रेरा कानून ठीक से लागू न होने से 27.6 लाख घर खरीदारों की रकम फंसी: एफपीसीई

रेरा कानून ठीक से लागू न होने से 27.6 लाख घर खरीदारों की रकम फंसी: एफपीसीई

रेरा कानून ठीक से लागू न होने से 27.6 लाख घर खरीदारों की रकम फंसी: एफपीसीई
Modified Date: September 9, 2026 / 05:34 pm IST
Published Date: September 9, 2026 5:34 pm IST

नयी दिल्ली, नौ सितंबर (भाषा) घर खरीदारों के संगठन एफपीसीई ने रियल एस्टेट क्षेत्र को नियंत्रित करने वाले रेरा कानून को राज्यों में ठीक से लागू नहीं किए जाने का आरोप लगाते हुए बुधवार को कहा कि देशभर में करीब 27.6 लाख घर खरीदार आवासीय परियोजनाओं में देरी के कारण फंसे हुए हैं।

‘फोरम फॉर पीपल्स कलेक्टिव एफर्ट्स’ (एफपीसीई) ने रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम (रेरा), 2016 के लागू होने के 10 साल पूरे होने पर जारी एक रिपोर्ट में यह बात कही। रिपोर्ट में नियामकीय नाकामी से घर खरीदारों को हो रहे नुकसान का उल्लेख किया गया है।

एफपीसीई के अध्यक्ष अभय उपाध्याय ने कहा, ‘‘रेरा एक कानून के रूप में विफल नहीं हुआ है, इसके क्रियान्वयन में कमी रही है। और जब क्रियान्वयन कमजोर पड़ता है, तो मजबूत से मजबूत कानून भी व्यवहार में विफल हो जाता है।’’

आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के ‘रेरा ट्रैकर’ के दो मार्च, 2026 के आंकड़ों के आधार पर रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि करीब 27.6 लाख घर खरीदार परिवारों की रकम बिल्डरों के पास फंसी हुई है। प्रति परिवार औसतन 45 लाख रुपये की राशि मानने पर अधूरी परियोजनाओं में फंसी कुल रकम करीब 12.44 लाख करोड़ रुपये बैठती है।

उपाध्याय ने कहा कि रिपोर्ट का उद्देश्य रेरा कानून के क्रियान्वयन में सुधार करना तथा उस अनुशासन और जवाबदेही को बहाल करना है, जिसके साथ कानून बनाया गया था।

उन्होंने कहा, ‘‘घर खरीदारों के लिए यह नियामकीय व्यवस्था का विषय न होकर उनकी जीवन भर की बचत, आवास और सुरक्षा से जुड़ा मामला है। और इसमें सुधार की तत्काल जरूरत है।’’

एफपीसीई ने कहा कि रिपोर्ट के निष्कर्ष कई राज्यों में रेरा प्राधिकरणों के आधिकारिक रिकॉर्ड, परियोजनाओं की समयसीमा बढ़ाने संबंधी आदेश, नियामकीय दाखिलों और दर्ज फैसलों के आधार पर तैयार किए गए हैं।

संगठन ने रेरा के क्रियान्वयन में कई खामियों का जिक्र करते हुए कहा कि परियोजनाओं की समयसीमा बढ़ाने की अनुमति देते समय कानून में निर्धारित शर्तों की समुचित जांच नहीं की जा रही है। परियोजनाओं में देरी को दूर करने के बजाय उसे नियमित किया जा रहा है और प्रवर्तन की जगह प्रशासनिक रियायत ने ले ली है।

उपाध्याय ने कहा, ‘‘नियामकीय प्रक्रिया निवारक की भूमिका निभाने के बजाय ऐसी व्यवस्था बन गई है, जिसके जरिये देरी को संस्थागत रूप दिया जा रहा है।’’

उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने भी विलंबित आवासीय परियोजनाओं से जुड़े कई मामलों में नियामकीय प्रणाली के कामकाज पर गंभीर टिप्पणियां की हैं।

एफपीसीई रेरा कानून की धारा 41 के तहत गठित केंद्रीय सलाहकार परिषद (सीएसी) का सदस्य है।

रेरा कानून के तहत बिल्डर को परियोजना से जुड़ी सभी जरूरी जानकारियां और मंजूरियां सार्वजनिक करनी होती हैं। उन्हें घर खरीदारों से प्राप्त राशि का 70 प्रतिशत अलग बैंक खाते में जमा करना भी आवश्यक है, जिसका इस्तेमाल केवल जमीन की लागत और परियोजना के निर्माण के लिए किया जा सकता है।

भाषा प्रेम प्रेम अजय

अजय


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