Premanand Maharaj: आपके जाने के बाद आपके शिष्यों के लिए आपकी क्या आज्ञा है? जानिए प्रेमानंद महाराज का जवाब

Premanand Maharaj: वृंदावन के चर्चित संत श्री प्रेमानंद जी महाराज ने एक हालिया वायरल वीडियो और संवाद में अपने अनुयायियों को भावुक कर देने वाला संदेश दिया है।

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  • Publish Date - January 8, 2026 / 03:12 PM IST,
    Updated On - January 8, 2026 / 03:14 PM IST

PREMANAND MAHARAJ NEWS/ image source: IBC24

HIGHLIGHTS
  • राधा नाम जपना जीवन की राह
  • शिष्यों को भक्ति का पालन करना
  • सत्संग और साधना जीवन संवारें

वृंदावन: वृंदावन के चर्चित संत Premanand Maharaj ने एक हालिया वायरल वीडियो और संवाद में अपने अनुयायियों को भावुक कर देने वाला संदेश दिया है। यह संवाद तब हुआ जब एक भक्त ने उनसे भावनात्मक रूप से पूछा, “महाराज जी, आपके जाने के बाद हमें क्या करना चाहिए? आपके बाद हमारा क्या होगा?”  इस सवाल पर महाराज ने संतों की परंपरा के अनुरूप आश्वस्त व गहरा भावनात्मक उत्तर दिया।

Premanand Maharaj Pravachan: प्रेमानंद महाराज ने दिया जवाब

Premanand Maharaj ने कहा कि जीवन तो अस्थायी है और शरीर अंततः छोड़ना ही होता है, लेकिन नाम का ध्यान और भक्ति का मार्ग हमेशा शिष्यों के साथ रहेगा। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि शारीरिक रूप से वे एक दिन नहीं रहेंगे, लेकिन “राधा नाम” यानी भगवान राधा के नाम का जप और स्मरण सदैव शिष्यों के लिए मार्गदर्शक रहेगा। यह नामजप ही उनके जाने के बाद शिष्यों के जीवन में स्थिरता, कल्याण और आध्यात्मिक उन्नति का आधार बनेगा।

Premanand Maharaj latest News: शिष्यों को दिया अंतिम संदेश

Premanand Maharaj ने यह भी कहा कि शिष्य जीवन में सत्संग, नामजप और धर्म के रास्ते पर चलते रहें। उन्होंने जोर देकर कहा कि साधना तब तक जारी रखनी चाहिए जब तक आत्मा का लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता। साधना, नामस्मरण और भक्ति ही वह आज्ञा है जो वे अपने शिष्यों के लिए छोड़कर जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि भक्ति का मार्ग ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है और इससे ही शिष्य जीवन की अनिश्चितताओं और कठिनाइयों से उभर सकते हैं।

स्वास्थ्य की गंभीर स्थिति को लेकर सोशल मीडिया पर अक्सर चर्चाएँ होती रही हैं कि महाराज दोनों किडनियों के फेल होने के कारण नियमित डायलिसिस पर हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि शरीर चल जाएगा लेकिन नाम और भक्ति शाश्वत है। उन्होंने नामजप को जीवन का उद्देश्य बताया और शिष्यों से आग्रह किया कि वे अपने जीवन में इसे सर्वोच्च स्थान दें

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