वैश्विक तनाव के बीच मालभाड़ा दरों में उछाल इस्पात क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती: टाटा स्टील अधिकारी

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वैश्विक तनाव के बीच मालभाड़ा दरों में उछाल इस्पात क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती: टाटा स्टील अधिकारी

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  • Publish Date - May 21, 2026 / 01:32 PM IST,
    Updated On - May 21, 2026 / 01:32 PM IST

(नमिता तिवारी)

रांची, 21 मई (भाषा) पश्चिम एशिया की बिगड़ती स्थिति सहित भू-राजनीतिक तनावों के बीच वैश्विक मालभाड़ा लागत में 28-30 प्रतिशत की वृद्धि भारत के इस्पात उद्योग के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है। हालांकि घरेलू संचालन और कच्चे माल की आपूर्ति काफी हद तक स्थिर बनी हुई है।

टाटा स्टील के उपाध्यक्ष (कॉर्पोरेट सेवाएं) डी. बी. सुंदर रामम ने कहा कि पश्चिम एशिया में अस्थिरता और लंबे समय से जारी रूस-यूक्रेन संघर्ष के कारण शिपिंग दरों में तेज वृद्धि हुई है, जिससे आयातित कोकिंग कोयले पर निर्भर इस्पात कंपनियों की लॉजिस्टिक्स लागत काफी बढ़ रही है।

रामम ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘ इस्पात के लिए सबसे बड़ा प्रभाव मालभाड़े का है। मालभाड़ा दरें लगभग 28-30 प्रतिशत बढ़ गई हैं… यह सीधा असर है। पहले रूस-यूक्रेन युद्ध और अब पश्चिम एशिया की स्थिति… इसका लगभग सभी देशों पर श्रृंखलाबद्ध प्रभाव पड़ रहा है।’’

उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यवधानों के बावजूद इस्पात उद्योग अब तक उत्पादन स्तर बनाए रखने में सफल रहा है, हालांकि बढ़ती मालभाड़ा व लॉजिस्टिक्स लागत कच्चे माल की आवाजाही के लिए बड़ी चिंता बनती जा रही है।

रामम ने कहा कि टाटा स्टील अपनी कोकिंग कोयले की जरूरत का लगभग 78 प्रतिशत, यानी करीब 1.2-1.3 करोड़ टन प्रति वर्ष आयात करता है। मुख्य रूप से ऑस्ट्रेलिया से जबकि शेष 22 प्रतिशत पश्चिम बोकारो और झरिया की घरेलू खदानों से आता है।

उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया से कोयले की आपूर्ति परिचालन रूप से स्थिर बनी हुई है, लेकिन उच्च मालभाड़ा शुल्क पूरे क्षेत्र में इनपुट लागत बढ़ा रहा है।

रामम टाटा स्टील में कच्चा माल के उपाध्यक्ष रह चुके हैं।

उन्होंने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ा तनाव कंपनी की कुल कच्चा माल की सुरक्षा पर बड़ा असर नहीं डाल रहा है क्योंकि भारत लौह अयस्क में काफी हद तक आत्मनिर्भर है और केवल सीमित मात्रा में आयात करता है।

खाड़ी क्षेत्र से चूना पत्थर के आयात में हालिया व्यवधानों के कारण कंपनी को आपूर्ति जारी रखने के लिए वैकल्पिक स्रोतों की ओर रुख करना पड़ा है।

उन्होंने कहा कि यह स्थिति घरेलू खनिज आत्मनिर्भरता की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

रामम ने कहा, “ इन व्यवधानों से सबक यह है कि चूना पत्थर जैसे खनिजों में कैसे अधिक आत्मनिर्भर बना जाए। हमारे पास संसाधन हैं लेकिन उन्हें इस्पात निर्माण के लिए उपयुक्त बनाने हेतु तकनीकी सुधार की आवश्यकता है। ”

उन्होंने कहा कि मजबूत घरेलू मांग और तैयार इस्पात के आयात पर कम निर्भरता के कारण भारत का इस्पात उद्योग वैश्विक व्यवधानों से अपेक्षाकृत सुरक्षित रहा है।

रामम ने कहा कि वित्त वर्ष 2025-26 में भारत शुद्ध इस्पात निर्यातक बन गया, जहां निर्यात आयात से लगभग 50 से 60 लाख टन रहा।

वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि पिछले वित्त वर्ष में घरेलू इस्पात खपत लगभग आठ प्रतिशत बढ़ी। इसे सरकारी बुनियादी ढांचा खर्च, विनिर्माण विस्तार और मोटर वाहन क्षेत्र की मजबूत मांग से समर्थन मिला।

वित्त वर्ष 2025-26 में तैयार इस्पात की घरेलू खपत 7-8 प्रतिशत बढ़कर 16.4 करोड़ टन हो गई जो बुनियादी ढांचा, निर्माण, रेलवे और विनिर्माण क्षेत्रों में बढ़ी गतिविधियों के कारण हुआ।

कंपनी अधिकारियों ने कहा कि वित्त वर्ष के दौरान देश का कच्चा इस्पात उत्पादन 10.7 प्रतिशत से अधिक बढ़कर लगभग 16.84 करोड़ टन हो गया जो निरंतर औद्योगिक गति को दर्शाता है।

उन्होंने कहा कि टाटा स्टील इंडिया ने 2025-26 में 2.34 करोड़ टन उत्पादन हासिल किया जबकि आपूर्ति 2.25 करोड़ टन रही और वैश्विक अस्थिरता के बावजूद संचालन स्थिर रहा।

उन्होंने हालांकि आगाह किया कि पिछले वित्त वर्ष में परिचालन पर सीमित असर पड़ा, लेकिन यदि भू-राजनीतिक तनाव और शिपिंग व्यवधान जारी रहते हैं तो 2026-27 में आपूर्ति श्रृंखला एवं निर्यात पर दबाव बढ़ सकते हैं।

टाटा स्टील समूह की वार्षिक कच्चा इस्पात क्षमता 3.5 करोड़ टन प्रति वर्ष है।

भाषा निहारिका मनीषा

मनीषा