नयी दिल्ली, सात जनवरी (भाषा) भारत को आयातित तैयार चांदी पर निर्भरता कम करने तथा आयात स्रोतों में विविधता लाकर इसके प्रसंस्करण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। आर्थिक शोध संस्थान जीटीआरआई ने एक रिपोर्ट में यह बात कही।
रिपोर्ट में कहा गया कि विश्व में चांदी का सबसे अधिक प्रसंस्करण चीन में किया जाता है। चीन वैश्विक स्तर पर 6.3 अरब अमेरिकी डॉलर के चांदी अयस्क एवं सांद्रण के आयात में से करीब 5.6 अरब अमेरिकी डॉलर का आयात करता है। यह धातु को घरेलू स्तर पर परिष्कृत करता है और इलेक्ट्रॉनिक, चिकित्सकीय उपकरणों और सौर पैनल में प्रयुक्त उच्च मूल्य वाली चांदी का निर्यात करता है।
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा, ‘‘ घरेलू मूल्यवर्धन के लिए भारत को अयस्क अवस्था से ही चांदी को संसाधित करना सीखना होगा।’’
वित्त वर्ष 2024-25 में, भारत ने केवल 47.84 करोड़ अमेरिकी डॉलर के चांदी उत्पादों का निर्यात किया जबकि 4.83 अरब अमेरिकी डॉलर का आयात भी किया जो इसकी गहरी आयात निर्भरता को रेखांकित करता है।
वर्ष 2025 में यह निर्भरता तेजी से बढ़ी। केवल अक्टूबर में आयात बढ़कर 2.7 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया जो पिछले वर्ष की तुलना में 529 प्रतिशत अधिक है। इसके बाद नवंबर में यह 1.1 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया जो सालाना आधार पर 126 प्रतिशत की वृद्धि है।
कुल आयात जनवरी-नवंबर 2025 के दौरान 8.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया और समूचे वर्ष के लिए इसका अनुमान 9.2 अरब अमेरिकी डॉलर है। यह 2024 की तुलना में करीब 44 प्रतिशत अधिक है। अप्रैल-अक्टूबर 2025 के दौरान भारत ने 5.94 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य की चांदी का आयात किया।
उन्होंने कहा, ‘‘ भारत को चांदी को महज एक कीमती वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण औद्योगिक एवं ऊर्जा-बदलाव धातु के रूप में मान्यता देनी चाहिए और इसे अपनी खनिज तथा स्वच्छ ऊर्जा रणनीति में एकीकृत करना चाहिए।’’
श्रीवास्तव ने कहा कि इसके लिए विदेशी खनन साझेदारियों के माध्यम से दीर्घकालिक आपूर्ति सुनिश्चित करना और आयातित तैयार चांदी पर निर्भरता कम करने के लिए घरेलू शोधन एवं पुनर्चक्रण क्षमता को प्रोत्साहित करने के साथ ही कुछ व्यापारिक केंद्रों से परे आयात स्रोतों में विविधता लाना आवश्यक होगा।
जीटीआरआई के संस्थापक ने कहा, ‘‘ खंडित होती वैश्विक व्यवस्था में, चांदी की सुरक्षा उतनी ही महत्वपूर्ण होती जा रही है जितनी ऊर्जा की सुरक्षा। भारत के नीतिगत ढांचे में यह बदलाव दिखना चाहिए।’’
उन्होंने कहा कि सोने के विपरीत, चांदी की आपूर्ति श्रृंखलाएं कहीं कम पारदर्शी हैं। यह एक ऐसी कमजोरी है जो बढ़ती प्रतिस्पर्धा के साथ रणनीतिक महत्व प्राप्त कर रही है।
आयात में विविधता लाना महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन ने निर्यात नियंत्रण को कड़ा कर दिया है और एक जनवरी 2026 से चांदी के निर्यात को लाइसेंस-आधारित प्रणाली में स्थानांतरित कर दिया है।
नए नियमों के तहत, केवल अनुमोदित कंपनियां ही चांदी का निर्यात कर सकती हैं। प्रत्येक खेप के लिए सरकारी अनुमति आवश्यक है जिससे पुरानी कोटा व्यवस्था का स्थान ले लिया गया है।
उन्होंने कहा कि हालांकि यह पूर्णतः निर्यात प्रतिबंध नहीं है लेकिन इसने वैश्विक आपूर्ति संबंधी चिंताओं को बढ़ा दिया है और कीमतों में नई अस्थिरता उत्पन्न की है। विशेष रूप से चांदी प्रसंस्करण में चीन की केंद्रीय भूमिका को देखते हुए।
नई खनन क्षमता को सीमित करने एवं प्रौद्योगिकी उपयोगों के तेजी से विस्तार के साथ चांदी को भविष्य के औद्योगिक एवं ऊर्जा प्रभुत्व से सीधे तौर पर जुड़ी धातु के रूप में देखा जा रहा है।
वैश्विक चांदी की मांग का वर्तमान में 55-60 प्रतिशत हिस्सा औद्योगिक है जो इलेक्ट्रॉनिक, सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों, रक्षा उपकरणों और चिकित्सकीय प्रौद्योगिकियों द्वारा संचालित है।
इसके अलावा उन्होंने कहा कि हरित ऊर्जा में चांदी की भूमिका विशेष रूप से परिवर्तनकारी है क्योंकि यह सौर ‘फोटोवोल्टिक सेल्स’ में एक महत्वपूर्ण घटक है, जहां इसका उपयोग दक्षता में सुधार के लिए एक ‘कंडक्टिव पेस्ट’ के रूप में किया जाता है।
सौर ऊर्जा में पहले से ही वैश्विक चांदी की मांग का लगभग 15 प्रतिशत हिस्सा जाता है और नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के विस्तार के साथ यह हिस्सा तेजी से बढ़ रहा है। चिकित्सकीय एवं स्वास्थ्य सेवा में, चांदी के जीवाणुरोधी गुणों का उपयोग घाव की पट्टियों, चिकित्सकीय उपकरणों की कोटिंग, कैथेटर, शल्य चिकित्सा उपकरणों, जल शोधन प्रणालियों और औषधीय यौगिकों में किया जाता है।
यह धातु आभूषणों, चांदी के बर्तनों तथा सिक्कों में प्रमुखता से उपयोग की जाती है विशेष रूप से भारत जैसे देशों में जहां सांस्कृतिक मांग गहराई से निहित है।
अब इसका रणनीतिक महत्व हालांकि मुख्य रूप से उद्योग जगत से आता है। चांदी में किसी भी धातु की तुलना में सबसे अधिक विद्युत एवं तापीय चालकता होती है जो इसे इलेक्ट्रॉनिक, सर्किट बोर्ड, कनेक्टर, बैटरी और ऑटोमोटिव सिस्टम के लिए अपरिहार्य बनाती है।
चांदी के अयस्कों और सांद्रों का व्यापार पिछले दो दशकों में 2000 में मात्र 0.1 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2024 में 6.27 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया।
परिष्कृत चांदी का व्यापार और भी तेजी से बढ़ा है। चांदी की छड़ों, सिल्लियों, छड़ों, तारों, पाउडर और सर्राफा का वैश्विक व्यापार 2000 में 4.06 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2024 में 31.42 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया।
भाषा निहारिका मनीषा
मनीषा