बिलासपुर, आठ जुलाई (भाषा) हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले के घुमारवीं उपमंडल की लांझता ग्राम पंचायत में लीची बागान परियोजना की सफलता ने बदलाव की नई इबारत लिखी है।
इस सफलता ने एचपीएसएचआईवीए परियोजना की बदौलत पारंपरिक खेती से व्यावसायिक लीची उत्पादन की ओर बदलाव का भी संकेत दिया है।
कभी मौसमी फलों के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध 13.5 हेक्टेयर भूमि पर अब 54 किसानों द्वारा लगाए गए 10,000 से अधिक लीची के पौधे फल देने लगे हैं और पूरा क्षेत्र उनकी खुशबू से महक रहा है।
हिमाचल प्रदेश उपोष्णकटिबंधीय बागवानी, सिंचाई एवं मूल्य संवर्धन (एचपीएसएचआईवीए) परियोजना के तहत शुरू की गई इस पहल से जलवायु-अनुकूल बागवानी, आधुनिक सिंचाई और बाजार तक सीधी पहुंच का समावेश संभव हुआ है। इससे पारंपरिक फसलों पर निर्भरता कम होने के साथ किसानों की आजीविका में सुधार हुआ है।
इस बदलाव की शुरुआत वित्त वर्ष 2019-20 में हुई, जब लांझता ग्राम पंचायत को एचपीएसएचआईवीए परियोजना के तहत ‘फ्रंट लाइन डिमॉन्स्ट्रेशन’ (एफएलडी) के लिए चुना गया। शुरुआत में लीची के 500 पौधे लगाए गए और किसानों की सकारात्मक प्रतिक्रिया तथा परियोजना के सफल क्रियान्वयन के बाद वित्त वर्ष 2020-21 और 2021-22 के दौरान अतिरिक्त 9,505 पौधे लगाए गए।
राज्य बागवानी विभाग के अधिकारी किसानों को तकनीकी और वैज्ञानिक मार्गदर्शन उपलब्ध करा रहे हैं। इन प्रयासों और सुविधाओं से किसानों को सिंचाई, पौधों की नियमित देखभाल और निगरानी संबंधी चिंताओं से काफी हद तक राहत मिली है।
परियोजना के लाभार्थी किसान प्रकाश चंद ने अपनी भूमि पर लगभग 850 लीची के पौधे लगाए हैं।
उन्होंने बताया कि पौधे लगाते समय उन्हें संदेह था कि क्या ये भविष्य में आय का बड़ा स्रोत बन पाएंगे, लेकिन अब इन पेड़ों पर फल आने लगे हैं।
अन्य एक लाभार्थी लता देवी ने 834 लीची के पौधे लगाए हैं। उन्होंने बताया कि व्यावसायिक फल उत्पादन, विशेषकर लीची की खेती ने उनके जैसी अनेक ग्रामीण महिलाओं के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता के नए अवसर खोले हैं। इन पेड़ों पर पिछले वर्ष की तुलना में ज्यादा अच्छी गुणवत्ता के फल आने शुरू हो गए हैं।
बिलासपुर के उपायुक्त राहुल कुमार ने कहा कि इस परियोजना ने साबित किया है कि प्रभावी योजना क्रियान्वयन, आधुनिक प्रौद्योगिकी तथा किसानों की मेहनत के समन्वय से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा और नई गति दी जा सकती है।
भाषा निहारिका मनीषा
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