अगली पीढ़ी के सुधारों में विनियमन कम करने की जरूरत : नीति सदस्य गौबा

अगली पीढ़ी के सुधारों में विनियमन कम करने की जरूरत : नीति सदस्य गौबा

अगली पीढ़ी के सुधारों में विनियमन कम करने की जरूरत : नीति सदस्य गौबा
Modified Date: September 10, 2026 / 02:46 pm IST
Published Date: September 10, 2026 2:46 pm IST

नयी दिल्ली, 10 सितंबर (भाषा) नीति आयोग के सदस्य राजीव गौबा ने बृहस्पतिवार को अगली पीढ़ी के सुधारों में विनियमन को कम करने तथा नियमों और कानून को सरल एवं बाधारहित बनाने की जरूरत बतायी।

गौबा ने ग्लोबल फिनटेक सम्मेलन में यह भी कहा कि सुधारों के अगले चरण में जमीनी स्तर के बुनियादी सुधारों पर ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने अलग-अलग रूप में मौजूद लाइसेंस, मंजूरी, अनुमति और बार-बार नवीनीकरण की व्यवस्था को समाप्त करने की वकालत की।

उन्होंने कहा कि माल एवं सेवा कर, दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता तथा उदारीकृत विदेशी निवेश व्यवस्था जैसे उपायों ने अर्थव्यवस्था को नया स्वरूप दिया है। इन सुधारों के जरिये रक्षा, अंतरिक्ष और अब परमाणु ऊर्जा जैसे उन क्षेत्रों को निजी उद्यमों के लिए खोला गया है, जिन्हें पहले निजी क्षेत्र के लिए लगभग बंद माना जाता था।

गौबा ने विभिन्न कानून, विनियमन और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की व्यवस्थित समीक्षा की जरूरत पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि यह काम भरोसे पर आधारित शासन को लेकर प्रधानमंत्री की सोच के अनुरूप एक उच्चस्तरीय समिति कर रही है।

गौबा ने कहा कि कई महत्वपूर्ण सुधार राज्यों और नगर निकायों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। उन्होंने विनियमन कम करने के लिए गठित कार्यबल द्वारा राज्य और शहर के स्तर तक भरोसे पर आधारित शासन के सिद्धांतों को पहुंचाने के लिए किए जा रहे कार्यों का भी उल्लेख किया।

उन्होंने पूंजी निवेश के लिए राज्यों को विशेष सहायता योजना और शहरी चुनौती कोष का जिक्र करते हुए केंद्र सरकार के दृष्टिकोण को ‘प्रतिस्पर्धी बढ़त वाला सहकारी संघवाद’ बताया। इन योजनाओं में प्रोत्साहन को सुधार के लक्ष्यों से जोड़ा गया है और परियोजनाओं का चयन चुनौती आधारित प्रक्रिया के जरिये किया जाता है।

उन्होंने वित्तीय प्रौद्योगिकी (फिनटेक) के क्षेत्र में देश की उल्लेखनीय वृद्धि और वित्तीय समावेश तथा वित्तीय सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने में इसके योगदान का भी उल्लेख किया।

गौबा ने कहा कि आधार, यूपीआई, डिजिलॉकर और खाता ‘एग्रीगेटर’ व्यवस्था जैसी भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना दुनिया के लिए अनुकरणीय मॉडल है।

उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी आधारित क्षेत्रों में विनियमन ऐसा होना चाहिए जिसमें जनहित की रक्षा और नवोन्मेष को बढ़ावा देने के बीच संतुलन बना रहे।

गौबा ने कहा कि नियामकीय रूपरेखा सिद्धांत आधारित, प्रौद्योगिकी-निरपेक्ष और जोखिम के अनुरूप होनी चाहिए। साथ ही, इसमें प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने, बुनियादी अवसंरचना तक भेदभाव रहित पहुंच सुनिश्चित करने और सूचना की असमानता कम करने पर भी जोर होना चाहिए।

गौबा ने वित्तीय नियामकों के बीच बेहतर समन्वय, अनुपालन प्रक्रियाओं को सरल और अधिक भरोसेमंद बनाने तथा प्रक्रियागत अड़चनों और विभिन्न प्रणालियों के बीच तालमेल की कमी को दूर करने के लगातार प्रयासों की जरूरत पर भी जोर दिया।

उन्होंने कहा कि सरकार ने घरेलू और विदेशी दीर्घकालिक पूंजी आकर्षित करने के लिए निवेशकों के भरोसे को मजबूत करने, समान व्यवहार, भरोसेमंद नीतियों, साइबर सुरक्षा और नवोन्मेष के लिए पर्याप्त अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाए हैं।

गौबा ने कहा कि सुधार राजकाज की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए और इसके लिए दीर्घकालिक तथा रणनीतिक सोच जरूरी है।

भाषा रमण अजय

अजय


लेखक के बारे में