नाबार्ड के कार्यक्रम के तहत झारखंड के 250 से ज्यादा किसानों ने पर्यावरण अनुकूल खेती अपनाई

नाबार्ड के कार्यक्रम के तहत झारखंड के 250 से ज्यादा किसानों ने पर्यावरण अनुकूल खेती अपनाई

नाबार्ड के कार्यक्रम के तहत झारखंड के 250 से ज्यादा किसानों ने पर्यावरण अनुकूल खेती अपनाई
Modified Date: May 1, 2026 / 10:06 pm IST
Published Date: May 1, 2026 10:06 pm IST

(राघवेंद्र प्रताप सिंह)

रांची, 27 अप्रैल (भाषा) झारखंड के रामगढ़ जिले में 250 से अधिक किसानों ने नाबार्ड के आदिवासी विकास कार्यक्रम के तहत पर्यावरण अनुकूल खेती अपनाई है। अधिकारियों ने शुक्रवार को यह जानकारी दी।

अधिकारियों के अनुसार, किसानों ने बताया कि प्राकृतिक खेती के तरीकों को अपनाने के बाद उनकी लागत में काफी कमी आई है, फसलों में विविधता बढ़ी है और आमदनी में भी सुधार हुआ है।

पर्यावरण अनुकूल खेती एक समग्र दृष्टिकोण है, जिसमें कृषि प्रणालियों में पारिस्थितिक सिद्धांतों को लागू किया जाता है। इसका उद्देश्य स्थिरता, जैव विविधता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना है।

कोरी गांव में नाबार्ड के ‘जीवा’ कार्यक्रम के लाभार्थी देवालाल मुंडा ने बताया कि पहले वह अपनी 1.5 एकड़ जमीन पर केवल धान की खेती करते थे, जिसमें लगभग 22,000 रुपये की लागत आती थी। अब ‘जीवामृत’ (जैविक खाद) के उपयोग से यह लागत घटकर करीब 2,000 रुपये रह गई है।

मुंडा ने कहा, “नाबार्ड के हस्तक्षेप से हमारी आमदनी बढ़ी है, फसलों में विविधता आई है और हमने जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपनाया है। इसके अलावा, हमें स्थायी आजीविका के लिए प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण का प्रशिक्षण भी मिला है।”

उन्होंने बताया कि ‘जीवामृत’ तैयार करने के लिए 3,000 लीटर क्षमता की ‘बायो-डाइजेस्टर’ इकाई भी स्थापित की गई है।

मुंडा ने कहा, “प्राकृतिक खेती से मिट्टी में पोषक तत्वों का स्तर बेहतर हुआ है। केंचुए और अन्य लाभकारी सूक्ष्मजीव फिर सक्रिय हो गए हैं, जो पहले रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से नष्ट हो गए थे।”

अरमादाग गांव के किसान प्रेम बेदिया ने बताया कि नाबार्ड की ‘वाड़ी’ परियोजना के तहत वह अपनी तीन एकड़ जमीन पर आम की ‘आम्रपाली’ और ‘मालदाह’ किस्मों की खेती कर रहे हैं।

बेदिया ने कहा, “मैं वित्त वर्ष 2012-13 में इस परियोजना से जुड़ा। इसके बाद मैंने अपनी जमीन को बाग के रूप में विकसित किया और आम, अमरूद तथा मेड़ पर लगने वाले पौधों सहित करीब 180 पौधे लगाए, जिन्हें तैयार होने में लगभग आठ वर्ष लगे। अब मैं आम बेचकर सालाना करीब दो लाख रुपये कमा रहा हूं।”

बिचा गांव के किसान रामकुमार उरांव ने बताया कि वर्ष 2024 के मध्य में नाबार्ड के हस्तक्षेप के बाद उन्होंने बहु-फसली (पॉली-क्रॉपिंग) खेती अपनाई।

उरांव ने कहा, “अब मैं पांच एकड़ जमीन पर तरबूज, खीरा, टमाटर और कद्दू उगा रहा हूं। खेती में लागत करीब एक लाख रुपये है, जो पहले लगभग दोगुनी थी। उपज बेचकर मैं करीब 1.5 लाख रुपये का शुद्ध लाभ कमा रहा हूं।”

उन्होंने कहा कि बहु-फसली खेती से मिट्टी के पोषक तत्व बढ़े हैं, लागत घटी है और रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों पर निर्भरता कम हुई है।

रांची स्थित नाबार्ड के क्षेत्रीय कार्यालय के एक अधिकारी ने बताया कि आदिवासी विकास कार्यक्रम (टीडीपी) के तहत राज्य के सभी 24 जिलों में 64 परियोजनाएं संचालित की जा रही हैं, जिनसे करीब 39,000 आदिवासी परिवार लाभान्वित हो रहे हैं।

नाबार्ड की मुख्य महाप्रबंधक दीपमाला घोष ने कहा, “झारखंड में ‘जीवा’ पहल यह दर्शाती है कि मजबूत सामुदायिक संस्थाओं पर आधारित टिकाऊ कृषि ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक बदलाव ला सकती है। यह बदलाव किसानों की बढ़ती आय के साथ-साथ उनके आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता में भी परिलक्षित होता है।”

भाषा राजेश राजेश योगेश रमण

रमण


लेखक के बारे में