नीतीश कुमार की पलटीमार राजनीति का क्या है राज़? |

नीतीश कुमार की पलटीमार राजनीति का क्या है राज़?

Edited By: , August 14, 2022 / 02:46 PM IST

नीतीश ने बिहार को महाराष्ट्र बनने से रोक दिया?

परमेन्द्र मोहन, Executive Editor, IBC24

Secret of Nitish Kumar’s politics: बिहार की राजनीति में हुए उलटफेर ने इस राज्य को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। 2020 के विधानसभा चुनाव में साधारण बहुमत से सत्ता में आए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन NDA की सरकार बनी थी, जिसके पास 126 विधायकों का समर्थन था। बिहार विधानसभा में 243 सीटें हैं और जादुई आंकड़ा 122 है। सरकार बनने के बाद से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लगातार असहज दिख रहे थे और बीजेपी बिहार इकाई के नेताओं की ओर से ये बयानबाज़ी की जा रही थी कि पार्टी अपने दम अगली बार सरकार बनाएगी। बीजेपी के इन दावों के पीछे चुनाव में सबसे बड़े दल के रूप में उभरना था, हालांकि इस साल जून में असदुद्दीन ओवैसी के 5 में से 4 विधायकों के राजद में शामिल होने के बाद राजद सबसे बड़ा दल बन गया। सत्ता की चाभी हमेशा अपने हाथ रखने वाले अनुभवी राजनीतिज्ञ नीतीश कुमार ने 80 विधायकों वाले राजद और 45 जदयू विधायकों के समर्थन से अचानक पलटी मारी और एनडीए से अलग होने की घोषणा कर दी, जिसके बाद बिहार में एनडीए सरकार गिर गई। इसके बाद तो नीतीश को समर्थन देने वाले दलों की लाइन लग गई और अब 164 विधायकों के लिखित समर्थन के बाद उनके पास दो तिहाई बहुमत है।

नीतीश कुमार के इस कदम ने न सिर्फ बीजेपी बल्कि पूरे देश को चौंका दिया। पार्टी नेताओं, समर्थकों के साथ-साथ मीडिया ने भी उन वजहों की पड़ताल शुरू कर दी, जिसने इस उठापटक के हालात बनाए। नीतीश ने शपथ लेने के साथ ही ये आक्रामक बयान देकर हलचलें और तेज़ कर दीं कि जो 2014 में आए थे, वो 2024 में नहीं रहेंगे। इसके बाद तो मोदी बनाम नीतीश की लाइन पकड़कर मीडिया और सोशल मीडिया पर गरमागरम बहसों का दौर ही चल निकला, जो अभी भी जारी है।

बिहार के इस सियासी घटनाक्रम से आगे क्या होगा, ये तो आगे ही पता चलेगा लेकिन इसके पीछे क्या और क्यों था, ये जानना बेहद दिलचस्प है। दरअसल महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे सरकार गिराने के लिए जिस तरह से शिवसेना के वफादार माने जाने वाले एकनाथ शिंदे को बीजेपी ने साधकर गुजरात और असम जैसे अपने शासित राज्यों में राजनीतिक पर्यटन कराकर सत्ता परिवर्तन किया था, उसे लेकर बिहार में भी बीजेपी के खिलाफ अविश्वास का माहौल तैयार हो गया था। बिहार में लंबे समय से ये चर्चा गरमाई हुई थी कि यहां भी खेला होगा, लेकिन बिहार और महाराष्ट्र में बहुत बड़ा फ़र्क है और ये फ़र्क इसलिए है क्योंकि जदयू प्रमुख नीतीश कुमार शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे नहीं हैं, बल्कि एक मंजे हुए राजनेता हैं, जो अपने विरोधियों से हमेशा एक कदम आगे नज़र आते हैं। ऐसे में नीतीश कुमार ने जब अपने बेहद करीबी आरसीपी सिंह को एकनाथ शिंदे की राह पर जाते हुए देखा और बिहार बीजेपी के नेताओं के बयानों पर संज्ञान लिया तो उन्हें ये अहसास हो गया कि मामला गड़बड़ है। इसी बीच बिहार के राजनीतिक हलकों में एक ख़बर आई कि दो तिहाई जदयू विधायकों को मोटी रकम और मंत्रिपद की पेशकश की जा रही है और 15 अगस्त होते-होते ऑपरेशन कमल अमल में आ जाएगा। बताया जाता है कि एनडीए सरकार की ताबूत में ये आख़िरी कील साबित हुई और इससे पहले कि नीतीश सरकार गिराने की ख़बर आती, नीतीश ने बीजेपी से गठबंधन तोड़कर खुद ही सरकार गिराने की ख़बर सुर्खियों में ला दी।

