Shrirambabajee: घृणा अहंकार से जन्मती है, अहंकार असहमति से, असहमति आग्रह से, इसी कुचक्र को भेदना गुरु कृपा है

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  • Publish Date - July 6, 2026 / 05:50 PM IST,
    Updated On - July 6, 2026 / 05:50 PM IST

Paramhans Shriram babajee

Barun Sakhajee, Associate Executive Editor, IBC24

बरुण सखाजी श्रीवास्तव

घृणा का जन्म अहंकार से होता है और अहंकार का जन्म अपने कर्ताभाव से होता हैl परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी अपनी हर क्रिया में यह बताने का प्रयास किया करते थे कि कर्ताभाव त्याग दोl इसका त्याग जटिल और कठिन काम है, क्योंकि हम अपने शरीर से मन से जो कुछ भी कर रहे होते हैं उसका अनुभव हमें निरंतर होता हैl इस अनुभव से आखिर कैसे बचा जा सकता है? घृणा भीतर का एक ऐसा शोर है जो आग्रहों से लिपटा हुआ है, जिसमें अनेक तरह के आग्रह-दुराग्रह और सृष्टि को चुनौतियां देने की वृत्ति शामिल होती हैl जैसे हम किसी काम को करने के लिए एक वक्त का निर्धारण करते हैं और उसे वक्त के भीतर पूरा करने का प्रयास करते हैंl कभी ऐसा भी होता है कि वक्त के भीतर वह काम पूरा नहीं होता, जब वह पूरा नहीं होता तो हमें लगता है, हमारी या तो गति ठीक नहीं थी यह वक्त कम था या फिर कुछ ऐसा होना था कि हमें थोड़ा और वक्त मिलना थाl यानी हम चाहते हैं चीजें हमारे हिसाब से होना चाहिएl जो हमारे हिसाब से नहीं तो चीज सही नहीं हैl बस अहंकार का जन्म ही यहां से होता हैl जब हम ऐसा करने का प्रयास करते हैं तो हम परोक्ष रूप से सृष्टि को ललकार रहे होते हैंl

 

यह कैसे संभव है कि हम जैसा चाहें वही हो जाएl इसका अर्थ यह हुआ कि दूसरे जैसा चाहते हैं वैसा नहीं होl इसका अर्थ यह भी हुआ कि ईश्वर ने जैसा सोच रखा है वैसा नहीं हो सकता और इसका एक अर्थ यह भी हुआ कि हम जो चाहते हैं वही हो क्योंकि हम सही हैंl इतिहास के अनेक पात्र हमको सिखाते हैं, हमने अगर ज़िद पकड़ी कि हम जैसा चाहें वैसा ही हो तो फिर इसका नुकसान भी हमें झेलना होता हैl

 

आग्रह ही आसक्ति को जन्म देते हैं और आसक्ति ही अहंकार को अहंकार ही घृणा को जन्म देता हैl जैसा चाहत है वैसा नहीं होता तो मन घृणा से या असहमति से भर जाता हैl जब असहमति बड़ी हो जाती है, विकट हो जाती है, ऊपर पहुंच जाती है, मोटी हो जाती है, ठोस हो जाती है, ताकतवर हो जाती है तो वह घृणा बन जाती हैl आग्रह, असहमति, आसक्ति, अहंकार और घृणा यही कुचक्र हैl

 

इस कुचक्र को तोड़ने के लिए सबसे अच्छा तरीका परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी बताते हैंl वह अपनी यात्राओं का कोई पूर्व निर्धारण नहीं करते थेl ना कभी उन्होंने कोई डेस्टिनेशन का चयन कियाl ना उन्होंने पहले से सारा यात्रा व्रत बनायाl न तो यात्रा के बाद उन्होंने यात्रावृत्त बतायाl बसे रहे यात्रा में तो ऐसे जैसे यात्रा मेंl यानी सदा-सदा वर्तमान में रहनाl वर्तमान में रहना इस कुचक्र को भेदने का सुलभ उपाय हैl

