सरकार को एथनॉल-मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम में लचीला रुख अपनाने की जरूरत: इक्रियर रिपोर्ट
सरकार को एथनॉल-मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम में लचीला रुख अपनाने की जरूरत: इक्रियर रिपोर्ट
नयी दिल्ली, आठ सितंबर (भाषा) सरकार को एथनॉल-मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम में लचीला रुख अपनाते हुए ई20 के लक्ष्य को दीर्घकालिक उद्देश्य के रूप में बनाए रखना चाहिए। साथ ही, घरेलू स्तर पर एथनॉल की उपलब्धता कम होने पर अस्थायी रूप से ई15 मिश्रण की अनुमति दी जा सकती है। इक्रियर के एक शोधपत्र में यह सुझाव दिया गया है।
‘फूड वर्सेस फ्यूल: रीकैलिब्रेटिंग इंडियाज एथनॉल ब्लेंडिंग स्ट्रैटेजी’ (खाद्य बनाम ईंधन: भारत की एथनॉल मिश्रण नीति में नए सिरे से संतुलन की जरूरत) शीर्षक वाले शोधपत्र में कहा गया कि ई20 को बनाए रखने, एथनॉल का आयात करने और अस्थायी रूप से मिश्रण घटाने के बीच चुनाव मौजूदा परिस्थितियों में इन विकल्पों की आर्थिक लागत के आधार पर किया जाना चाहिए।
कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी सहित अन्य लेखकों द्वारा तैयार शोधपत्र में कहा गया, ‘‘इस तरह की व्यवस्था से दीर्घकालिक लक्ष्य से समझौता किए बिना कार्यक्रम को कृषि क्षेत्र में अस्थायी झटकों के अनुरूप प्रतिक्रिया देने में मदद मिलेगी।’’
भारत ने एथनॉल-मिश्रित पेट्रोल (ईबीपी) कार्यक्रम का तेजी से विस्तार किया है। एथनॉल का उत्पादन गन्ना, मक्का और अधिशेष चावल जैसी कृषि जिंसों से किया जाता है।
शोधपत्र में कहा गया, ‘‘अंतिम सुरक्षा उपाय मिश्रण की दर में ही लचीलापन होना चाहिए। 20 प्रतिशत का लक्ष्य दीर्घकालिक उद्देश्य बना रह सकता है। वहीं, जिन वर्षों में घरेलू स्तर पर एथनॉल की उपलब्धता अपर्याप्त हो या ई20 को बनाए रखने की लागत खाद्य और/या पशु चारे की कीमतों के लिहाज से असामान्य रूप से अधिक हो जाए, उन वर्षों में अस्थायी रूप से ई15 मिश्रण पर विचार किया जा सकता है।’’
इस कार्यक्रम का उद्देश्य आयातित जीवाश्म ईंधन (कच्चा तेल, कोयला आदि) पर निर्भरता कम करना और घरेलू स्तर पर उत्पादित नवीकरणीय ईंधन के इस्तेमाल को बढ़ाना है। सरकार ने ई20 का लक्ष्य तय किया है जिसके तहत पेट्रोल में मात्रा के हिसाब से 20 प्रतिशत तक एथनॉल होना चाहिए। भारत ने एथनॉल आपूर्ति वर्ष (नवंबर से अक्टूबर) 2025-26 में यह लक्ष्य हासिल कर लिया, जो मूल समयसीमा से पांच साल पहले है।
शोधपत्र में कहा गया कि इन सभी उपायों को मिलाकर एथनॉल-मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम को अधिक अनुकूल और परिस्थितियों के अनुसार बदलने योग्य बनाया जा सकता है।
इसमें कहा गया, ‘‘जब चीनी की आपूर्ति पर्याप्त हो तो चीनी से बनने वाला एथनॉल महत्वपूर्ण बना रह सकता है, लेकिन जब भंडार कम होने लगे तो चीनी को एथनॉल उत्पादन में लगाने की मात्रा सीमित की जानी चाहिए।’’
