज की जययात्रा साहस और सामर्थ्य से ही प्रतिष्ठित पूजित है । यहाँ पर नीर-क्षीर विवेक का आश्रय लेते हुए ईश्वरी यादव का यह कहना कि –
बाएं में सच , झूठ दाहिने
त्यागें किसे , किसे अपनाएं
यह हमको ही तय करना है
कोशिश करने पर मिलता है
कठिन प्रश्न का भी कोमल हल
गइराई में जाने पर ही
सागर देता है मुक्ताफल
हम तट पर ही रहें सम्हलकर
या जल में जा थाह लगाएं
यह हमको ही तय करना है
इस रचना में सामाजिक चेतना को सहकार के साथ आगे ले जाने का जो आह्वान है वह बेहद प्रभावी जान पड़ता है । कई कई मिथ्या अवधारणाओं में दोलित मानव मन को उसकी अंतर्भूत सघन चैतन्यता का अहसास कराना रचनाकार की सामाजिक एवं सामूहिक सोद्देश्यता को दर्शाता है । थियोडोर अडारनो के शब्दों में – गीत तत्वतः सामाजिक होता है । गीत की पुकार का मर्म वही समझ सकता है जो उसकी आत्मपरकता में अन्तर्निहित मानवीयता की आवाज सुन पाता है । इसी तरह अन्सर्ट फिशर की मान्यता है कि आधुनिक गीतों में पुराने हम के स्थान पर एक नए ” मैं ” का उद्भव हुआ है । यद्यपि पुराने ” हम ” का सामाजिक तथा सामूहिक तत्व नए” मैं ” में व्यक्तिबद्ध जरूर हो गया है परंतु व्यक्तित्व का अनिवार्य तत्व अब भी सामाजिक बना हुआ है ( नेसेसिटी ऑफ आर्ट , पृष्ठ – 45 -46 ) इन दो कथनों के आलोक में संग्रह के इस रचना को देख सकते हैं –
काश होते आप मेरे पास
तो कुछ बात होती
हम बदन से दो भले थे
किंतु हम थे एक देही
एक दूजे पर निछावर
एक दूजे के सनेही
और कुछ दिन साथ रहते
तो जरा हँस बोल लेते
गुप्त परतों को हृदय की
बैठकर हम खोल लेते
तब अंधेरी रात में भी
ज्योति की बरसात होती
काश होते आप मेरे पास
तो कुछ बात होती
समकालीन गीत की यह खासियत है कि वह अपने जीवनगत और परिवेशगत स्थितियों से गहरा सम्बन्ध स्थापित कर लेता है । इसमें अपने जन और परिजन सभी किसी न किसी रूप में उपस्थित होते हैं । यूँ तो माँ , पिता , मित्र , बन्धु – बांधव सहित जीवन के सभी क्रिया – व्यापार इसके कथ्य वृत्त में आते हैं किंतु कवि ईश्वरी यादव ने अपनी बहू को केंद्र में रखकर ” ओ बहू ” शीर्षक के नवगीत में उसकी पारिवारिक महत्ता और सेवा सुश्रुषा को जिस तरह इस रचना में अभिव्यंजित किया है वह इतना अनूठा है कि रिश्तों में सहज ही मिठास घुल जाती है –
धैर्य से तुमने बिखरती
घर गृहस्थी को सँवारा
ओ बहू
तू मिली तो मिल गया ज्यों
डूबते जन को किनारा
ओ बहू
तुम हमारे पूर्वजन्मों
में कमाए पुण्य का
प्रतिसाद हो
आदिकवि के छंद की
स्वच्छंद करूणा का सरल
अनुवाद हो
मान धन तुमसे बढ़ा है
ज्यों अंधेरे में जवारा
