टिकाऊ वृद्धि के लिए सेवा निर्यात में विविधता लाने की जरूरत: वाणिज्य सचिव
टिकाऊ वृद्धि के लिए सेवा निर्यात में विविधता लाने की जरूरत: वाणिज्य सचिव
मुंबई, नौ सितंबर (भाषा) वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने बुधवार को कहा कि टिकाऊ वृद्धि हासिल करने के लिए भारतीय उद्योग को सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) तथा आईटी आधारित सेवाओं एवं पेशेवर सेवाओं के दो प्रमुख क्षेत्रों से आगे बढ़कर अपने सेवा निर्यात में विविधता लाने की जरूरत है।
‘ग्लोबल फिनटेक फेस्ट 2026’ में एक सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि वैश्विक वित्तीय सेवा क्षेत्र बढ़ रहा है और इसका आकार करीब 670 अरब अमेरिकी डॉलर है, लेकिन इसमें भारत की हिस्सेदारी केवल आठ अरब डॉलर है, जो वैश्विक व्यापार का एक प्रतिशत से कुछ ही अधिक है।
उन्होंने कहा, ‘‘यहां वित्तीय प्रौद्योगिकी (फिनटेक) कंपनियां बदलाव ला सकती हैं… आठ अरब अमेरिकी डॉलर में से 95 प्रतिशत डिजिटल तरीके से प्रदान की जाने वाली वित्तीय सेवाएं हैं। ये ऐसी सेवाएं हैं जिन्हें अपने देश में बैठे हुए सीमा पार उपलब्ध कराया जाता है। यह संभवत: भारत की ताकत है और इसी क्षेत्र में हम आगे बढ़ रहे हैं। अब समय आ गया है कि प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल के जरिये हमें इसमें विविधता लानी चाहिए।’’
उन्होंने कहा कि देश का सेवा निर्यात अच्छी वृद्धि दर्ज कर रहा है।
वित्त वर्ष 2025-26 में कुल 863 अरब अमेरिकी डॉलर के निर्यात में सेवा क्षेत्र का योगदान 421 अरब डॉलर रहा था।
सचिव ने बताया कि देश के सेवा निर्यात की वृद्धि की कहानी में प्रमुख चुनौतियों में से एक यह रही है कि यह दो प्रमुख क्षेत्रों यानी आईटी व आईटी आधारित सेवाओं तथा पेशेवर सेवाओं पर अधिक केंद्रित है।
आईटी या आईटी संबद्ध सेवाओं का भारत के कुल निर्यात में करीब 50 प्रतिशत हिस्सा है, जबकि पेशेवर सेवाओं की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत है।
अग्रवाल ने कहा, ‘‘फिलहाल हमारे सेवा निर्यात की बुनियाद इन दो क्षेत्रों पर टिकी है, लेकिन अगर हमें वृद्धि करनी है और लंबे समय तक सतत या टिकाऊ वृद्धि हासिल करनी है तो इसमें विविधता लानी होगी।’’
उन्होंने कहा कि भारत में दुनिया को विभिन्न प्रकार की सेवाएं उपलब्ध कराने की क्षमता है।
वाणिज्य सचिव ने लेनदेन की लागत और धन भेजने की लागत को कम करने के तरीकों पर विचार करने का भी सुझाव दिया।
उन्होंने कहा कि वैश्विक सीमा पार भुगतान बाजार करीब 182-190 अरब अमेरिकी डॉलर का है और 2032 तक इसके बढ़कर 350-360 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। इसी तरह, कार्ड व भुगतान का मौजूदा बाजार करीब एक हजार अरब अमेरिकी डॉलर का है, जिसके 2028-29 तक बढ़कर 1,500 अरब अमेरिकी डॉलर होने की उम्मीद है।
उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए इन क्षेत्रों में हर वर्ष नौ से 10 प्रतिशत की वास्तविक वृद्धि हो रही है। भारत के पास भी ऐसे कुछ अनुभव हैं, जहां हमने बड़ी आबादी के स्तर पर वित्तीय प्रौद्योगिकी समाधान तैयार किए हैं।’’
उन्होंने कहा कि यूपीआई डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का ऐसा ही एक उदाहरण है, जिसके जरिये भारत ने वित्तीय समावेश, पहुंच और लेनदेन लागत में कमी के क्षेत्र में अपनी क्षमता साबित की है।
अग्रवाल ने कहा कि भारत इस क्षेत्र में दुनिया के अन्य देशों के साथ मिलकर जरूरत के अनुरूप समाधान उपलब्ध करा सकता है।
भाषा निहारिका अजय
अजय

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