नयी दिल्ली, 11 मार्च (भाषा) भारत, वैश्विक क्षमता केंद्रों (जीसीसी) का निर्विवाद वैश्विक केंद्र बनकर उभरा है और दुनिया भर के ऐसे 55 प्रतिशत से अधिक केंद्र यहां स्थित हैं। हालांकि इन नवाचार केंद्रों को केंद्रीय, राज्य एवं स्थानीय स्तर पर 500 से अधिक अलग-अलग कानूनी दायित्वों और हर वर्ष 2,000 से अधिक अनिवार्य अनुपालन (फाइलिंग) वाली जटिल नियामकीय प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
भारत की प्रमुख नियामक प्रौद्योगिकी ‘टीमलीज रेगटेक’ ने अध्ययन ‘भारत में वैश्विक क्षमता केंद्र: क्षमता का विकास, अनुपालन सुनिश्चित करना’ में कहा कि तेज विस्तार और 64.6 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक के निर्यात राजस्व में योगदान के बावजूद ये जीसीसी किसी भी उद्यम व्यवस्था में लागू सबसे व्यापक अनुपालन ढांचों में से एक के अंतर्गत काम करते हैं।
अध्ययन में कहा गया, ‘‘ एक सामान्य वैश्विक क्षमता केंद्र की स्थापना के लिए आवश्यक अनुपालन को सात श्रेणियों में बांटा जा सकता है। प्रत्येक श्रेणी में कई कानून, नियम एवं विनियम शामिल होते हैं जिनकी लागू होने की सीमा, केंद्र के आकार, प्रकृति एवं संचालन पर निर्भर करती है।’’
इसके अनुसार, कर्नाटक में विशेष आर्थिक क्षेत्र के अंतर्गत पंजीकृत और 1,000 लोगों के बैठने की क्षमता वाले एक वैश्विक क्षमता केंद्र (जीसीसी) को 537 दायित्वों का पालन करना पड़ता है। हालांकि जब इन दायित्वों की वार्षिक आवृत्ति को जोड़ा जाता है तो यह संख्या बढ़कर 2,051 हो जाती है।
अध्ययन में कहा गया कि निरंतर एवं परिस्थितियां-आधारित अनुपालन आवश्यकताओं के कारण यह संख्या और भी अधिक हो सकती है क्योंकि इनकी कोई निश्चित आवृत्ति नहीं होती।
संचालन को निरंतर बनाए रखने के लिए एक औसत केंद्र को हर महीने 81, हर तिमाही 185 और हर वर्ष 194 प्रकार के अनुपालन दस्तावेज दाखिल करने होते हैं। इसके अलावा कर्मचारियों की संख्या बढ़ने या कारोबार के विस्तार के कारण घटना-आधारित अतिरिक्त आवश्यकताएं भी सामने आती हैं।
अनुपालन ढांचा श्रम, कर एवं पर्यावरण संबंधी कानूनों तक फैला हुआ है जिसमें केंद्र, राज्य तथा स्थानीय स्तर के कुल 18 नियामक निकाय शामिल हैं।
वैश्विक क्षमता केंद्र (जीसीसी), बहुराष्ट्रीय कंपनियों के स्वामित्व एवं संचालन वाले विशेष विदेशी इकाई केंद्र होते हैं। शुरुआत में इन्हें नियमित ‘बैक-ऑफिस’ और सूचना प्रौद्योगिकी सहायता के लिए लागत बचाने वाले विस्तार के रूप में स्थापित किया गया था लेकिन समय के साथ ये रणनीतिक वैश्विक केंद्रों के रूप में विकसित हो गए हैं।
आज ये केंद्र अपनी मूल कंपनियों के लिए उत्पाद अभियांत्रिकी, कृत्रिम मेधा अनुसंधान, डिजिटल रूपांतरण और वैश्विक अनुपालन प्रबंधन जैसे उच्च-मूल्य कार्यों को संचालित कर रहे हैं।
ये केंद्र मुख्य रूप से प्रौद्योगिकी सेवाओं, बैंकिंग व वित्तीय सेवाओं, विनिर्माण, जीवन विज्ञान और अभियांत्रिकी जैसे क्षेत्रों में केंद्रित हैं। उन्नत डिजिटल क्षमताओं की बढ़ती मांग के कारण कृत्रिम मेधा (एआई), साइबर सुरक्षा व क्लाउड कंप्यूटिंग से जुड़े शीर्ष पदों के वेतन में हर वर्ष 18 से 22 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है।
अध्ययन में गैर-अनुपालन के गंभीर जोखिमों का उल्लेख करते हुए बताया गया कि दंड संबंधी जोखिमों में सबसे बड़ा हिस्सा श्रम एवं रोजगार कानूनों का है जिनसे जुड़े 151 दायित्व हैं। विशेष रूप से, केंद्र व राज्य स्तर के 90 ऐसे प्रावधानों में से, जिनमें कारावास का प्रावधान है तथा 60 सीधे श्रम कानूनों से जुड़े हैं। इसके बाद राजस्व संबंधी कानून एवं कॉरपोरेट प्रशासन से जुड़े प्रावधान आते हैं।
भौगोलिक स्थिति भी अनुपालन परिणामों को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाती है।
अध्ययन में कर्नाटक का उदाहरण देते हुए कहा गया कि राज्य के 2025-26 के बजट में ‘नियोक्ता अनुपालन अपराधमुक्ति विधेयक’ पेश किया गया है।
इस कानून का उद्देश्य कुछ अनुपालन उल्लंघनों के लिए आपराधिक दंड को समाप्त कर उसकी जगह आर्थिक जुर्माना या दीवानी कार्रवाई का प्रावधान करना है जिससे व्यवसायों पर परिचालन संबंधी बोझ कम हो सके।
टीमलीज रेगटेक के सह-संस्थापक एवं मुख्य कार्यपालक अधिकारी ऋषि अग्रवाल ने कहा, ‘‘ भारत के जीसीसी जैसे-जैसे एआई एवं साइबर सुरक्षा के लिए तीव्र गति से विकसित हो रहे हैं, वे अब ‘मैन्युअल’, प्रतिक्रियात्मक प्रक्रियाओं की परिचालन संबंधी बाधाओं को बर्दाश्त नहीं कर सकते जो किसी संगठन को अनजाने में अनुपालन में बनाए रखती हैं।’’
उन्होंने कहा कि तेजी से बदलते नियामकीय परिदृश्य में वास्तविक अनुपालन क्षमता हासिल करना ‘‘रणनीतिक आवश्यकता’’ बन गया है ताकि कानूनी समझौतों से समझौता किए बिना नवाचार का विस्तार किया जा सके।
भाषा निहारिका मनीषा
मनीषा