ग्रामीण ऋण व्यवस्था में व्यापक बदलाव की जरूरत: कृषि मंत्री चौहान
ग्रामीण ऋण व्यवस्था में व्यापक बदलाव की जरूरत: कृषि मंत्री चौहान
नयी दिल्ली, 21 अप्रैल (भाषा) कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंगलवार को ग्रामीण ऋण व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि किसान क्रेडिट कार्ड योजना के बावजूद, बैंक से ऋण प्राप्त करना, किसानों के लिए एक बड़ी परेशानी का कारण बना हुआ है। उन्हें ऋण स्वीकृत करवाने के लिए कागजी कार्रवाई, पटवारियों और तहसील कार्यालयों के कई चक्कर लगाने पड़ते हैं।
सिविल सेवा दिवस के अवसर पर कृषि पर आयोजित एक परिचर्चा में, चौहान ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था उन लोगों की ही मदद करने में विफल रहती है, जिनकी सेवा के लिए इसे बनाया गया है।
उन्होंने कहा, ‘‘किसान कोई भिखारी नहीं है — वह अपने अधिकारों, जरूरतों और सम्मान के साथ इस व्यवस्था के पास आता है….। लेकिन पदों पर बैठे अधिकारी अक्सर इस बात को नजरअंदाज कर देते हैं।’’
ग्रामीण बैंकिंग की परेशानियों की एक तस्वीर साझा करते हुए मंत्री ने कहा कि किसान 8 से 10 किलोमीटर पैदल चलकर बैंक की शाखा तक पहुंचते हैं, लेकिन लंबी कतारों और कर्मचारियों की कमी वाले काउंटरों से निराश होकर बिना काम करवाए ही घर लौट आते हैं।
उन्होंने कहा कि प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) — मनरेगा की मजदूरी से लेकर पीएम किसान की किस्तों तक — के माध्यम से ग्रामीण खातों में बड़ी मात्रा में पैसा आने से, सीमित बैंक कर्मचारियों पर काम का बोझ काफी बढ़ गया है। उन्होंने ग्रामीण बैंकिंग क्षेत्र में कर्मचारियों की संख्या का गंभीरता से पुनर्मूल्यांकन करने की मांग की।
एक सरकारी बयान के अनुसार, चौहान ने प्रौद्योगिकी के असमान लाभों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि गेहूं की खरीद के दौरान, उपग्रह-आधारित सत्यापन ने किसानों की मुश्किलें कम करने के बजाय उनके लिए नई बाधाएं खड़ी कर दीं।
उन्होंने कहा कि यह इस बात की याद दिलाता है कि डिजिटलीकरण करते समय जमीनी हकीकतों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
एकीकृत खेती के विषय पर मंत्री ने तर्क दिया कि एक छोटा या सीमांत किसान, जिसके पास केवल एक से ढाई एकड़ जमीन है, वह केवल अनाज की खेती के सहारे जीवित नहीं रह सकता। बागवानी, पशुपालन, मछली पालन या मधुमक्खी पालन जैसे अन्य क्षेत्रों में विस्तार करने के लिए पूंजी की आवश्यकता होती है… ऐसी पूंजी जिसकी अधिकांश किसानों के पास कमी होती है और जो केवल सरकारी सब्सिडी से पूरी नहीं हो सकती।
उन्होंने किसानों को ‘‘परेशानी में कम दाम पर फसल बेचने’’ से बचाने के एक साधन के रूप में ‘भंडारगृह रसीद ऋण’ का भी समर्थन किया, लेकिन साथ ही कहा कि इस योजना को वास्तव में सभी किसानों के लिए सुलभ बनाया जाना चाहिए।
चौहान ने एक किसान का उदाहरण दिया, जिसका 18 लाख रुपये का ऋण बढ़कर 40 लाख रुपये हो गया था। उन्होंने बैंकों से आग्रह किया कि वे इस तरह की समस्याओं के व्यावहारिक समाधान के रूप में ‘एकमुश्त निपटान’ के विकल्प पर विचार करें।
मंत्री ने सिविल सेवकों को संबोधित करते हुए आत्मनिरीक्षण और लीक से हटकर सोचने की अपील की– और उनसे कहा कि वे केवल एनपीए (गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों) के आंकड़ों तक ही सीमित न रहें, बल्कि उन आंकड़ों के पीछे छिपी मानवीय पीड़ा और वास्तविकताओं को भी समझने का प्रयास करें।
भाषा राजेश राजेश रमण
रमण

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