BREAKING NEWS
रिटायर्ड IAS हत्याकांड का संदिग्ध गिरफ्त से दूर

NindakNiyre: क्यों परेशान हैं परिसीमन से, सभी आयामों को समझेंगे यह देश को जोड़े रखने वाला अहम कदम है

बरुण सखाजी श्रीवास्तव, सह-कार्यकारी संपादक, IBC24 परिसीमन एक समान मताधिकार जैसी प्रणालियों का अभिन्न हिस्सा होता है। जाहिर है जब संख्या के आधार पर सबके वोट की वैल्यू समान होती …

Barun Sakhajee Delimitation

Barun Sakhajee Delimitation

Barun Shrivastava
Published: 17 Apr 2026 | 8:13 pmModified: 09 Jul 2026 | 10:35 pm

बरुण सखाजी श्रीवास्तव, सह-कार्यकारी संपादक, IBC24

 

परिसीमन एक समान मताधिकार जैसी प्रणालियों का अभिन्न हिस्सा होता है। जाहिर है जब संख्या के आधार पर सबके वोट की वैल्यू समान होती है तो प्रतिनिधित्व समान क्यों नहीं होना चाहिए? देश में सबसे छोटी लोकसभा सीट लक्षदीप है जहां 50-60 हजार वोटर्स हैं। वहीं सबसे बड़ी सीट मलकाजगिरी तेलंगाना की है जहां 30 लाख से ज्यादा वोटर हैं। अब आप ही बताइए, एक मलकाजगिरी में 60 लक्षदीप जैसी लोकसभा सीटें समा सकती हैं। ऐसे में यह संविधान में प्रदत्त सबको एक समान वोट के अधिकार का वॉयलेशन है।

 

यह तो बात हुई आबादी के अनुरूप लोकसभा में प्रतिनिधित्व की। किंतु एक फैक्ट यह भी है कि जहां आबादी बहुत कम है, तब क्या वह देश की सबसे बड़ी सभा में प्रतिनिधित्व ही न कर पाएगा। इसीलिए मौजूदा प्रशासनिक भारत के निर्माताओं ने भाषाई आधार पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया, किंतु यह कोई शुद्ध प्रक्रिया नहीं सिद्ध हुई। भाषा के आधार पर भारत के सीने पर हमेश-हमेशा के लिए यह विभाजन की लकीर बनकर उभरती रही है। ऐसे में नए सिरे से जब परिसीमन हो रहा है तो यह देख लेना चाहिए कि आज का कुछ भी स्टेप कल विभाजनकारी शक्तियों का शस्त्र न बन पाए। जैसा कि सारे भारत को स्टालिन और उनका परिवार 70 वर्षों से थ्रेट करता रहता है। आबादी, जमीन, प्रकृति और सांस्कृति का संतुलन जरूरी है। किंतु इनमें से किसी एक को ही आधार बनाकर परिसीमन करना खतरनाक है। जैसा कि भारत के प्रशासनिक नक्शे को खींचते समय तबके राजनेताओं ने किया था। अब इसे सुधारने का वक्त है।

 

अब सवाल उठता है सुधारा जाए कैसे?

 

इसे सुधारने के लिए कुछ भ्रमों को दूर करना जरूरी है। यह भ्रम स्टालिन, करुणानिधि का परिवार बीते 70 वर्षों से तमिल के रास्ते बोता, काटता आया है। अब फिर वही हो रहा है। इसे ठीक से समझने के लिए हमें कुछ इन बातों को समझना होगा।

