बिलासपुर। विधायकजी के रिपोर्ट कार्ड में आज बारी है बिलासपुर जिले की कोटा विधानसभा की। कोटा विधानसभा देश का ऐसा विधानसभा क्षेत्र है, जिसने आजादी के 72 साल बीत जाने के बाद भी कांग्रेस का दामन नहीं छोड़ा है। अब तक यहां हुए सभी 13 चुनावों में कांग्रेस को जीत दिलाई है। कांग्रेस के इस अजेय गढ़ ने मथुराप्रसाद दुबे और राजेंद्र प्रसाद शुक्ल जैसे दिग्गज नेता दिए हैं। लेकिन आने वाले चुनाव में कोटा में बेहद दिलचस्प समीकरण बनता दिख रहा है। क्योंकि इस बार कांग्रेस के साथ यहां कांग्रेस से टूट कर बनी जोगी कांग्रेस भी चुनावी मैदान में होगी। ऐसे में कोटा को अजेय बनाए रखना कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा।
अचानकमार टाइगर रिजर्व, खूबससूरत हरे-भरे जंगल और पहाड़ो से घिरी कोटा विधानसभा सीट 1962 में अस्तित्व में आई। रतनपुर, बेलगहना, कोटा, पेंड्रा, और गौरेला ये पांच जगह हैं जिन्हें इस विधानसभा क्षेत्र के सियासी शक्ति केंद्र कहा जा सकता है। ये सीट अब तक कांग्रेस का अभेद्य गढ़ बनी हुई है और बीजेपी आज तक यहां से अपना परचम नहीं लहरा पाई है।
कोटा विधानसभा सीट पर लंबे समय तक ब्राह्मण विधायक रहें। इनमें मथुरा प्रसाद दुबे, काशीराम तिवारी और राजेंद्र प्रसाद शुक्ल शामिल हैं, उस समय तक इसे ब्राह्मण प्रभाव वाली सीट कहा जाता रहा, लेकिन पिछले तीन चुनाव से यहां गैर ब्राह्मण प्रत्याशी डाक्टर रेणु जोगी चुनाव जीत रही हैं, इसलिए इसे अब ये नहीं कहा जा सकता कि ये ब्राह्मण प्रभाव वाली सीट है।
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यहां के सियासी इतिहास की बात की जाए तो 1962 में कांग्रेस के लालचंद्रशेखर सिंह ने जनसंघ के दुखभजन सिंह को हराया। लेकिन यहां पर कांग्रेस को अजेय बनाने का श्रेय जाता है मथुराप्रसाद दुबे को, जिन्होंने 1967 से 1980 तक कांग्रेस को यहां से जीत दिलाई। ये उनका ही जादू था कि 1977 में आपातकाल के दौरान देशव्यापी कांग्रेस विरोधी लहर के बाद भी बीजेपी चुनाव नहीं जीत पाई। उनके बाद उनकी विरासत संभाली उनके भांजे राजेंद्र प्रसाद शुक्ल ने, जिन्होंने 1985 से लेकर 2003 तक तक कांग्रेस का परचम लहराया। 2006 में शुक्ल के निधन के बाद यहां उपचुनाव हुआ जिसमें कांग्रेस ने अजीत जोगी की पत्नी रेणु जोगी को अपना उम्मीद बानाया और उन्होंने कांग्रेस के इस गढ़ को बचाए रखा। उन्होंने बीजेपी के भूपेंद्र सिंह को करीब 25 हजार वोटों करारी मात दी।
2008 में भी रेणु जोगी ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और बीजेपी के मूलचंद खंडेलवाल को मात दी। 2013 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने रेणु जोगी पर टिकट दिया। इस बार उन्होंने बीजेपी के काशी साहू को हराकर सीट पर कब्जा जमाया। इस चुनाव में कांग्रेस को जहां 58390 वोट मिले। वहीं बीजेपी को 53301 वोट मिले। इस तरह जीत का अंतर 5089 वोटों का रहा।
आंकड़े बताते है कि रेणु जोगी की जीत का अंतर लगातार कम होता जा रहा है, लेकिन असल में तो 2018 का चुनाव ही बताएगा कि क्या कोटा में कांग्रेस अजेय रहने का रिकार्ड कायम रखेगी या जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ का बनना यहां कोई नया नतीजा देगा। हालांकि सभी पार्टियों के नेता इस बार जीत का दावा कर रहे हैं, सबके पास इसके तर्क भी हैं।
