चीनी मिलों की जल्दी गन्ना पेराई शुरू करने के लिए सरकार से मदद की मांग

चीनी मिलों की जल्दी गन्ना पेराई शुरू करने के लिए सरकार से मदद की मांग

चीनी मिलों की जल्दी गन्ना पेराई शुरू करने के लिए सरकार से मदद की मांग
Modified Date: August 6, 2026 / 06:54 pm IST
Published Date: August 6, 2026 6:54 pm IST

नयी दिल्ली, छह अगस्त (भाषा) चीनी उद्योग की संस्थाओं ‘इस्मा’ और ‘एनएफसीएसएफ’ ने बृहस्पतिवार को सरकार को बताया कि मिलें अगले पेराई सत्र को सामान्य समय से 10-15 दिन पहले शुरू करने के लिए तैयार हैं, लेकिन उन्होंने इस कदम से होने वाले वित्तीय असर की भरपाई के लिए मदद मांगी है।

इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (इस्मा) और नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज (एनएफसीएसएफ) ने खाद्य सचिव को लिखे एक संयुक्त पत्र में कहा कि जल्दी पेराई शुरू करने से त्योहारों के मौसम से पहले ताजा चीनी की आपूर्ति सुनिश्चित होगी।

संस्थाओं ने कहा, ‘‘हालांकि, इस पहल से चीनी मिलों पर काफी परिचालनगत और वित्तीय असर पड़ेगा।’’

उन्होंने कहा कि जल्दी पेराई से चीनी की प्राप्ति का स्तर कम हो सकती है, गन्ने की पैदावार घट सकती है और परिचालन क्षमता कम हो सकती है, जिससे उत्पादन की कुल लागत बढ़ जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि यह फैसला व्यापक बातचीत के बाद लिया गया है।

उद्योग को उत्पादन लागत में भारी बढ़ोतरी का भी सामना करना पड़ रहा है। संस्थाओं ने कहा कि खाड़ी क्षेत्र की भू-राजनीतिक स्थिति के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंधक की कीमतें बढ़ गई हैं, जबकि भारतीय मानक ब्यूरो के पैकेजिंग नियमों में बदलाव के बाद पॉलीप्रोपाइलीन बैग की लागत भी बढ़ गई है, जिसके लिए बेहतर गुणवत्ता वाली सामग्री की जरूरत होती है।

उन्होंने कहा, ‘‘इन घटनाक्रमों से बड़े जनहित में जल्दी पेराई करने वाली चीनी मिलों पर वित्तीय बोझ और बढ़ जाएगा।’’

इस्मा और एनएफसीएसएफ ने नुकसान की आंशिक भरपाई के लिए सरकार से मदद मांगी, जिसमें प्राप्त स्तर में हुए नुकसान के लिए मुआवजा, अक्टूबर के उत्पादन के बराबर घरेलू चीनी बिक्री का अतिरिक्त कोटा, घरेलू चीनी बिक्री पर सीजीएसटी में छूट या कोई अन्य उपयुक्त तरीका शामिल है।

उन्होंने सरकार से राज्य अधिकारियों को यह निर्देश देने का भी आग्रह किया कि गुड़ और खांडसारी इकाइयां चीनी मिलों के काम शुरू करने के बाद ही पेराई का काम शुरू करें। उन्होंने कहा कि इससे सत्र के शुरुआती अहम दौर में मिलों के लिए गन्ने की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित होगी, क्षमता का बेहतर इस्तेमाल होगा और चीनी की प्राप्ति स्तर अधिकतम होगी।

संस्थाओं ने कहा कि चीनी की कीमतों में हालिया उतार-चढ़ाव मांग-आपूर्ति के असल आधार को नहीं दिखाते हैं।

उन्होंने कहा कि जून तक पूरे देश में चीनी की औसत मिल कीमत लगभग 39.5-40 रुपये प्रति किलोग्राम थी, जो उत्पादन की औसत लागत से कम है। हालिया बढ़ोतरी के बाद भी, जुलाई के अंत तक सत्र की औसत प्राप्ति 40-40.5 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई, जो अब भी लगभग 42 रुपये प्रति किलोग्राम की उत्पादन लागत से कम है।

इन संस्थाओं ने बताया कि अक्टूबर से सितंबर तक चलने वाले 2025-26 चीनी सत्र में अब तक उद्योग ने गन्ना किसानों को लगभग 1.10 लाख करोड़ रुपये का भुगतान किया है।

उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए, हाल की कीमतों में बदलाव को सही संदर्भ में देखा जाना चाहिए, न कि आपूर्ति में किसी कमी के संकेत के तौर पर।’’ उन्होंने आगे कहा कि भारत के पास घरेलू खपत को आसानी से पूरा करने के लिए पर्याप्त चीनी का स्टॉक है और इसकी उपलब्धता को लेकर चिंता की कोई बात नहीं है।

भाषा राजेश राजेश अजय

अजय


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