  1. सबसे पहले ये जानिए कि देश में हिंदी वर्सस गैरहिंदी का प्रतिनिधित्व कैसा है?
  2. उत्तर-दक्षिण का द्वंद कहां है और कैसे यह सियासत में रियासतावाद बना?
  3. तमिल ही क्यों प्रतिरोधा का अड्डा बनता है?
  4. यह आग कौन फैलाता है और किसे फायदा होता है?
  • प्रश्न-1 इन चार प्रश्नों के उत्तर खोजते हैं। पहला प्रश्न हिंदी वर्सस गैर हिंदी का है। यूपी, बिहार, एमपी, सीजी, झारखंड, दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड समेत सिर्फ 10 ही हिंदी राज्य हैं। इन दस राज्यों में लोकसभा 225 और आबादी 57 करोड़ है। लोकसभा में वर्तमान सीटों के हिसाब से प्रतिनिधित्व 40 फीसद है। अब इसके उलट जाकर देखें तो गैर हिंदी भाषी राज्यों की संख्या 25 है जहां की आबादी 90 करोड़ और लोकसभा सीटों की संख्या 320 है। यह लोकसभा में 60 फीसद हिस्सेदारी है। तब भाषा कहां मैटर करती है?
  • प्रश्न-2- उत्तर-दक्षिण भूभाग में बांटना भारत को संभव नहीं। क्योंकि भारत का कुल क्षेत्रफल 33 लाख वर्ग किलोमीटर है और इसकी उत्तर-दक्षिण वर्टिकल लाइन 3214 किलोमीटर और पूर्व-पश्चिम वर्टिकल लाइन 2933 किलोमीटर है। ऐसे में यह उत्तर-दक्षिण हो कैसे सकता है? यह तो चारों ओर समान है। भारत के समग्र भूभाग का केंद्र एमपी के जिला कटनी में स्थित करौंदी गांव को माना जाता है। यहां से पूर्व की ओर भारत की सीमा की दूरी 1300 किलोमीटर, दक्षिण की ओर 1600 किलोमीटर, पश्चिम की ओर 1400 किलोमीटर और उत्तर की ओर 1600 किलोमीटर है। तीसरी बात अगर हम इसे एक पल के लिए दो भागों में बांट भी दें तो दक्षिण पौराणिक रूप से नर्मदा के पार का इलाका कहलाता है। यानि यह आधा-आधा ही होगा न कि पौना-सवाया। इसे समझिए और फिर आपको समझ आएगा स्टालिन का पर्सनल एजेंडा है जिसपर वे ममता बनर्जी जैसा सांस्कृतिक मुलम्मा लगा रहे हैं।
  • प्रश्न-3 और 4- तमिल की छतरी लेकर लोगों को डराने का धंधा स्टालिन, डीएमके का आज का नहीं है। इसे सत्तर वर्ष हो चुके हैं। यह एक समय कांग्रेस के लिए भी चुनौती थी, लेकिन डीएमके को वैचारिक रूप से भाजपा या जनसंघ के हिंदुत्व की काट मानकर पालती रही और धीरे-धीरे तमिल में एक्सटिंक्ट होती गई। एकदम बंगाल की तरह। बंगाल में भाजपा या जनसंघ न घुस पाए इसके लिए कांग्रेस ने खुद का बलिदान दे डाला। जैसे यूपी में दे रही है और बिहार में भी लगभग दे चुकी है। भाजपा या हिंदुत्व से इतना खतरा कांग्रेस को लगता है कि वह अपने अस्तित्व को कुर्बान करने तैयार है। कांग्रेस स्टालिन फैमिली की अलगाव वाली चिन्गारी में पंखा डुला रही है। इसके भड़का रही है। किंतु सकारात्मक हुआ जा सकता है, क्योंकि एआईडीएमके, विजय, रजनीकांत जैसे अनेक स्तंभों ने तमिल को स्टालिन और स्टालिन को तमिल हो जाने में कांग्रेस के प्रयास को विफल किया है। कांग्रेस ने जैसे भाजपा पर भी हिंदू और राष्ट्रवादी का मुलम्मा जड़ दिया है, जिसका खामियाजा खुद कांग्रेस को हो रहा है।

मुझे एक वाकया याद आता है। अप्रैल 2018 में बिलासपुर में हम कुछ पत्रकारों की राहुल गांधी से मुलाकात हुई। राहुल गांधी ने मोदी की आलोचना करते हुए कहा स्टालिन कह चुके हैं मोदी अगर ऐसे ही हिंदू-हिंदू करते रहे तो एक दिन हम तो इंडियन यूनियन से हट जाएंगे। रिपीट हम तो इंडियन यूनियन से हट जाएंगे। इस वाक्य को मैंने पकड़ा। मैंने कहा, स्टालिन ऐसा कैसे कह सकते हैं। स्टालिन न तो तमिल हैं, न तमिल के पटेल, न तमिल के जनक, न तमिल के निर्माता, न तमिल के इकलौते राजनीतिक ठेकेदार... आप उनकी इस बात को.. इतना कहते-कहते राहुल ने अनसुना करते हुए अगली बात पर खुद को शिफ्ट किया। मैं कहना चाहता था कि आपने उनकी इस बात को मानना छोड़िए सुन कैसे लिया? राहुल सारे प्रसंग को घुमा गए। इससे यह बात साफ है कि स्टालिन और उनका परिवार तमिल के नाम पर एक पूरे भूभाग को अपनी रियासत मानता है। परिसीमन इस रियासत पर ही संभवतः चोट कर सकता है। इसलिए सबसे ज्यादा आवाजें इसी परिवार से आ रही हैं।

 

निष्कर्ष- सिंपल है, परिसीमन का सर्वोच्च आधार संस्कृति, दूसरा आबादी, तीसरा जमीन और प्रकृति होना चाहिए। संस्कृति में भाषा, जातियां, धर्म, व्यवहार, विचार सब समाहित होता है। आबादी में सिर्फ लोगों की संख्या शामिल होती है। जमीन तीसरा कारक हो, जिसका अर्थ है क्षेत्रफल और आखिरी कारक प्रकृति है। यह इसलिए क्योंकि भारत के सीमावर्ती कुछ इलाके ऐसे हैं जहां अप्रोच, फोकस, जुड़ाव अत्यधिक आवश्यक है। जैसे कि अरुणाचल, मणिपुर, कश्मीर, पंजाब जहां बाहरी ताकतें विद्रोह सुलगाती रहती हैं। इसलिए यहां का प्रतिनिधित्व जिम्मेदार ढंग से होना चाहिए। मोदी ने 16 अप्रैल 2026 के लोकसभा में शुरू हुए विशेष सत्र में इस बात के संकेत भी दिए हैं। उन्होंने गारंटी दी है कि जो अनुपात वर्तमान में जिन राज्यों का है वह घटेगा नहीं। फिर गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है सीटें बढ़ेंगी, प्रतिनिधित्व बढ़ेगा, लोकसभा की सीटों पर सबकी भागीदारी घटेगी नहीं। भारत के इन दो नेताओं की बात को बारीकी से समझना होगा।

हमसे जुड़ें
FacebookTwitterInstagramMSNGoogle NewsYouTube

लेखक के बारे में

Barun Shrivastava
Barun Shrivastava

Associate Executive Editor, IBC24 Digital

और भी पढ़ें...

Web Title: NindakNiyre Why delimitation is holding back