भारत को राज्यों में कृषि सूक्ष्म-पोषक तत्वयुक्त उत्पादों के लिए एकल लाइसेंस की आवश्यकता : रिपोर्ट
भारत को राज्यों में कृषि सूक्ष्म-पोषक तत्वयुक्त उत्पादों के लिए एकल लाइसेंस की आवश्यकता : रिपोर्ट
मुंबई, पांच फरवरी (भाषा) भारत को कृषि क्षेत्र के लिए सूक्ष्मपोषक तत्व वाले उत्पादों के निर्माण, आयात और बिक्री के लिए सभी राज्यों में मान्य एक केंद्रीकृत लाइसेंस शुरू करना चाहिए। इंडियन माइक्रो फर्टिलाइजर्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (आईएमएमए) और यस बैंक की बृहस्पतिवार को जारी एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है।
रिपोर्ट में कहा गया, ‘‘इससे एक ही उत्पाद, फॉर्मूलेशन या विनिर्माण इकाई के लिए कई राज्यों में पंजीकरण की ज़रूरत खत्म हो जाएगी और व्यापार करने में आसानी होगी तथा नवाचार वाले उत्पादों के विकास में मदद मिलेगी।’’
‘सूक्ष्मपोषक तत्व – भारत में बनाने का अवसर’ शीर्षक वाली यह रिपोर्ट मुंबई में छठे फसल पोषण सम्मेलन में पेश की गई।
इसमें उत्पाद पंजीकरण, लाइसेंसिंग, नवीनीकरण और संशोधनों के लिए एक एकल-खिड़की डिजिटल पोर्टल बनाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया, जिससे डॉसियर, टेस्ट रिपोर्ट और अनुपालन दस्तावेज़ों को समयबद्ध मंज़ूरी के साथ ऑनलाइन जमा किया जा सके।
अध्ययन में उत्पाद विकास में तेज़ी लाने और निर्यात-उन्मुख विनिर्माण का समर्थन करने के लिए जिंस पोषकतत्व वाले ‘सॉल्ट’, मानक फॉर्मूलेशन और अभिनव या उन्नत फॉर्मूलेशन के लिए लाइसेंसिंग आवश्यकताओं में अंतर करने की सिफारिश की गई।
इसमें परिणाम और प्रदर्शन-आधारित नियमों की ओर बढ़ने का भी आह्वान किया गया, जिससे निरंतर नवाचार के लिए मंज़ूरी में तेज़ी आएगी, स्पष्ट उत्पाद वर्गीकरण, सही लेबलिंग और मज़बूत बाज़ार निगरानी सुनिश्चित होगी।
रिपोर्ट में ‘साथी’ (सीड उद्गम स्थान, प्रमाणीकरण एवं पूर्ण भंडार) के समान सूक्ष्म पोषक तत्व के लिए एक एकीकृत पोर्टल शुरु करने की सिफारिश की गई, जो एक राष्ट्रीय डिजिटल मंच है जो ‘क्यूआर’ और ‘बार कोड टैगिंग’ का उपयोग करके निर्माण स्थल से किसान तक बीजों की आवाजाही की निगरानी करता है।
इसमें शुल्क को युक्तिसंगत बनाने, आदान लागत को कम करने और घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित करने के लिए उर्वरक नियंत्रण आदेश के तहत उर्वरक पहचान के साथ सीमा शुल्क वर्गीकरण के बीच तालमेल बिठाने का सुझाव दिया गया।
अध्ययन में बताया गया है कि भारत का फसल सूक्ष्मपोषक तत्व का बाजार वित्त वर्ष 2023-24 में 5,000 करोड़ रुपये का था, और अनुमान है कि वित्त वर्ष 2029-30 तक यह लगभग 13,000 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा।
इसमें यह भी बताया गया है कि जस्ता-आधारित उत्पादों की खपत सबसे ज़्यादा है, इसके बाद लौह, बोरोन और बहु-सूक्ष्मपोषक तत्व मिश्रण आते हैं, जबकि ‘चीलेटेड फ़ॉर्मूलेशन’ सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला खंड है।
आईएमएमए के अध्यक्ष, राहुल मीरचंदानी ने कहा, ‘‘रिपोर्ट में दिए गए सुझाव व्यावहारिक, दूरदर्शी और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप हैं।’’
आईएमएमए के सदस्य भारत के सूक्ष्मपोषक तत्व उद्योग के 80 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं।
भाषा राजेश राजेश अजय
अजय

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