ओ बहू
तुम हमारी कीर्ति की
संवाहिका हो
वंश की विरुदावली
रागिनी संगीत की तुम
लय तुम्हीं हो, तुम स्वयं
गीतांजलि
हम ऋणी हैं, हर जनम में
ऋण चुकाएंगे तुम्हारा
यह कृतज्ञ भाव नारी के सम्मान में अप्रतिम गृहस्थ सत्कार और वात्सल्यपूर्ण सौंदर्यबोध का अनुपमेय उदाहरण है । नारी तुम केवल श्रद्धा हो , की जगह यहाँ परिवार के केन्द्रीभूत भाव तत्व के रूप में एक स्त्री है जो भारतीयता के संयुक्त जीवन प्रणाली में रची – बसी और सदियों से रमी हुई है । यद्यपि उसे त्याग और समर्पण के बदले ज्यादातर धिक्कार ही मिले हैं किंतु इस रचना की अंतर्वस्तु में जो भावोच्छवास है वह उसकी सम्पूर्ण इयत्ता को मनोयोग से ध्वनित करता है ।
रचनाकार यदि अपने समय के साथ जूझते – निखरते सजग दृष्टि से यदि नहीं चलता तो उसका सारा लेखन एकालाप की तरह ही होता है जहाँ घूम – फिरकर वही वही बातें होती हैं जो उसके अंदर के ठहराव की ओर इंगित करता है । इस दुहराव व ठहराव ने कई अच्छे नवगीतकारों को हाशिये पर पटक दिया और वे इस सत्य से अनजान आज भी शिल्प के केवल शाब्दिक कलाबाजी में उलझकर एक ही धुरी पर घूम रहे हैं । ईश्वरी यादव इस भंगिमा को अपनी सन्तुलित वर्तमान चेतना के दम पर कुछ इस तरह तोड़ते हैं –
गलियाँ गुमसुम
सड़कें शापित
चौराहों में डर
दीवारों में
उगे कान हैं
घर के भीतर घर
टूट गया है
यंत्रों के बल
से मानव का बल
चौपालों पर
धमाचौकड़ी
रोज रोज दंगल
इच्छाधारी नागों पर
निर्भर संवत्सर
बोल न आते
ढाई आखर
वाले कानों में
द्वेष दम्भ के
पहरे लगते
हैं दालानों में
खार खा रहे
एक दूसरे
से छानी – छप्पर
लोकतांत्रिक मूल्यों के हास से उभरे राजनीतिक पाखण्ड ने जिस तरह वैयक्तिक स्वतंत्रता और वैचारिक विमर्श के वातावरण को तोड़ा है वहाँ दुराग्रह तथा परवशता के फलस्वरूप आमजन के अलावा कवि लेखक के सरोकार और आत्मसंघर्ष भी लगातार बढ़ते गए हैं । बल्कि इस परिप्रेक्ष्य में यह कहना ज्यादा मुनासिब होगा कि मदारी और जमूरे जैसे इस खेल के धीरे धीरे हम सभी अभ्यस्त हो चले हैं । इन पर सांकेतिक रूप से तीक्ष्ण व्यंग्य करते हुए कवि ने नेताई जादूगरी का बेहतर दृश्य इस रचना में उपस्थित किया है जहाँ बोलचाल के तौर तरीकों में सहज रूप से आए अंग्रेजी शब्द से भी उन्हें कोई गुरेज नहीं है –
मैं जो बोलूं
बोल जमूरे
खुद पर रख
कंट्रोल जमूरे
दर्शक चारों ओर
खड़े हैं
छोटे , मंझले और
बड़े हैं
इनकी जेबों की
खुशियों को
जी भरकर तू
झोल जमूरे
मेरे संग तुमको
चलना है
मेरी हाँ में हाँ
कहना है
साँप नेवला
को लड़ने दे
आसन से मत
डोल जमूरे !
