Maharshi Dayanand Saraswati Birth Anniversary: इस दार्शनिक और समाज सुधारक ने हिंदू होने के बावजूद क्यों किया मूर्ति पूजा का विरोध…, जानें
Maharshi Dayanand Saraswati opposed idol worship आर्य समाज का एकमात्र उद्देश्य केवल और केवल मनुष्य का कल्याण है।
Maharshi Dayanand Saraswati opposed idol worship
Maharshi Dayanand Saraswati opposed idol worship: जब भारत पर अंग्रेजों का असर बढ़ रहा था, तब भारत को एक ऐसे व्यक्तित्व की तलाश थी, जो उन्हें राह दिखा सके, उन्हें एक रख सके और इस कार्य को एक स्वामी ने किया। यह स्वामी दयानंद सरस्वती थे। उनका आज ही के दिन यानी 12 फरवरी 1824 को गुजरात के टंकारा में जन्म हुआ था।
स्वामी दयानंद सरस्वती बने संन्यासी
शाश्वत सत्य के अन्वेषण हेतु एवं सत्य व शिव की प्राप्ति हेतु मूल शंकर वर्ष 1846 में 21 वर्ष की आयु में समृद्ध घर-परिवार, मोह ममता के बंधनों को त्याग कर संन्यासी जीवन की ओर बढ़ गए। उन्होंने 1859 में गुरु विरजानंद जी से व्याकरण व योग दर्शन की शिक्षा प्राप्त की। भारत की उत्कृष्ट वैदिक संस्कृति एवं सभ्यता की हजारों वर्षों की गरिमामयी विरासत मध्यकाल के तमसाच्छन्न युग में लुप्तप्राय हो गई थी।
स्वामी विरजानंद के शिष्य बने दयानंद सरस्वती
दयानंद सरस्वती जब मथुरा पहुंचे तो उनकी मुलाकात स्वामी विरजानंद से हुई। मूल शंकर उनके शिष्य बन गए और वेदों का अध्ययन करने लगे। वेदों के अध्ययन के दौरान दयानंद सरस्वती ने जीवन, मृत्यु और परवर्ती जीवन के बारे में अपने सभी सवालों के जवाब पा लिए। उनके गुरु स्वामी विरजानंद ने दयानंद को पूरे समाज में वैदिक ज्ञान के प्रसार का कार्य सौंपा। उन्होंने देश-विदेश जाकर वैदिक शास्त्रों के ज्ञान का प्रचार करना शुरू कर दिया।
स्वामी दयानंद सरस्वती ने की आर्य समाज की स्थापना
7 अप्रैल 1875 को गुड़ी पड़वा के दिन मुंबई में स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की। आर्य समाज का प्रमुख धर्म मानव धर्म था। उन्होंने परोपकार, मानव सेवा, कर्म और ज्ञान जैसे विचारों के साथ आर्य समाज की नींव रखी। समाज में जागरुकता लाना ही उनका उद्देश्य था। कई लोगों ने स्वामी दयानंद सरस्वती का विरोध किया, लेकिन उनके तर्कों के आगे बड़े-बड़े विद्वानों को झुकना पड़ा। उनके अनुसार आर्य समाज का एकमात्र उद्देश्य केवल और केवल मनुष्य का कल्याण है। खास बात यह है कि पहली बार ‘स्वराज्य’ का नारा दयानंद सरस्वती ने ही दिया जिसे बाद में लोकमान्य तिलक ने आगे बढ़ाया।
मूर्ति पूजा के विरोधी होने के पीछे बचपन की कहानी
Maharshi Dayanand Saraswati opposed idol worship: स्वामी दयानंद सरस्वती मूर्ति पूजा के विरोधी थे। इसके पीछे उनके बचपन में घटी एक घटना है। एक बार महाशिवरात्रि पर उनके पिता ने उनसे रात्रि उपवास और पूजा करने के लिए कहा। पिता की आज्ञा के अनुसार उन्होंने पूरे दिन उपवास किया और रात्रि जागरण के लिए पालकी लेकर शिव मंदिर में बैठ गए। आधी रात को उन्होंने देखा कि चूहों का झुंड भगवान शिव की मूर्ति को घेरकर प्रसाद खा रहा है। उनके मन में एक सवाल उठा कि ये मूर्ति एक पत्थर है, जो अपनी रक्षा नहीं कर सकती उससे हम क्या उम्मीद कर सकते हैं। इस घटना ने उन पर बहुत प्रभाव डाला और आत्म ज्ञान की प्राप्ति के लिए उन्होंने घर छोड़ दिया।
‘वेदों की ओर लौटो, वैदिक युग की ओर नहीं’
स्वामी दयानंद सरस्वती ने कहा था कि वेदों की ओर लौटो, वैदिक युग की ओर नहीं। स्वामी दयानंद जानते थे कि समता, समानता और अनेक सुधार वेदों में निहित हैं। स्वामी दयानंद सरस्वती को वेदों के अध्ययन से ही कई सवालों के जवाब मिले थे।
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