नयी दिल्ली, छह जुलाई (भाषा) इस साल का अल नीनो का असर भारत की उर्जा प्रणाली पर दुनिया में सबसे अधिक देखने को मिलेगा। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के एक नए विश्लेषण में यह निष्कर्ष निकाला गया है।
अल नीनो मौसम का एक ऐसा चक्र है जो बार-बार आता है और जिससे दुनिया का तापमान बढ़ता है।
भारत के सामने दोहरी चुनौती है — अल नीनो की वजह से हवा और बारिश में कमी आने से टर्बाइन और पनबिजली उत्पादन तो घटेगा ही, साथ ही तापमान बढ़ने से एयर कंडीशनिंग (एसी) की मांग भी बढ़ेगी, जिसमें बहुत ज्यादा बिजली खर्च होती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि एक साल के अंदर ठंडक प्रदान करने वाले उपकरणों से ज्यादा इस्तेमाल से अतिरिक्त मांग कुल मिलाकर 10 टेरावाट घंटे (टीडब्ल्यूएच) हो सकती है — जो दिल्ली की सालाना बिजली खपत का एक चौथाई हिस्सा है।
यह विश्लेषण जुलाई, 2026 से जून, 2027 तक भारत के बिजली क्षेत्र पर ला नीना से अल नीनो में होने वाले बदलाव के असर का मॉडल तैयार करता है।
ला नीना, अल नीनो का ठंडा चरण है।
हालांकि, विश्लेषण में एक विकल्प भी बताया गया है – सौर ऊर्जा।
इसमें कहा गया, ‘‘भारत को बिजली देने में सौर ऊर्जा की भूमिका लगातार बढ़ रही है और अब यह दिन के समय बिजली की 24 प्रतिशत मांग को पूरा करती है। सौर ऊर्जा उत्पादन पर अल नीनो का असर भी बहुत कम होता है, जिसका मतलब है कि भारत द्वारा लगाया गया हर अतिरिक्त सौर पैनल और बैटरी ग्रिड को इस तरह के चरम मौसम के हालात से निपटने के लिए तैयार करने में मदद करता है।’’
भाषा राजेश राजेश अजय
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