बिलासपुर जिले की इस विधानसभा ने कांग्रेस को विधान पुरुष मथुराप्रसाद दुबे और राजेंद्र प्रसाद शुक्ल जैसे दिग्गज नेता दिए हैं। कांग्रेस के इस गढ़ में आने वाला चुनाव बेहद महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि इस बार कांग्रेस के साथ यहां कांग्रेस से टूट कर बनी जोगी कांग्रेस भी चुनावी मैदान में होगी। एसे में कोटा को अजेय बनाए रखना कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा।
कोटा विधानसभा अनेक विविधताओं का क्षेत्र है। मैकल श्रेणी में गौरेला,पेंड्रा, और मैदानी क्षेत्र में कोटा और रतनपुर का इलाका शामिल है। इस विधानसभा में बड़ा क्षेत्र आदिवासी वनक्षेत्र और महामाया शक्तिपीठ रतनपुर धर्म नगरी भी है। इस क्षेत्र में 1952 से आज तक इस सीट पर कांग्रेस ने ही राज किया है। इसमें 1952 से 62 तक कांशीराम तिवारी को यहां को अपना प्रतिनिधित्व सौंपा था, इसके बाद लाल चंद्रशेखर सिंह विधायक बने।1967 से 1980 तक मथुरा प्रसाद दुबे को कोटा की जनता से कांग्रेस के लिए स्वीकार किया। इसके बाद राजेंद्र प्रसाद शुक्ल 1985 से 2003 तक पांच बार यहां से विधायक चुने गए और प्रदेश में उनका कद काफी बड़ा रहा। वे शासन में मंत्री और छत्तीसगढ़ के पहले विधानसभा अध्यक्ष भी बने रहे। उनके निधन के बाद साल 2006 में हुए उपचुनाव में से भाजपा इस सीट पर कब्जा करना चाह रही है, लेकिन आज तक ये नहीं हो सका हैं। 2006 के उपचुनाव में ये माना जा रहा था, कि ये सीट विधायक राजेंद्र प्रसाद शुक्ला के पुत्र को राजनीतिक विरासत के रूप में मिल जाएगी। लेकिन राजनीति के महारथी अजीत जोगी ने अपनी धर्मपत्नी डाक्टर रेणु जोगी को यहां से टिकट दिलाई। सत्ताधारी भाजपा ने भूपेंद्र सिंह को उतारा और देश-प्रदेश के दिग्गज प्रचार के लिए यहां पहुंचे। बीजेपी के दिग्गज मंत्री बृजमोहन अग्रवाल खुद जुटे हुए थे,लेकिन उपचुनाव में रेणु जोगी ने भाजपा के भूपेंद्र सिंह को 23,470 वोटों से पराजित किया। इसके बाद जोगी ने अपनी जड़े जमा ली।
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अगर यहां की जाति समीकरण की बात करें तो ये विधानसभा आदिवासी बाहुल्य इलाका है…और 1 लाख 92 हजार 323 मतदाताओं में 65 फीसदी आबादी इसी वर्ग का है। इसके अलावा 25 फीसदी ईसाई मतदाता भी हैं। शहरी इलाकों में मुस्लिम, ब्राह्मण और दूसरी स्वर्ण जातियां भी चुनाव नतीजों को प्रभावित करती है।
कुल मिलाकर इस सीट पर कांग्रेस का जादू कायम है और बीजेपी उसके तिलिस्म को तोड़ पाने में नाकाम रही है। दरअसल कोटा के सियासी इतिहास में हमेशा ही मुद्दों पर शख्सियतें हावी रही हैं और सियासी शख्सियतों के मामले में यहां बीजेपी कांग्रेस पीछे रही है और उसे आज उस कद्दावर नेता की तलाश है जो कांग्रेस के कोटा के किले को ध्वस्त कर सके।
कोटा विधानसभा क्षेत्र भौगोलिक रूप से बेहद कठिन है। दरअसल इस विधानसभा क्षेत्र के पांच महत्वपूर्ण इलाके अलग-अलग बसे हुए हैं। हर इलाका अपनी अलग राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक हैसियत रखता है। लिहाजा कहा जाता है कि कोटा विधानसभा लड़ना मतलब पांच विधानसभा लड़ना है। ये पांच इलाके हैं कोटा, बेलगहना, पेंड्रा, गौरेला और रतनपुर। इन सभी इलाकों की मांगे अलग अलग हैं, समस्याएं अलग अलग हैं, मुद्दे अलग अलग हैं।
अरपा नदी के दोनों किनारों पर बसी कोटा विधानसभा कोटा, बेलगहना, पेंड्रा, गौरेला और रतनपुर..पांच महत्वपूर्ण क्षेत्र आते हैं और इन पांचों इलाकों में रहने वाले लोगों की समस्याएं अलग-अलग है। इसमें पेंड्रा और गौरेला इलाके में मुख्य मुद्दा है अलग जिला बनाया जाना। जिला मुख्यालय से पेंड्रा-गौरेला का क्षेत्र 100 किलोमीटर दूर है। इस दूरी के कारण यहां प्रशासनिक निरकुंशता और भ्रष्टाचार हावी है जिसे लेकर लोगों में काफी नाराजगी है। जिले के मुद्दे के अलावा यहां स्वास्थ्य सुविधाओं का भी बुरा हाल है।
