बरुण सखाजी श्रीवास्तव, सह-कार्यकारी संपादक, IBC24
परिसीमन एक समान मताधिकार जैसी प्रणालियों का अभिन्न हिस्सा होता है। जाहिर है जब संख्या के आधार पर सबके वोट की वैल्यू समान होती है तो प्रतिनिधित्व समान क्यों नहीं होना चाहिए? देश में सबसे छोटी लोकसभा सीट लक्षदीप है जहां 50-60 हजार वोटर्स हैं। वहीं सबसे बड़ी सीट मलकाजगिरी तेलंगाना की है जहां 30 लाख से ज्यादा वोटर हैं। अब आप ही बताइए, एक मलकाजगिरी में 60 लक्षदीप जैसी लोकसभा सीटें समा सकती हैं। ऐसे में यह संविधान में प्रदत्त सबको एक समान वोट के अधिकार का वॉयलेशन है।
यह तो बात हुई आबादी के अनुरूप लोकसभा में प्रतिनिधित्व की। किंतु एक फैक्ट यह भी है कि जहां आबादी बहुत कम है, तब क्या वह देश की सबसे बड़ी सभा में प्रतिनिधित्व ही न कर पाएगा। इसीलिए मौजूदा प्रशासनिक भारत के निर्माताओं ने भाषाई आधार पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया, किंतु यह कोई शुद्ध प्रक्रिया नहीं सिद्ध हुई। भाषा के आधार पर भारत के सीने पर हमेश-हमेशा के लिए यह विभाजन की लकीर बनकर उभरती रही है। ऐसे में नए सिरे से जब परिसीमन हो रहा है तो यह देख लेना चाहिए कि आज का कुछ भी स्टेप कल विभाजनकारी शक्तियों का शस्त्र न बन पाए। जैसा कि सारे भारत को स्टालिन और उनका परिवार 70 वर्षों से थ्रेट करता रहता है। आबादी, जमीन, प्रकृति और सांस्कृति का संतुलन जरूरी है। किंतु इनमें से किसी एक को ही आधार बनाकर परिसीमन करना खतरनाक है। जैसा कि भारत के प्रशासनिक नक्शे को खींचते समय तबके राजनेताओं ने किया था। अब इसे सुधारने का वक्त है।
अब सवाल उठता है सुधारा जाए कैसे?
इसे सुधारने के लिए कुछ भ्रमों को दूर करना जरूरी है। यह भ्रम स्टालिन, करुणानिधि का परिवार बीते 70 वर्षों से तमिल के रास्ते बोता, काटता आया है। अब फिर वही हो रहा है। इसे ठीक से समझने के लिए हमें कुछ इन बातों को समझना होगा।
मुझे एक वाकया याद आता है। अप्रैल 2018 में बिलासपुर में हम कुछ पत्रकारों की राहुल गांधी से मुलाकात हुई। राहुल गांधी ने मोदी की आलोचना करते हुए कहा स्टालिन कह चुके हैं मोदी अगर ऐसे ही हिंदू-हिंदू करते रहे तो एक दिन हम तो इंडियन यूनियन से हट जाएंगे। रिपीट हम तो इंडियन यूनियन से हट जाएंगे। इस वाक्य को मैंने पकड़ा। मैंने कहा, स्टालिन ऐसा कैसे कह सकते हैं। स्टालिन न तो तमिल हैं, न तमिल के पटेल, न तमिल के जनक, न तमिल के निर्माता, न तमिल के इकलौते राजनीतिक ठेकेदार… आप उनकी इस बात को.. इतना कहते-कहते राहुल ने अनसुना करते हुए अगली बात पर खुद को शिफ्ट किया। मैं कहना चाहता था कि आपने उनकी इस बात को मानना छोड़िए सुन कैसे लिया? राहुल सारे प्रसंग को घुमा गए। इससे यह बात साफ है कि स्टालिन और उनका परिवार तमिल के नाम पर एक पूरे भूभाग को अपनी रियासत मानता है। परिसीमन इस रियासत पर ही संभवतः चोट कर सकता है। इसलिए सबसे ज्यादा आवाजें इसी परिवार से आ रही हैं।
निष्कर्ष- सिंपल है, परिसीमन का सर्वोच्च आधार संस्कृति, दूसरा आबादी, तीसरा जमीन और प्रकृति होना चाहिए। संस्कृति में भाषा, जातियां, धर्म, व्यवहार, विचार सब समाहित होता है। आबादी में सिर्फ लोगों की संख्या शामिल होती है। जमीन तीसरा कारक हो, जिसका अर्थ है क्षेत्रफल और आखिरी कारक प्रकृति है। यह इसलिए क्योंकि भारत के सीमावर्ती कुछ इलाके ऐसे हैं जहां अप्रोच, फोकस, जुड़ाव अत्यधिक आवश्यक है। जैसे कि अरुणाचल, मणिपुर, कश्मीर, पंजाब जहां बाहरी ताकतें विद्रोह सुलगाती रहती हैं। इसलिए यहां का प्रतिनिधित्व जिम्मेदार ढंग से होना चाहिए। मोदी ने 16 अप्रैल 2026 के लोकसभा में शुरू हुए विशेष सत्र में इस बात के संकेत भी दिए हैं। उन्होंने गारंटी दी है कि जो अनुपात वर्तमान में जिन राज्यों का है वह घटेगा नहीं। फिर गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है सीटें बढ़ेंगी, प्रतिनिधित्व बढ़ेगा, लोकसभा की सीटों पर सबकी भागीदारी घटेगी नहीं। भारत के इन दो नेताओं की बात को बारीकी से समझना होगा।