भारतीय कृषि के लिए पासा पलटने वाली साबित हो सकती है नई बीज प्रौद्योगिकी : अधिकारी

भारतीय कृषि के लिए पासा पलटने वाली साबित हो सकती है नई बीज प्रौद्योगिकी : अधिकारी

भारतीय कृषि के लिए पासा पलटने वाली साबित हो सकती है नई बीज प्रौद्योगिकी : अधिकारी
Modified Date: March 10, 2026 / 09:19 pm IST
Published Date: March 10, 2026 9:19 pm IST

नयी दिल्ली, 10 मार्च (भाषा) वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों और कृषि वैज्ञानिकों ने कहा है कि प्रत्यक्ष धानबीज रोपाई (डीएसआर) प्रौद्योगिकी कई राज्यों में ‘उत्साहजनक नतीजे’ दिखा रही है और संभावित रूप से भारत के धान की खेती वाले 60 प्रतिशत तक क्षेत्र को अपने दायरे में ला सकती है। उन्होंने भूजल संकट के गहराने के बीच जल-कुशल खेती प्रणालियों को तत्काल अपनाने का आह्वान किया।

डीएसआर पर एक सम्मेलन में कृषि आयुक्त पी.के. सिंह ने कहा कि भारतीय कृषि को बदलने के लिए नई बीज प्रौद्योगिकी और फसल सुरक्षा से जुड़े नए आविष्कार बहुत महत्वपूर्ण होंगे।

उन्होंने कहा, ‘‘हम सक्रिय रूप से नए बायोलॉजिकल्स, बेहतर फसल सुरक्षा रसायन और अगली पीढ़ी की बीज प्रौद्योगिकी पर विचार कर रहे हैं, जिनमें संकर और जीन-संशाधित किस्में शामिल हैं। जब इन प्रौद्योगिकियों को बेहतर कृषि पद्धतियों के साथ जोड़ा जाता है, तो ये भारतीय कृषि के लिए वास्तव में रूपांतरकारी हो सकती हैं और हमें अधिक टिकाऊ खेती प्रणालियों की ओर बढ़ने में मदद कर सकती हैं।’’

पीपीवीएफआरए (पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण) के चेयरपर्सन त्रिलोचन महापात्र ने कहा कि डीएसआर में चावल की खेती की दक्षता में काफी सुधार करने की क्षमता है, साथ ही यह आदान लागत को भी कम करता है।

उन्होंने कहा कि भारत में लगभग 4.4 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर चावल की खेती होती है; ऐसे में डीएसआर को आंशिक रूप से भी अपनाने से भूजल, सिंचाई ऊर्जा और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में ‘भारी बचत’ हो सकती है।

उन्होंने कहा, ‘हमारा अनुमान है कि कृषि-पारिस्थितिक स्थितियों के आधार पर भारत के चावल वाले क्षेत्र का 20-60 प्रतिशत हिस्सा संभावित रूप से डीएसआर में बदल सकता है।’

हालांकि, महापात्र ने आगाह किया कि नई कृषि प्रौद्योगिकी को अपनाना ‘अक्सर धीमा और चुनौतीपूर्ण’ रहा है, और इस बात पर जोर दिया कि इसके लिए सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के बीच सहयोग आवश्यक होगा।

फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (एफएसआईआई) के चेयरमैन और सवाना सीड्स के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) एवं प्रबंध निदेशक, अजय राणा ने बताया कि पंजाब में भूजल दोहन वार्षिक पुनर्भरण के लगभग 156 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जबकि हरियाणा में यह आंकड़ा लगभग 137 प्रतिशत का है।

उन्होंने कहा कि एक किलोग्राम चावल पैदा करने के लिए लगभग 3,000-5,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है, और साथ ही यह भी जोड़ा कि भारत में ताजे पानी के कुल उपयोग में कृषि का हिस्सा लगभग 80 प्रतिशत है।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के पूर्व निदेशक ए.के. सिंह ने कहा कि चावल भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए केंद्रीय भूमिका में रहेगा, लेकिन उत्पादन प्रणालियों में बदलाव आना ज़रूरी है।

भाषा राजेश राजेश अजय

अजय

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