जैव विविधता में गिरावट आने से भारत की क्रेडिट रेटिंग पर असर संभव: अध्ययन रिपोर्ट

जैव विविधता में गिरावट आने से भारत की क्रेडिट रेटिंग पर असर संभव: अध्ययन रिपोर्ट

जैव विविधता में गिरावट आने से भारत की क्रेडिट रेटिंग पर असर संभव: अध्ययन रिपोर्ट
Modified Date: June 13, 2026 / 01:52 pm IST
Published Date: June 13, 2026 1:52 pm IST

(एच एस राव)

लंदन, 13 जून (भाषा) जैव विविधता में गिरावट आने से भारत की क्रेडिट रेटिंग में चार ग्रेड तक की गिरावट आने और हर साल करीब 49 अरब डॉलर का अतिरिक्त ऋण दायित्व बढ़ने का अनुमान है। एक अध्ययन रिपोर्ट में यह आशंका जताई गई है।

प्रतिष्ठित पत्रिका ‘नेचर’ में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, जैव विविधता से हासिल होने वाली ‘पारिस्थितिकी सेवाएं’ (जैसे फसलों का परागण करने वाले कीट और समुद्री खाद्य श्रृंखला को सहारा देने वाले महासागर) अर्थव्यवस्था के लिए अहम योगदान देती हैं और इनके कमजोर पड़ने की बड़ी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।

रिपोर्ट कहती है कि मत्स्य संसाधनों, जंगली परागण और उष्णकटिबंधीय वनों में आंशिक गिरावट आने से वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में सालाना दो लाख करोड़ डॉलर तक की कमी आ सकती है।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस परिदृश्य में भारत की क्रेडिट रेटिंग 20-बिंदु के पैमाने पर चार ग्रेड गिर सकती है, जबकि चीन की रेटिंग में 5.5 ग्रेड तक गिरावट आ सकती है। ऐसा होने से भारत को हर साल 49 अरब डॉलर और चीन को 70 अरब डॉलर तक अतिरिक्त ब्याज भुगतान करना पड़ सकता है।

हालांकि पर्यावरणीय क्षरण को गंभीर वित्तीय जोखिम माना जाता है लेकिन सरकारी ऋण बाजार इसे अपने आकलन में सही ढंग से जगह नहीं देते हैं। इससे 83 लाख करोड़ डॉलर की परिसंपत्तियों के गलत मूल्यांकन का खतरा बना हुआ है।

शेफील्ड यूनिवर्सिटी, ससेक्स यूनिवर्सिटी और अन्य संस्थानों के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए इस अध्ययन में पहली बार जैव विविधता-समायोजित क्रेडिट रेटिंग मॉडल का इस्तेमाल किया गया है।

ससेक्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मैथ्यू अगरवाल ने कहा, “प्रकृति के नुकसान से आर्थिक प्रदर्शन कमजोर होगा, जिससे देशों के लिए कर्ज चुकाना मुश्किल हो जाएगा और सरकारों पर कर बढ़ाने या खर्च घटाने का दबाव पड़ेगा।”

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि अतिरिक्त कर्ज लागत को करों के जरिए पूरा किया गया, तो भारत में यह औसतन कर-पश्चात आय पर करीब 2.5 प्रतिशत तक असर डाल सकता है।

इसके साथ ही शोधकर्ताओं ने नियामकों, केंद्रीय बैंकों और रेटिंग एजेंसियों से प्रकृति एवं जलवायु से जुड़े वित्तीय जोखिमों को मुख्यधारा के आकलन में शामिल करने का आह्वान किया है।

भाषा प्रेम

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