 

परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी महाराज सदा-सदा इस चक्र से परे रहेl उनके मुख से कभी अरे यार या ऐसा कोई पश्चाताप साउंड का शब्द नहीं सुनl कभी वे न पाने में खुश होते न खोने सेl वह किसी गणित में नहीं थेl न हिसाब रखना न पूछनाl न ज्ञान देना न लेनाl क्रिया ही शिक्षा हैl जो देखकर समझ जाए तो ठीक नहीं तो अलग से उपदेश नहींl वे कभी अपने आत्मविश्वास से विचलित होते नहीं थेl अकाट्य क्रियाएं, निश्चित प्रतिफल, समझो तो समझो नहीं तो भाग्य आपकाl

 

वह कहते थे चैतन्य ही ईश्वर है, क्योंकि उनकी यह मान्यता दृढ़ थी कि ईश्वर सदैव ही वह है जो है, जो दिख रहा है, जो समझ आ रहा है, जो सामने है, जो प्रत्यक्ष है, वही ईश्वर हैl ईश्वर के लिए कोई अलग से बाड़ा बनाने की आवश्यकता नहींl ईश्वर के लिए कोई अलग से आग्रह पैदा करने की आवश्यकता नहींl ईश्वर के लिए कोई नई परिभाषा करने की आवश्यकता नहींl वही ईश्वर है जो आप हैं, जो आपके साथ है, जैसा आपके भीतर है, जो सदा आपको चलाता हैl परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी इस बात को अपनी हर क्रिया से समझाते थेl

 

परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी कहा करते थे, देखना एक तरह से परखना हैl देखना चर्म चक्षुओं से देखना होता है, अंतरात्मा की आंखों से देखना असल में दर्शन हैl दर्शन मतलब जो हमारे जीवन का हिस्सा बन जाएl दर्शन मतलब जो हमारे विचार का नेतृत्वकर्ता बन जाएl दर्शन यानी हमारे विचारों के साथ सदा रिफ्लेक्ट होने वाली एक क्रिया बन जाएl दर्शन मतलब वह जो हम हैं या जिनके सहारे हम जीवन को जीते हैंl जिनके सहारे हम संसार को देखते हैंl जिसके माध्यम से हम ईश्वर को समझते हैंl जिसके माध्यम से हम दुनिया को समझते हैंl जिसके माध्यम से हम जीवन को समझते हैंl जिसके माध्यम से हम जीवन में होते हैंl उसे दर्शन कहते हैंl दर्शन किसी मूर्ति, किसी प्रत्यक्ष, किसी हाड़मांस से बने ईश्वरीय शरीर के सामने खड़े हो जाना नहीं होताl दर्शन भीतर बैठे परमात्मा को पहचाना हैl परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी कहा करते थे…

सत्य बोलो, पूरा तौलो
फिर मन चाहे जहां डोलो
बाहर की बंद करो
अंदर की खोलो

 

इसका अर्थ यह है, आप जितने भीतर जाएंगे उतने ईश्वर के निकट होंगेl निकट का मतलब अपने आप के निकट जाना होता हैl अपने आप के निकट जाने का मतलब अपनी अभिलाषाओं, वासनाओं, इच्छाओं, रुचियों में खो जाना नहीं होता, बल्कि इनसे पूरी तरह से निर्लेप होना होता हैl जाने का अर्थ होता है अपने भीतर ऐसे हो जाना जैसे हम सब जानते हैं और स्वयं ही अपने आप में ऐसे अंश है जिसे सीधे विधाता ने बनाया हैl भीतर की बुराइयां हमसे पैदा नहीं हुई, बल्कि ये हमें रोकने के बैरियर्स हैंl जब हम इतना विलगीकरण कर देते हैं, तब समझ में आता है कि ईश्वर तो हमारे भीतर ही हैंl परमहंस श्रीराम बाबाजी इस तथ्य को अपनी जीवन यात्राओं में सदा समझाते रहे, जिन्हें समझ आया उनका कल्याण हुआl
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