शोधपत्र के अनुसार, मक्का की उत्पादकता और बाजार में आपूर्ति बढ़ने के साथ एथनॉल की मांग का बड़ा हिस्सा मक्का से पूरा किया जाना चाहिए। वहीं, भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) का चावल मुख्य रूप से वास्तविक अतिरिक्त भंडार के लिए ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए लेकिन चावल का मूल्य बढ़ाकर कम से कम उसकी खरीद लागत के स्तर तक किया जाना चाहिए।
शोधपत्र में जोर दिया गया कि ऐसी लचीली कच्चा माल रणनीति की जरूरत है, जिससे कृषि आपूर्ति कम होने पर खाद्य बाजार पर अत्यधिक दबाव डाले बिना ई20 का लक्ष्य बनाए रखा जा सके।
एथनॉल बाजार पहले ही काफी बड़ा हो चुका है। तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) ने एथनॉल आपूर्ति वर्ष (ईएसवाई) 2023-24 में 6.79 अरब लीटर (679.04 करोड़ लीटर), 2024-25 में 10.33 अरब लीटर (1,033.31 करोड़ लीटर) और जून 2026 तक 7.05 अरब लीटर (705.43 करोड़ लीटर) एथनॉल खरीदा। इस पर क्रमशः करीब 48,757 करोड़ रुपये, 73,996 करोड़ रुपये और 49,577 करोड़ रुपये खर्च हुए, जिसमें जीएसटी और परिवहन लागत शामिल है।
वित्त वर्ष 2019-20 से 2025-26 के दौरान तेल विपणन कंपनियों को आपूर्ति किए गए एथनॉल की मात्रा 1.73 अरब लीटर (173.03 करोड़ लीटर) से बढ़कर अनुमानित 12 अरब लीटर (1,200 करोड़ लीटर) हो गई। छह साल में इसमें करीब 38 प्रतिशत की संचयी वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) रही।
इसके विपरीत, शोधपत्र में कहा गया कि एथनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाली गन्ना, मक्का और चावल जैसी कृषि जिंसों के उत्पादन में काफी धीमी गति से वृद्धि हुई।
शोधपत्र के अनुसार, ‘‘इसी अवधि में मक्का उत्पादन 11.4 प्रतिशत की सीएजीआर, चावल 4.4 प्रतिशत और गन्ना 5.1 प्रतिशत की सीएजीआर से बढ़ा।’’
इसमें कहा गया कि मिश्रण के लिए एथनॉल की मांग और उस मांग को पूरा करने के लिए कच्चे माल की आपूर्ति में वृद्धि के बीच बढ़ता अंतर खाद्य और ईंधन के बीच बढ़ते समझौते की स्थिति पैदा कर रहा है।
शोधपत्र में कहा गया कि इसका असर चीनी बाजार में पहले ही दिखाई दे रहा है। कम शुरुआती भंडार और कम उत्पादन के साथ चीनी के औसत खुदरा मूल्य में 44 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह जुलाई में 45 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़कर 29 अगस्त तक 65 रुपये प्रति किलोग्राम हो गया।
इसमें एथनॉल मिश्रण नीति के लिए अधिक अनुकूल और बाजार आधारित दृष्टिकोण अपनाने की वकालत की गई है।
इसमें कमी के दौरान तत्काल राहत के लिए चीनी के आयात का इस्तेमाल करने, एफसीआई के चावल को मुख्य रूप से वास्तविक अतिरिक्त भंडार तक सीमित रखने और उसकी कीमत को कम से कम खरीद लागत के करीब लाने, कृषि परिस्थितियों के अनुसार कच्चे माल का आवंटन करने तथा कच्चे माल और एथनॉल के आयात के लिए अधिक खुले रुख की सिफारिश की गई है।
भाषा निहारिका रमण
रमण

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