Bilaspur High court Decision: घर, जमीन बच्चों के नाम होते ही बदल जाते हैं रिश्ते? हाईकोर्ट ने बुजुर्गों के हित में सुनाया बड़ा फैसला, औलादों को याद दिलाई जिम्मेदारी…
Bilaspur High court Decision: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बुजुर्गों के अधिकारों को मजबूत करते हुए एक अहम फैसला सुनाया है।
bilaspur highcourt/ image source: meta AI
- बुजुर्गों के हक में हाईकोर्ट
- गिफ्ट डीड रद्द करना सही
- सेवा शर्त लिखित जरूरी नहीं
बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बुजुर्गों के अधिकारों को मजबूत करते हुए एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई बुजुर्ग अपनी संपत्ति गिफ्ट डीड के माध्यम से किसी रिश्तेदार को देता है, तो भले ही उसमें सेवा और देखभाल की शर्त लिखित रूप से दर्ज न हो, फिर भी संपत्ति प्राप्त करने वाले व्यक्ति की यह नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी बनती है कि वह बुजुर्गों की देखभाल करे। इस मामले में हाईकोर्ट ने गिफ्ट डीड को रद्द करने के आदेश को सही ठहराया है।
Senior Citizens Rights: गिफ्ट डीड रद्द करना सही
मामला बिलासपुर जिले से जुड़ा है, जहां एक बुजुर्ग दंपती ने अपनी संपत्ति भतीजे और बेटी के नाम गिफ्ट डीड के जरिए हस्तांतरित कर दी थी। दंपती का मानना था कि संपत्ति देने के बाद उनकी देखभाल परिवार के सदस्य करेंगे और वे सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकेंगे। लेकिन संपत्ति मिलने के बाद भतीजे और बेटी ने कथित तौर पर बुजुर्ग दंपती के साथ दुर्व्यवहार किया और अंततः उन्हें घर से बाहर कर दिया।
घर से निकाले जाने के बाद बुजुर्ग दंपती ने वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत सक्षम प्राधिकारी के समक्ष शिकायत दर्ज कराई। मामले की सुनवाई के बाद प्राधिकारी ने यह माना कि संपत्ति लेने के बाद बुजुर्गों की देखभाल नहीं की गई, जो कानून की भावना के विपरीत है। इसके आधार पर गिफ्ट डीड को रद्द करने का आदेश पारित किया गया।
Bilaspur High court Decision: सेवा शर्त लिखित जरूरी नहीं
इस आदेश को चुनौती देते हुए भतीजे और बेटी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका में तर्क दिया गया कि गिफ्ट डीड में कहीं भी सेवा या देखभाल की शर्त का उल्लेख नहीं है, इसलिए उसे रद्द नहीं किया जा सकता। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम का उद्देश्य बुजुर्गों को गरिमापूर्ण जीवन और सुरक्षा प्रदान करना है। यदि कोई बुजुर्ग अपनी संपत्ति इस विश्वास के साथ देता है कि उसकी देखभाल की जाएगी, तो यह शर्त भले ही दस्तावेज में स्पष्ट रूप से न लिखी गई हो, फिर भी निहित मानी जाएगी। कोर्ट ने कहा कि संपत्ति प्राप्त करने वाले व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह बुजुर्गों का भरण-पोषण और देखभाल करे।
High court Decision: घर से निकालना अवैध माना
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि बुजुर्गों को घर से निकालना और उन्हें असहाय छोड़ देना न केवल अमानवीय है, बल्कि कानून के भी खिलाफ है। ऐसे मामलों में गिफ्ट डीड को रद्द करना पूरी तरह न्यायसंगत है।हाईकोर्ट के इस फैसले को बुजुर्गों के अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह निर्णय उन मामलों में नजीर बनेगा, जहां संपत्ति लेने के बाद रिश्तेदार बुजुर्गों की उपेक्षा करते हैं।


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