अर्थव्यवस्था को अधिक जुझारू बनाने के लिए बजट के दीर्घकालिक दृष्टिकोण पर केंद्रित होने की जरूरत:राजन

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अर्थव्यवस्था को अधिक जुझारू बनाने के लिए बजट के दीर्घकालिक दृष्टिकोण पर केंद्रित होने की जरूरत:राजन

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  • Publish Date - January 28, 2026 / 11:33 AM IST,
    Updated On - January 28, 2026 / 11:33 AM IST

(फाइल फोटो के साथ)

(बिजय कुमार सिंह)

नयी दिल्ली, 28 जनवरी (भाषा) भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने बुधवार को सुझाव दिया कि आगामी बजट को एक दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए ताकि भारतीय अर्थव्यवस्था को अधिक जुझारू एवं स्वतंत्र बनाया जा सके। साथ ही वृद्धि को गति दी जा सके क्योंकि दुनिया एक ‘‘ बेहद खतरनाक दौर ’’ से गुजर रही है।

राजन ने ‘पीटीआई वीडियो’ के साथ साक्षात्कार में कहा कि पहले भारत में पंचवर्षीय योजनाएं थीं लेकिन तब भी देश का बजट अच्छी तरह से एकीकृत नहीं था।

उन्होंने कहा, ‘‘ मेरा मानना ​​है कि (2026-27 का केंद्रीय बजट) एक दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ एकीकृत होना चाहिए। हम एक अर्थव्यवस्था के रूप में अधिक जुझारू, अधिक स्वतंत्र और तेजी से वृद्धि कैसे करें, ताकि अन्य सभी देश भारत के मित्र बनना चाहें। इसके लिए काफी मेहनत की आवश्यकता है और मुझे उम्मीद है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का अगला बजट हमें उस दिशा में ले जाएगा।’’

सीतारमण एक फरवरी को केंद्रीय बजट पेश करेंगी जिसमें अस्थिर भू-राजनीतिक स्थिति के बीच आर्थिक वृद्धि को गति देने के लिए सुधारात्मक उपायों को शामिल किए जाने की उम्मीद है।

राजन ने कहा कि वैश्विक एवं भारतीय अर्थव्यवस्था दोनों के लिए यह ‘‘ बेहद खतरनाक समय है हालांकि कृत्रिम मेधा (एआई) में भारी निवेश से हमें कई सकारात्मक अवसर भी मिल रहे हैं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘ लेकिन उन संस्थाओं पर अत्यधिक निर्भर होने से भी बहुत खतरा है जो हमें निचोड़ सकती हैं और हमें कमजोर बना सकती हैं क्योंकि हमारे पास कोई प्राकृतिक बाजार नहीं है जो पास में हो, जो समृद्ध हो, जिसे हम अपने अलावा दूसरों को आपूर्ति कर सकें।’’

राजन वर्तमान में शिकागो बूथ में ‘कैथरीन डूसैक मिलर डिस्टिंग्यूशेड सर्विस में वित्त प्रोफेसर हैं।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वह समझते हैं कि आगामी बजट में कुछ ऐसी शुल्क दरों में कटौती हो सकती है जो भारत को आपूर्ति श्रृंखला में बेहतर ढंग से एकीकृत होने से रोकती हैं।

राजन ने कहा, ‘‘ निश्चित रूप से, राज्य भी निवेश के अनुकूल नीतियां बनाकर मदद कर रहे हैं लेकिन हमें इसकी और अधिक आवश्यकता है।’’

अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव और बढ़ने पर घरेलू सुधारों और बाहरी नीतियों का कौन सा संयोजन भारत को इस स्थिति से निपटने में मदद करेगा, इस सवाल पर उन्होंने कहा कि भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वह कुछ समय के लिए बाहरी दुनिया से खुद को अलग कर ले….आत्मनिरीक्षण करे कि वृद्धि दर बढ़ाने के लिए उसे क्या करने की आवश्यकता है।

राजन ने कहा, ‘‘ हमने 1990 के दशक से लेकर 2000 के दशक के आरंभ तक कई बड़े सुधार किए, फिर कुछ समय के लिए कोई खास सुधार नहीं हुए। मुझे लगता है कि अब उस प्रक्रिया को फिर से शुरू करने का समय आ गया है।’’

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा हाल ही में किए गए सुधारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अब इस बात पर अधिक ध्यान देने का समय है कि भारत की आर्थिक वृद्धि को और बढ़ाने के लिए क्या किया जाए।

उन्होंने कहा, ‘‘ मुझे लगता है कि इस समय हमारे पास दो बड़ी महाशक्तियों की नीतिगत अनिश्चितताओं से उत्पन्न अवसर है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में खुद को फिर से स्थापित करने का अवसर है।’’

राजन ने बताया कि भारत, स्वाभाविक रूप से किसी भी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा नहीं है क्योंकि यह चीन को छोड़कर किसी भी प्रमुख अर्थव्यवस्था के निकट नहीं है और चीन के साथ इसका सीमा विवाद है।

उन्होंने कहा, ‘‘ भारत के लिए आगे चलकर चीन के साथ-साथ यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, पश्चिम एशिया और पूर्वी एशियाई देशों सहित अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाना महत्वपूर्ण होगा।’’

भारत के चीन और पूर्वी एशियाई देशों की तरह लगातार आठ से नौ प्रतिशत की दर से वृद्धि करने के सवाल पर राजन ने कहा कि भारत को चीन की तरह उस गति से वृद्धि करने की आवश्यकता नहीं है।

उन्होंने कहा, ‘‘ इस वृद्धि का कुछ हिस्सा अस्थिर था और हम अभी चीनी संपत्ति बाजार की समस्याओं को देख रहे हैं और आप जानते हैं, इसे ठीक होने में कई साल लगेंगे।’’

भाषा निहारिका मनीषा

मनीषा