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गीत चाहे किसी भी ढब में हो यदि उसमें छंद का प्रवाह गतिशील और गेय नहीं है तो वह अपना उचित प्रभाव पाठकों या श्रोताओ के मन पर नहीं छोड़ पाता है । छंदबद्ध रचनाओं की खूबी यही है कि वह अपने इसी रचाव तथा इन्द्रियबोध के चलते स्मृतियों में दर्ज हो जाती हैं। स्थापित नवगीतकार यश मालवीय कहते हैं कि -” विकलांग एवं छंददोष से युक्त गीत हमारे समय का सच कतई नहीं हो सकते । गीत के लिए गेय होना वैसी ही शर्त है जैसी कि पहिये का गोल होना । जैसे चकोर पहिया नहीं चल सकता वैसे ही अगेय गीत भी नहीं चल सकते ।” ( वर्तमान साहित्य का शताब्दी कविता विशेषांक , मई- जून 2000 , पृष्ठ 512 ) इस संग्रह के कुछ नवगीत यश मालवीय के इस विचार को आधार प्रदान करते हैं जिनमें गेय तत्व की प्रधानता है । यथा –
कहीं कामना की बल्लरियाँ
बिना सहारे चढ़ती जातीं
कहीं प्रार्थनाएं मंदिर की
ड्योढ़ी तक भी पहुँच न पातीं
कहीं हास – उल्लास छलकता
कहीं दृगों से बहता पानी
अपनी अपनी अलग कहानी
कहीं गगनचुम्बी इमारतें
तड़ित चालकों से रक्षित घर
कहीं बादलों से आतंकित
अश्रु बहाते छानी छप्पर
कहीं नागफनियाँ हरियातीं
कहीं ठगी सी वृंदा रानी
अपनी अपनी अलग कहानी
यूँ तो इस नवगीत संग्रह में तकरीबन 134 रचनाएं हैं जिनमें कवि ईश्वरी यादव ने अपने जीवन के विभिन्न पड़ावों के अनुभूतियों को लेखन का उपजीव्य बनाया है । उन्होनें कुछ पौराणिक आख्यानों और मिथकों को भी लोक संस्पर्श देकर उसे समकालीन युगबोध से जोड़ने का यथाक्रम उपक्रम किया है । यद्यपि भाषा को उन्होंने भरसक आमफहम बनाने की चेष्टा की है किंतु वे काव्य सृजन में जिस पीढ़ी से आते हैं वहाँ से उतरकर उसके प्रयोग में अपनी प्रांजलता को सरल बनाना उतना आसान नहीं होता जितनी अपेक्षा की जाती है । कलात्मकता के सहारे चमत्कार उत्पन्न करना भी उनके लेखन का ध्येय नहीं रहा है । वे साफगोई के साथ अपनी रचनाओं से न्याय करते नजर आते हैं किंतु प्रतीकों और विम्बों को उन्होंने बेहतरीन रूपकों के साथ अद्भुत ढंग से प्रयोग में लाने का सुंदर यत्न किया है । इस वरिष्ठ कवि के आत्मपरक नवगीतों में भी सार्वजनिन संवेदनाओं का विशेष साहचर्य ध्यान देने योग्य हैं । यहाँ मैंने उनकी इस कृति में समाहित गीत केंद्रित रचनात्मक कौशल के कुछ विशिष्ट पहलुओं की ही पड़ताल की है । संग्रह को पढ़ने के बाद मेरी खुर्दबीन से सहमत या असहमत होना सबकी अपनी पाठकीय चेतना पर निर्भर है । इसलिए कविता और कविकर्म को आदर देने वाले सुधिजन से यह आग्रह भी है कि कृति का अनुशीलनकर ही किसी निष्कर्ष तक पहुँचे । अपने वरिष्ठ कवि को नए सृजन से इसी तरह जुड़े रहने की शुभाकांक्षा के साथ उनके स्वस्थ सर्जनात्मक जीवन की कामना करता हूँ ।

– सतीश कुमार सिंह
पुराना कालेज के पीछे , जांजगीर
जिला – जांजगीर – चाम्पा ( छत्तीसगढ़ ) 495658
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