आरबीआई ने खुले बाजार परिचालन के तहत कुल सरकारी बॉन्ड में से 47 प्रतिशत की खरीद की

आरबीआई ने खुले बाजार परिचालन के तहत कुल सरकारी बॉन्ड में से 47 प्रतिशत की खरीद की

आरबीआई ने खुले बाजार परिचालन के तहत कुल सरकारी बॉन्ड में से 47 प्रतिशत की खरीद की
Modified Date: February 17, 2026 / 07:08 pm IST
Published Date: February 17, 2026 7:08 pm IST

मुंबई, 17 फरवरी (भाषा) बैंकों में नकदी बनाये रखने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने वित्त वर्ष 2025-26 में अब तक केंद्र सरकार की तरफ से जारी कुल बॉन्ड में से 47 प्रतिशत सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद की है।

आरबीआई के संकलित आंकड़ों से पता चलता है कि केंद्र सरकार ने चार अप्रैल, 2025 से इस वर्ष 13 फरवरी तक अपने सकल उधारी कार्यक्रम के तहत सरकारी प्रतिभूतियां जारी करके 13,65,000 करोड़ रुपये जुटाए। रिजर्व बैंक ने 6,39,203 करोड़ रुपये के खुले बाजार परिचालन (ओएमओ) यानी प्रतिभूतियों की खरीद-बिक्री के तहत खरीद नीलामी आयोजित की। इसके जरिये बैंकों में स्थायी नकदी डाली गयी।

विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े पैमाने पर की गई ये खरीद सरकार के लगातार उधार लेने के बीच हुई, जो आमतौर पर बैंकों से नकदी को अवशोषित करता है और बॉन्ड प्रतिफल पर दबाव बनाता है। केंद्रीय बैंक ने द्वितीयक बाजार से बॉन्ड खरीदकर, नकदी के साथ व्यवस्थित बाजार स्थितियों को बनाए रखने में मदद की।

इस कदम से बैंकिंग प्रणाली को नकदी की कमी से बचाने में मदद मिली और सरकारी प्रतिभूतियों की भारी आपूर्ति के बावजूद प्रतिफल में अत्यधिक वृद्धि को रोका जा सका। इससे ऋण वृद्धि को समर्थन देने के लिए प्रणाली में पर्याप्त नकदी सुनिश्चित हुई।

पूंजी निकासी और रुपये की विनिमय दर में गिरावट के बीच आरबीआई द्वारा अमेरिकी डॉलर की बिक्री के बावजूद, पर्याप्त नकदी सुनिश्चित करने के लिए खुले बाजार परिचालन के तहत प्रतिभूतियों की खरीद को सक्रिय रूप से क्रियान्वित किया गया है।

बंधन एएमसी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष (फिक्स्ड इनकम) बृजेश शाह ने कहा, ‘‘ओएमओ खरीद सहित आरबीआई के विभिन्न उपायों ने टिकाऊ आधार पर नकदी प्रदान की है और इस प्रक्रिया में वैश्विक बाजार की ताकतों से बढ़ते दबाव को कम किया है।’’

उन्होंने कहा कि हाल ही में हुए भारत-अमेरिका व्यापार समझौते (जिससे विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप में कमी आई) के कारण पूंजी प्रवाह के लिए संभावित सकारात्मक धारणा और विदेशी विनिमय अदला-बदली जैसे अन्य उपायों के उपयोग से भविष्य में ओएमओ की कम आवश्यकता हो सकती है।

वित्त वर्ष 2025-26 के अधिकांश समय नकदी अधिशेष में रही, हालांकि कुछ समय के लिए यह घाटे में भी चली गई थी। जब तरलता कम होने लगी और घाटे में चली गई, आरबीआई ने दिसंबर, 2025 से ओएमओ खरीद संचालन को तेज कर दिया।

उन्होंने कहा कि भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते (जिससे विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप में कमी आई) की रूपरेखा पर बनी सहमति के कारण पूंजी प्रवाह के लिए संभावित सकारात्मक माहौल और विदेशी मुद्रा अदला-बदली जैसे अन्य उपायों के उपयोग से आगे चलकर ओएमओ की कम आवश्यकता हो सकती है।

बैंकों को नकदी प्रदान करके आरबीआई के हस्तक्षेप से मुद्रा बाजार दरों को नियंत्रित रखने और एक दिन की दरों को रेपो दर के करीब बनाए रखने में भी मदद मिली।

जनवरी, 2025 से फरवरी, 2026 के बीच 10 वर्षीय मानक बॉन्ड प्रतिफल 6.30-6.70 प्रतिशत के दायरे में रहा।

सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 17.2 लाख करोड़ रुपये उधार लेने की योजना बनाई है, जो बाजार के 16.5-17 लाख करोड़ रुपये के अनुमान से अधिक है। इसके कारण सरकारी प्रतिभूतियों पर प्रतिफल में तीव्र वृद्धि हुई है।

हालांकि, दूसरी ओर, सरकार की शुद्ध उधारी 11.53 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 11.73 लाख करोड़ रुपये हो गयी, जो 20,000 करोड़ रुपये की वृद्धि है।

आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, 5.47 लाख करोड़ रुपये मूल्य की सरकारी प्रतिभूतियां परिपक्वता के लिए तैयार हैं।

सरकार की उधारी अर्थव्यवस्था में ब्याज दरों का एक प्रमुख निर्धारक है और बैंकों, बीमाकर्ताओं और विदेशी निवेशकों से मजबूत मांग न होने पर बॉन्ड की अधिक आपूर्ति प्रतिफल पर दबाव डालती है।

भाषा रमण अजय

अजय


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