Chhattisgarh High Court: क्या बार-बार पैसा मांगना अपराध है? हाईकोर्ट के फैसले ने साफ कर दी बड़ी कानूनी तस्वीर, जानिए क्या है पूरा मामला
Chhattisgarh High Court: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि उधार के पैसे मांगना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता।
Chhattisgarh High Court/Photo Credit: IBC24 File
- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आत्महत्या मामले में आरोपी की 7 साल की सजा रद्द कर दी
- कोर्ट ने कहा कि उधार दिए गए पैसे वापस मांगना या कानूनी कार्रवाई की चेतावनी देना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं है
- आर्थिक संकट और बैंक के दबाव को आत्महत्या की संभावित वजह मानते हुए आरोपी को सभी आरोपों से बरी किया गया
बिलासपुर। Chhattisgarh High Court: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने उधार दिए पैसे मांगने के एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने 12 साल पुराने सुसाइड मामले में ट्रायल कोर्ट से दोषी ठहराए गए आरोपी की 7 साल की सजा रद्द कर उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को दिए गए उधार की रकम वापस मांगना, बार-बार संपर्क करना या कानूनी कार्रवाई की चेतावनी देना आत्महत्या के लिए उकसाने की श्रेणी में नहीं आता।
ये है पूरा मामला
Chhattisgarh High Court यह फैसला जस्टिस रजनी दुबे की एकलपीठ ने सुनाया है। दरअसल, धमतरी जिले के ग्राम बलियारा में 17 जून 2014 को तत्कालीन सरपंच बलराम मंडावी का शव खेत में मिला था। जांच में सामने आया कि उन्होंने कीटनाशक पीकर आत्महत्या की थी। घटनास्थल से मिले सुसाइड नोट में ठेकेदार अशोक कुमार वाधवानी का नाम दर्ज था। परिजनों ने आरोप लगाया था कि, चौपाल निर्माण के लिए सामान के एवज में आरोपी अशोक मूल रकम से कई गुना ज्यादा राशि मांग रहा था और लगातार दबाव बना रहा था। इसी प्रताड़ना से परेशान होकर सरपंच ने आत्महत्या कर ली थी।
विशेष अदालत ने सुनाई थी 7 साल की सजा
Chhattisgarh High Court मामले में धमतरी की विशेष अदालत ने सुनवाई के बाद आरोपी अशोक वाधवानी को एससी-एसटी एक्ट के आरोपों से बरी कर दिया था, लेकिन आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण (आईपीसी धारा 306) का दोषी मानते हुए 7 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की। वहीं, मृतक की पत्नी सतवती बाई और बेटे इंद्र कुमार ने भी याचिका दाखिल कर सजा बढ़ाने और एससी-एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई की मांग की थी। कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने मृतक को आत्महत्या करने के लिए उकसाया था।
उधार रकम के लिए फोन करना वैध अधिकार
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि उधार दी गई रकम की वसूली के लिए बार-बार फोन करना या संपर्क करना लेनदार का वैध अधिकार है। केवल पैसा मांगना या कानूनी कार्रवाई की चेतावनी देना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने पाया कि पूरा विवाद आर्थिक लेन-देन से जुड़ा था। गवाहों के बयान और सुसाइड नोट में ऐसा कोई तथ्य नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने मृतक को उसकी अनुसूचित जनजाति पहचान के आधार पर अपमानित या प्रताड़ित किया था।
7 साल की सजा की रद्द
Chhattisgarh High Court सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि मृतक ने ट्रैक्टर खरीदने के लिए बैंक से बड़ा कर्ज लिया था। किस्त नहीं चुकाने पर बैंक ने ट्रैक्टर जब्त कर उसकी नीलामी कर दी थी। सुसाइड नोट में भी बैंक के 2.58 लाख रुपए बकाया होने का उल्लेख था। हाईकोर्ट ने माना कि आर्थिक संकट, बैंक का दबाव और ट्रैक्टर जब्त होने से हुआ मानसिक तनाव भी आत्महत्या की बड़ी वजह हो सकती है। मामले में सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने आरोपी अशोक कुमार वाधवानी की 7 साल की सजा रद्द कर उसे दोषमुक्त कर दिया। वहीं, मृतक पक्ष की सजा बढ़ाने और एससी-एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई की मांग वाली अपील भी खारिज कर दी।
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