पेंड्रा और गौरेला इलाके का मुख्य मुद्दा है अलग जिला बनाया जाना। जिला मुख्यालय से पेंड्रा गौरेला का क्षेत्र 100 किलोमीटर दूर है। एसा मानना है कि इस दूरी के कारण यहां प्रशासनिक निरंकुशता और भ्रष्टाचार हावी है जिसको लेकर लोग आक्रोशित रहते हैं। जिला नहीं बनाये जाने के कारण लोग सरकार के खिलाफ लामबंद भी हैं। इस इलाके की मुख्य समस्याओं में लचर चिकित्सा व्यवस्था भी है। पेंड्रा-गौरेला में अंग्रेजों के जमाने का सेनेटोरियम था, जहां रविंद्रनाथ टैगोर अपनी पत्नी का इलाज कराने आए थे। यहां के अस्पतालों में डाक्टर नहीं हैं, स्टाफ नहीं है। यहीं अमरपुर में अरपा नदी का उदगम है, लेकिन अब वो उद्गम सूख गया है। आदिवासियों के इस इलाके में बारिश में अभी भी कई गांव पहुंच विहीन हो जाते हैं। हालांकि विधायक डाक्टर रेणु जोगी कहती हैं कि उन्होंने सड़कें बनवाई हैं, सिंचाई के लिए एनीकट, स्टाप डैम बनवाए
रतनपुर को अलग अनुविभाग बनाने की मांग भी उठती रही है तो वहीं पर्यटन स्थलों का समुचित विकास नहीं कराए जाने को लेकर विधायक और सरकार दोनों के प्रति नाराजगी देखी जा रही है। वहीं बेलगहना को नगर पंचायत का दर्जा दिये जाने की मांग भी काफी समय से की जा रही है। यहां स्थानीय विधायक रेणु जोगी पर क्षेत्र की उपेक्षा के आरोप लगते रहे हैं। अरपा नदी के दोनों किनारों पर कोटा विधानसभा की बसाहट है और यह कोटा विधानसभा की जीवनदायनी नदी मानी जाती है पर बावजूद इसके अरपा के संरक्षण के लिये कोई विषेश प्रयास नहीं किये गए। वहीं विधानसभा के अंतर्गत आने वाले 9 बड़े जलाशयों से समुचित नहरें नहीं होने से इसका फायदा किसानों को नहीं मिल पा रहा है।
अचानकमार टाईगर रिजर्व की सीमा से लगे गांवों में मूलभूत सुविधाओं की कमी है। वहीं बिलासपुर से पेंड्रा को जाने वाले आरएमकेके रोड की हालत काफी जर्जर होने के चलते दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। कोटा के अंतर्गत बेलगहना, खोडरी, केंदा आदि बड़े गांवों को तहसील और नगर पंचायतों में अपग्रेड करने की जरूरत है। यहां बरसात का पानी पहाड़ी क्षेत्र से बहकर आगे चला जाता है और पर्याप्त वर्षा होने के बावजूद पर्याप्त बांध, जलाशय एनीकट नहीं होने के कारण लोगों को गर्मी में पानी की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। विधानसभा के अंतर्गत सिद्धबाबा बेलगहना, कारीआम, लक्ष्मणधारा सहित अन्य पर्यटन और पौराणिक स्थलों की अब तक उपेक्षा ही देखी जा रही है वहीं बेलगहना में कालेज, केंदा, केंवची और खोडरी में स्थायी पुलिस चौकी, बेलगहना चौकी को थाना में अपग्रेड करने की मांग और जरूरत काफी समय से महसूस की जा रही है। स्थानीय स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक नहीं होने के चलते बच्चों के भविष्य पर भी इसका असर दिखाई देता है। तवाडबरा, ठाड़पथरा जैसे बैगा बाहुल्य गांवों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है।
अमूमन कोटा विधानसभा में दावेदारों की भीड़ नहीं हुआ करती थी। दोनों प्रमुख पार्टियों कांग्रेस और बीजेपी से दो-तीन उम्मीदवार दावेदारी करते थे। इसमें से कांग्रेस का एक दावेदार सिटिंग एमएलए होता था, जिसे अन्ततः फिर टिकट दे दी जाती थी, लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। कांग्रेस के सिटिंग एमएलए होने के बावजूद इस बार 16 कांग्रेसियों ने टिकट के लिए आवेदन दिए हैं। वहीं बीजेपी में भी 6-7 दावेदार हैं। जबकि जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी जिसे चाहेंगे उसे टिकट मिलना तय है।
