ईंधन घाटे की भरपाई के लिए सरकार ने लगायी रिफाइनरी मार्जिन की सीमा
ईंधन घाटे की भरपाई के लिए सरकार ने लगायी रिफाइनरी मार्जिन की सीमा
नयी दिल्ली, नौ अप्रैल (भाषा) ईंधन निर्यात पर अप्रत्याशित लाभ कर लगाने के बाद, भारत ने घरेलू ईंधन बिक्री में नुकसान की भरपाई के लिए रिफाइनरी मार्जिन पर सीमा तय की है। सूत्रों ने यह जानकारी दी है।
पश्चिम एशिया में युद्ध के दो दीर्घकालिक प्रभाव हुए हैं। पहला, अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतों में तेजी के कारण पेट्रोल और डीजल की बिक्री में रिकॉर्ड नुकसान हुआ है क्योंकि खुदरा कीमतों में उसी अनुपात में बदलाव नहीं हुआ है। दूसरा, इससे रिफाइनरियों का मार्जिन काफी बढ़ गया है, जो खुदरा कीमतों में कोई बदलाव न होने के बावजूद अपने उत्पादों की कीमत आयातित लागत पर तय करती हैं।
सरकार ने पिछले महीने डीजल और विमान ईंधन (एटीएफ) के निर्यात पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (एसएईडी) लगाया था, ताकि रिफाइनरी के अप्रत्याशित लाभ पर अंकुश लगाया जा सके और वैश्विक बाजारों में कमी के बीच घरेलू ईंधन की उपलब्धता को बढ़ाया जा सके।
सूत्रों ने कहा कि इसके साथ ही, अब रिफाइनरी के मार्जिन को 15 डॉलर प्रति बैरल तक सीमित कर दिया गया है। इस सीमा से ऊपर की किसी भी कमाई को सरकारी विपणन कंपनियों को बेचे गए ईंधन पर छूट के रूप में माना जाएगा। अतिरिक्त लाभ को खुदरा नुकसान की भरपाई के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा।
पेट्रोलियम विपणन कंपनियों (ओएमसी) ने 26 मार्च को पेट्रोलियम उत्पादों की दरें निर्धारित कीं, जो आयात लागत से 60 रुपये प्रति लीटर तक कम हैं। ओएमसी ने रिफाइनरी हस्तांतरण मूल्य पर छूट देने का निर्णय लिया है ताकि रिफाइनरियों को पेट्रोल और डीजल जैसे ईंधन की आयात-समता लागत से कम भुगतान किया जा सके। रिफाइनरी हस्तांतरण मूल्य (आरटीपी) वह आंतरिक मूल्य है जिस पर रिफाइनरी विपणन इकाइयों को ईंधन बेचती हैं।
मार्च के दूसरे पखवाड़े के लिए, डीजल पर 22,342 रुपये प्रति किलोलीटर (22.34 रुपये प्रति लीटर) की छूट निर्धारित की गई। इससे आरटीपी 85,349 रुपये प्रति किलोलीटर से घटकर 63,007 रुपये प्रति किलोलीटर हो गया है।
अप्रैल के पहले पखवाड़े के लिए, डीजल पर छूट 60,239 रुपये प्रति किलोलीटर निर्धारित की गई है, जिससे आरटीपी 1,46,243 रुपये प्रति किलोलीटर से घटकर 86,004 रुपये प्रति किलोलीटर रह गया है। एटीएफ पर, 50,564 रुपये प्रति किलोलीटर की छूट के बाद, आरटीपी को 1,27,486 रुपये प्रति किलोलीटर से घटाकर 76,923 रुपये प्रति किलोलीटर कर दिया गया है।
उन्होंने बताया कि 46,311 रुपये प्रति किलोलीटर की छूट के बाद केरोसिन का आरटीपी 1,23,845 रुपये प्रति किलोलीटर से घटाकर 77,534 रुपये प्रति किलोलीटर कर दिया गया है।
परंपरागत रूप से, भारत में पेट्रोल और डीजल का मूल्य आयात समता के आधार पर निर्धारित किया जाता है। इसका अर्थ है कि ईंधन का मूल्य आयातित ईंधन की तरह लगाया जाता है। भले ही देश में मुख्य रूप से कच्चा तेल आयात किया जाता है और स्थानीय स्तर पर परिष्कृत किया जाता है।
जून, 2006 तक पेट्रोलियम विपणन कंपनियों को इन उत्पादों का रिफाइनरी हस्तांतरण आयात समता मूल्य पर आधारित था, जिसके बाद सरकार ने व्यापार समता मूल्य निर्धारण (टीपीपी) को अपनाया। टीपीपी एक ऐसा मानक है जो आयात समता मूल्य को 80 प्रतिशत और निर्यात समता मूल्य को 20 प्रतिशत भारांश देता है।
इस मूल्य निर्धारण ने रिफाइनरी मार्जिन बना रहा। विशेष रूप से उन स्वतंत्र रिफाइनरियों का, जिनके पास पेट्रोल और डीजल पर विपणन मार्जिन का लाभ नहीं था। इनकी कीमतों को सरकार ने क्रमशः 2010 और 2014 में नियंत्रणमुक्त कर दिया था।
नियंत्रणमुक्त होने के बावजूद, पेट्रोल और डीजल की कीमतें लागत के अनुरूप नहीं बढ़ी हैं और अप्रैल, 2022 से स्थिर हैं। इससे कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि होने पर तेल और डीजल कंपनियां नुकसान उठा रही हैं और कीमतें गिरने पर भारी मुनाफा कमा रही हैं।
सूत्रों ने बताया कि रिफाइनरी हस्तांतरण मूल्य पर छूट ऐसे समय में दी गई है जब पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर नुकसान बढ़ गया है।
उन्होंने यह भी बताया कि खाना पकाने की गैस एलपीजी के विपरीत, सरकार वाहन ईंधन पर होने वाले नुकसान के लिए तेल और डीजल कंपनियों को क्षतिपूर्ति नहीं देती है।
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने एक अप्रैल को सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर लिखा था, ‘‘पिछले एक महीने में वैश्विक पेट्रोलियम कीमतों में 100 प्रतिशत तक की वृद्धि के कारण, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल और गैस कंपनियों को एक अप्रैल, 2026 की स्थिति के अनुसार खुदरा विक्रय मूल्य पर पेट्रोल की बिक्री पर 24.40 रुपये प्रति लीटर और डीजल के मामले में 104.99 रुपये प्रति लीटर का नुकसान (अंडर रिकवरी) हो रहा है।
पेट्रोलियम विपणन कंपनियों का मानना है कि आरटीपी को स्थिर रखने से रिफाइनरी प्रणाली में वित्तीय बोझ प्रभावी रूप से वितरित हो जाएगा, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि इससे सीमित विपणन क्षमता वाली स्वतंत्र रिफाइनरी कंपनियों पर असमान रूप से प्रभाव पड़ सकता है।
भाषा रमण अजय
अजय

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