नीतीश कुमार के इस कदम के बाद बीजेपी और उसके समर्थकों की बौखलाहट चरम पर आ गई। बिहार के बीजेपी सांसद, मंत्री, विधायक सड़कों पर उतर आए, धरना-प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो गया, बीजेपी समर्थकों की ओर से नीतीश कुमार को पलटू कुमार और पलटीमार वगैरह कहा जाने लगा। इसके बाद नीतीश समर्थक भी सोशल मीडिया पर एक्टिव हो गए और पलटवार का दौर शुरू कर दिया। नीतीश कुमार को लेकर अवसरवादी राजनीति का आरोप कोई नया नहीं है और न ही उन्होंने कभी इसे लेकर अपनी छवि की चिंता ही की। नीतीश को ये अच्छी तरह पता है कि बिहार में उनकी छवि किसी भी दल के किसी भी नेता से अच्छी है और यही वजह है कि वो बीजेपी से लेकर राजद तक के बीच सर्वमान्य चेहरा बने रहे हैं। महागठबंधन का चेहरा बनकर 2015 चुनाव जीतने के बाद भी उन्होंने बीजेपी के साथ मिलकर अचानक एनडीए सरकार बना ली थी। दरअसल 1996 में एनडीए के गठन से लेकर 2013 तक के 17 साल तक ही बीजेपी और जेडीयू के बीच अटूट गठबंधन रहा, लेकिन जैसे ही बीजेपी का नेतृत्व अटल-आडवाणी जैसे नेताओं के हाथ से निकलकर नरेंद्र मोदी-अमित शाह के हाथ में आया, गठबंधन में हिचकोले आने लगे। 2005 और 2010 में जदयू की सीटें बीजेपी से ज़्यादा थीं, 2015 में महागठबंधन और फिर एनडीए सरकार बनने के दौर में भी जदयू की सीटें बीजेपी से ज़्यादा थीं, लेकिन 2020 चुनाव में ये स्थिति बदल गई।

जदयू अध्यक्ष ललन सिंह के मुताबिक गठबंधन धर्म तोड़ने और नीतीश कुमार को पलटीमार कहने के कोई मायने नहीं है, क्योंकि गठबंधन के विघटन के लिए बीजेपी सीधे तौर पर ज़िम्मेदार है। ललन साफ तौर पर कहते हैं कि मौजूदा बीजेपी नेतृत्व को सहयोगी दलों की ज़रूरत सिर्फ चुनाव जीतने और सरकार बनाने तक के लिए है, इसके बाद वो सहयोगी दलों का खात्मा कर सिर्फ अपने हाथ सत्ता रखने की नीति अपनाती है। मिसाल के तौर पर ललन बताते हैं कि अरुणाचल प्रदेश में जदयू के 7 विधायक चुनाव जीत कर आए, इन विधायकों ने बीजेपी को लिखित समर्थन दिया, सरकार बन गई लेकिन बाद में जदयू के 6 विधायकों को बीजेपी में शामिल करा लिया गया। ललन का आरोप है कि बीजेपी 2019 लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार की ताकत और प्रभाव का फ़ायदा देखकर खुलकर साथ खड़ी हुई और एनडीए ने 40 में से 39 लोकसभा सीटें जीतीं, लेकिन 2020 विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने एनडीए में खुद को मज़बूत करने और जदयू को कमज़ोर करने की साज़िश रची। बतौर ललन इसी षडयंत्र के तहत बीजेपी नेताओं को रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान के नेतृत्व में एलजेपी का टिकट दिलाकर जेडीयू उम्मीदवारों को हराया गया।

नीतीश कुमार चुनाव के दौरान ही ये खेला समझ चुके थे लेकिन हालात प्रतिकूल थे, इसलिए सही वक्त का इंतजार कर रहे थे। ललन सिंह कहते हैं कि जब बीजेपी नेताओं को चिराग की पार्टी से टिकट और कार्यकर्ताओं को एलजेपी उम्मीदवारों को जिताने और जदयू उम्मीदवारों को हराने के निर्देश की बात साफ़ हो चुकी थी, इसके बावजूद नीतीश कुमार गठबंधन धर्म निभाते रहे। नीतीश कुमार 2020 में मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहते थे, जिसके पीछे यही कारण था, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आग्रह पर उन्होंने ये पद स्वीकार किया था कि आगे सबकुछ ठीक हो जाएगा। घटनाक्रम आगे बढ़ा तो सब ठीक होने की बजाय और बिगड़ गया और ये संदेश बाहर आने लगा कि बिहार में सब कुछ ठीक नहीं है। इस माहौल को विधानसभा स्पीकर और नीतीश कुमार के बीच विधानसभा में हुई नोंक-झोंक ने देश के सामने भी ला दिया। ललन सिंह बीजेपी पर सीधा आरोप लगाते हैं कि ये पार्टी अपने सहयोगियों को अपमानित करती है और जेडीयू अपमान सहने वाला दल नहीं है, इसलिए ये स्थिति हमें स्वीकार नहीं थी।
अब नीतीश कुमार बीजेपी के निशाने पर हैं, उनके बीजेपी से अलग होते ही दोस्ती दुश्मनी में बदल चुकी है। बीजेपी समर्थकों के साथ-साथ विरोधी भी इस बात का अंदाज़ा लगा रहे हैं कि अब बिहार में नीतीश सरकार को उलझाने के लिए ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट जैसी केंद्रीय संस्थाओं का इस्तेमाल किया जाएगा। इन केंद्रीय एजेंसियों के राजनीतिक दुरुपयोग को लेकर लगातार लगने वाले आरोपों से बिहार में इनकी सक्रियता बढ़ने की अटकलों को हवा भी मिल रही है। इन सबके बीच नीतीश कुमार अपने मंत्रिमंडल विस्तार को अंतिम स्वरूप देने में जुटे हुए हैं, जिसके बाद उनकी सरकार फ्लोर टेस्ट पर जाएगी।