रतनपुर इलाके की बात करें तो इसके अलग अनुविभाग बनाने की मांग भी उठती रही है और पर्यटन स्थलों का समुचित विकास नहीं करने पर भी विधायक और सरकार के प्रति लोगों में गुस्सा है। वहीं बेलगहना को नगर पंचायत का दर्जा देने की मांग भी काफी समय से की जा रही है। यही वजह है कि विधायक रेणु जोगी पर क्षेत्र की उपेक्षा के आरोप लगते रहे हैं।
अचानकमार टाईगर रिजर्व की सीमा से लगे गांवों में भी मूलभूत सुविधाओं की कमी है। बिलासपुर से पेंड्रा को जाने वाले आरएमकेके रोड की हालत काफी जर्जर होने के चलते भी लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक नहीं होने के चलते बच्चों के भविष्य पर भी इसका असर पड़ रहा है। तवाडबरा, ठाड़पथरा जैसे बैगा बाहुल्य गांवों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। जिनका जवाब आने वाले चुनाव में यहां के नेताओं को देना होगा।
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बिलासपुर जिले की इस विधानसभा ने कांग्रेस को कई सियासी दिग्गज दिए हैं। कांग्रेस की मजबूत गढ़ बनी इस सीट पर आगामी चुनाव में बेहद दिलचस्प मुकाबला होने वाला है। दरअसल इस बार कांग्रेस के साथ यहां कांग्रेस से टूट कर बनी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ भी चुनावी मैदान में होगी। ऐसे में कोटा को अजेय बनाए रखना कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा। कांग्रेस से यहां जो भी विधायक रहा वो या तो बड़ा नेता रहा..या बड़ा नेता बन गया। लिहाजा सिटिंग एमएलए के खिलाफ की सीधी खिलाफत कभी नहीं हुई लेकिन इस बार ये डर खत्म हो गया है। फिलहाल कोटा सीट पर डॉक्टर रेणु जोगी विधायक हैं जिनके पति अजीत जोगी ने कांग्रेस छोड़कर जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ बना ली है और उनके बेटे अमित जोगी जो कि मरवाही से विधायक हैं, पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है। ऐसे में रेणु जोगी के खिलाफ कांग्रेस में स्वाभाविक माहौल है। सियासी गलियारों में ये भी चर्चा है कि इस बार कांग्रेस से रेणु जोगी को टिकट मिलना मुश्किल है।
कोटा में बदले सियासी समीकरण और रेणु जोगी के खिलाफ मौहाल को देखते हुए कांग्रेस में दावेदारों की भीड़ उमड़ पड़ी है और कई नेता तो अपना टिकट तय मानकर चुनाव प्रचार भी शुरू कर दिए हैं। इसमें सबसे पहला नाम है शैलेष पांडेय का, जो एक निजी यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार हैं। इनके अलावा अनु पांडेय, अरुण सिंह चौहान, संदीप शुक्ला और विभोर सिंह स्थानीय प्रत्याशी के नाम पर खुद के लिए टिकट मांग रहे हैं। इन नेताओं का कहना है कि इस बार पैराशूट प्रत्याशी को टिकट नहीं मिलना चाहिए।
वहीं दूसरी ओर बीजेपी की बात की जाए तो वो अबतक कोटा विधानसभा में कांग्रेस के तिलिस्म को तोड़ पाने में नाकाम रही है। लेकिन इस बार जीत का दावा कर रही बीजेपी के लिए यहां प्रत्याशी का चुनाव करना आसान नहीं रहेगा। संभावित उम्मीदवारों में पूर्व प्रत्याशी काशी साहू के साथ महिला आयोग की अध्यक्ष हर्षिता पांडेय का नाम सामने आ रहा है। इसके अलावा बिलासपुर सांसद लखनलाल साहू को भी बीजेपी यहां से चुनाव मैदान में उतर सकती है।
कुल मिलाकर कोटा में जिस तरह की राजनीतिक तस्वीर बन रही है, उससे तो चुनाव से पहले ही रोचक हो गया है कि कौन सी पार्टी किसे टिकट देगी। बीजेपी इस बार यहां अपने सांसद तक को मैदान में उतारने के लिए तैयार है, देखना है कि विरोधी दलों की रणनीति क्या होगी।
वेब डेस्क, IBC24