परमहंस श्रीराम बाबाजी और परमहंसों का सोSहम
बरुण सखाजी श्रीवास्तव मूर्ति , जप, ध्यान और सोहम तक की यात्रा जटिल, भटकाऊ, भड़काऊ, बाधाओं से भरी और कई सारे जंक्शंस से होकर गुजरती है। एक प्रतिमा में ईश्वर …

Shriram babajee
बरुण सखाजी श्रीवास्तव
मूर्ति , जप, ध्यान और सोहम तक की यात्रा जटिल, भटकाऊ, भड़काऊ, बाधाओं से भरी और कई सारे जंक्शंस से होकर गुजरती है। एक प्रतिमा में ईश्वर की खोज फिर उस प्रतिमा के प्रति अपने आग्रहों का निर्माण और आस्था तक की प्राथमिक कक्षा ही अपने आपमें बहुत बड़ी और कठिन है। कक्षा से तात्पर्य एक ऐसा क्लासरूम है जहां एक शिक्षक है सारी कक्षा को तय सिलेबस में ही समेटता है। मूर्ति की कक्षा में एक टीचर मूर्ति को ही ब्रह्म के रूप में प्रतिपादित करते हुए विद्यार्थियों को दृढ़ता देता है। मूर्ति के बाद बारी आती है जप की। नामजप या मंत्र जप या उपासनाओं की। यानि यह कॉलेज का क्लासरूम है, जहां सिलेबस तो है लेकिन सोचने-विचारने की प्रक्रिया पर जोर है। तीसरी स्थिति होती है ध्यान की। यह एक तरह की शोध कक्षा हुई, जहां सिर्फ दिशा-निर्देश हैं शेष चिंतन विद्यार्थी को करना होता है। इसमें ईश्वर का अनुभव ध्यान में होता है। किंतु इन तीनों अवस्थाओं में आग्रह रहता है। मूर्ति में मूर्ति, नामजप में नाम, ध्यान में सिर्फ ध्यान को ही ईश्वर को मानने का आग्रह है। चौथी अवस्था होती है सोSहम। जिसमें भेद नहीं। सबमें सब है। वही सब है। ब्रह्म भी वही है।
परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी शुरुआती तीन अवस्थाओं को पार करके चौथी अवस्था तक की यात्रा सशरीर कर चुके थे। जब हम मूर्ती वाली पहली अवस्था में होते हैं तो दूसरी, तीसरी और चौथी से दूर रहते हैं। आलोचना करते हैं। जब हम नामजप अवस्था में पहुंचते हैं पहली अवस्था का तिरस्कार करते हैं। तीसरी अवस्था ध्यान में पहुंचते हैं तो मूर्ति और नामजप अवस्थाओं को निम्न मानने लगते हैं। यहां तक अपूर्णता हमार साथ नहीं छोड़ती। किंतु जैसे ही हम सोSहम अवस्था में पहुंचते हैं तो सारी अवस्थाओं को एक क्रम अथवा सीढ़ी अथवा कक्षा मानने लगते हैं। जैसे व्यक्ति पहली कक्षा में पढ़े और परीक्षा दिए बिना दूसरी कक्षा में नहीं जा पाता, भले ही वह कितना ही मेधावी हो। इसी तरह से इन अवस्थाओं का अपना क्रम है।
गुरुवर परमहंस श्रीराम बाबाजी के नित्य विचार प्रकाश को समझने का प्रयत्न करेंगे तो समझ आएगा वे इस जन्म में जन्म से ही सोSहम में रहे। स्वयं का ब्रह्म होने का उद्घोष पहली, दूसरी और बहुत ज्यादा मामलों में तीसरी अवस्था को समझ नहीं आता। वे इसे आलोचना से देखते हैं, क्योंकि ब्रह्म होना सर्वोच्च, सर्वोत्कृष्ट है। ऐसे में कोई जीव ब्रह्म कैसे हो सकता है। शास्त्र कहते हैं सोSहम ही सत्य है। शेष सीढ़ियां और अभ्यास है।
अभ्यास मार्ग है, मुकाम नहीं। क्योंकि अभ्यास तो कोई भी कर सकता है। यंत्रवत अभ्यास करने में तो नकारात्मक शक्तियां वर्षों से माहिर रही हैं। इसलिए अभ्यास ही सब कुछ नहीं होता। इस पर चलने से मंजिल मिलेगी जरूरी नहीं, लेकिन नहीं चलने से मंजिल कभी नही मिलेगी ये जरूर है। परमहंस श्रीराम बाबाजी पहली, दूसरी और तीसरी सीढ़ियों में अभ्यास को सम्मान देते। इसलिए वे मंदिरों में अपने शस्त्र रखकर उस चौथे भाव को प्रकट करते और शेष तीनों को बरकरार रखते हुए। उनके चैतन्य हनुमानजी होने के पीछे का शोध, विज्ञान और भाव यही है। परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी का वांग्मय जब समझते जाते हैं तो स्पष्टता बढ़ती जाती है। वे प्रकाश के समान अंधेरे से उत्पन्न भ्रमों को दूर करते हैं। किसी स्टेज को खारिज नहीं करते न किसी स्टेज को इतना मजबूत कि वह अगली स्टेज पर जाने में बाधक बने। एक यात्री को यात्रा पर फोकस रखना चाहिए वाहन या साधन पर नहीं। परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी यही फोकस रखकर सोSहम भाव रहे।
Web Title: Paramhans Shriram babajee lives with SOAHAM
ब्लॉग
और भी पढ़ें ›
UPITS: यूपीआईटीएस: गांव से ग्लोबल तक नारी शक्ति
01 Oct 2026 | 8:39 am
यूपीआईटीएस: लोकल से ग्लोबल की बड़ी छलांग
29 Sept 2026 | 4:07 pm
अखिलेश यादव की रायबरेली से राहुल गांधी को सीधी चुनौती
26 Sept 2026 | 7:29 pm
एआई से सेमीकंडक्टर तक.. भविष्य गढ़ रहा उत्तर प्रदेश
20 Sept 2026 | 5:29 pm
मातृशक्ति के सम्मान से गढ़ता यूपी का नया भविष्य
10 Sept 2026 | 4:30 pm
हर समीकरण की सीमा लांघने वाला उत्तर प्रदेश का यक्ष प्रश्न
04 Sept 2026 | 3:19 pm
जेपीएनआईसी को संजीवनी पर हायतौबा क्यों?
31 Aug 2026 | 2:41 pm
रक्षाबंधन पर दिखी यूपी में कानून-व्यवस्था की ताकत
29 Aug 2026 | 8:05 pm