छत्तीसगढ़ उच्च अदालत ने स्कूल में प्रार्थना के आदेश के खिलाफ याचिका खारिज की

छत्तीसगढ़ उच्च अदालत ने स्कूल में प्रार्थना के आदेश के खिलाफ याचिका खारिज की

छत्तीसगढ़ उच्च अदालत ने स्कूल में प्रार्थना के आदेश के खिलाफ याचिका खारिज की
Modified Date: July 8, 2026 / 01:34 pm IST
Published Date: July 8, 2026 1:34 pm IST

बिलासपुर, आठ जुलाई (भाषा) छत्तीसगढ़ उच्च अदालत ने सरकारी स्कूलों में सरस्वती वंदना, गायत्री मंत्र, गुरु मंत्र और अन्य पारंपरिक प्रार्थनाओं को शामिल करने के राज्य सरकार के निर्देश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है।

अदालत ने कहा है कि छात्रों को उनकी धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ कार्य करने के लिए मजबूर करने वाला कोई अनिवार्य या दबाव डालने वाला निर्देश नहीं दिया गया है और यह याचिका समय से पहले दायर की गई है।

न्यायाधीश अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने दो जुलाई को यह आदेश दिया। याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता आमिर खान ने बताया कि फैसला मंगलवार को उच्च अदालत की वेबसाइट पर अपलोड किया गया।

राज्य में वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अब्दुल सलाम रिजवी, अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष महेंद्र छाबड़ा और बिलासपुर निवासी शफीक अहमद द्वारा दायर इस याचिका में राज्य के स्कूली शिक्षा विभाग द्वारा 12 जून को जारी एक परिपत्र को चुनौती दी गई थी। इस परिपत्र में विभाग के तहत आने वाले सभी स्कूलों को 2026-27 शैक्षणिक सत्र से रोजाना सांस्कृतिक, शैक्षिक और मूल्यों पर आधारित गतिविधियों की एक शृंखला आयोजित करने का निर्देश दिया गया है।

परिपत्र के अनुसार, स्कूल में सुबह की प्रार्थना के दौरान राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, दीप मंत्र, सरस्वती वंदना, गुरु मंत्र, शांति मंत्र और महान हस्तियों के जीवन के बारे में बताने तथा छुट्टी के दौरान राज्य गीत, गायत्री मंत्र और शांति मंत्र के पाठ का प्रावधान है।

याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि यह निर्देश संविधान के अनुच्छेद 14, 21, 25, 28(1), 29 और 30 का उल्लंघन करता है। उनका कहना था कि अल्पसंख्यक समुदायों के छात्र ऐसे धार्मिक कार्यों में भाग लेने के लिए मजबूर महसूस कर सकते हैं जो उनके धर्म से संबंधित नहीं हैं।

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता आमिर खान ने उच्च न्यायालय में दलील दी कि राज्य द्वारा पूरी तरह से वित्तपोषित शिक्षण संस्थान किसी विशेष धर्म से जुड़ी प्रार्थनाओं को लागू नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसा करना धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक सिद्धांत के खिलाफ होगा।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सरस्वती वंदना, गायत्री मंत्र, गुरु मंत्र और शांति मंत्र का पाठ करना सरकारी स्कूलों में धार्मिक शिक्षा देने और किसी विशेष धर्म को बढ़ावा देने के समान है, जो संवैधानिक रूप से प्रतिबंधित है।

उन्होंने दलील दी कि छात्रों को ऐसे मंत्रों का पाठ करने के लिए मजबूर करना उनकी अंतरात्मा और धर्म की स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा, जिससे उन्हें या तो अपनी मान्यताओं के खिलाफ काम करने या अपनी शिक्षा छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

याचिका का विरोध करते हुए उप महाधिवक्ता आनंद दादरिया ने दलील दी कि याचिका राजनीतिक रूप से प्रेरित है और किसी ठोस नुकसान के बजाय काल्पनिक आशंकाओं पर आधारित है।

उन्होंने कहा कि 12 जून का परिपत्र राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप है और इसका उद्देश्य भारतीय ज्ञान प्रणालियों और सांस्कृतिक जागरूकता को बढ़ावा देना है। राज्य सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 162 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र में इन राष्ट्रीय शैक्षणिक लक्ष्यों को लागू किया है। ऐसी नीतिगत बातों को असंवैधानिक या सांप्रदायिक नहीं कहा जा सकता।

राज्य ने अदालत को यह भी बताया कि यह नीति पहले ही सरकारी स्कूलों में लागू की जा चुकी है और छात्रों, अभिभावकों या शिक्षकों की ओर से कोई शिकायत नहीं मिली है।

दादरिया ने तर्क दिया कि परिपत्र में इस्तेमाल किए गए शब्द ‘अनिवार्य’ और ‘सुनिश्चित करना’ केवल स्कूल प्रशासन और अनुशासन से संबंधित है और इनमें कोई धार्मिक दबाव नहीं डाला गया है।

उन्होंने कहा कि जो छात्र तय श्लोकों का पाठ नहीं करना चाहते, उनके खिलाफ सजा या अनुशासनात्मक कार्रवाई का कोई प्रावधान नहीं है।

राज्य ने आगे कहा कि शांति मंत्र और भोजन मंत्र जैसे पारंपरिक श्लोक प्राचीन भारतीय दर्शन हैं जो सभी की भलाई, पर्यावरण संतुलन और कृतज्ञता को बढ़ावा देते हैं। ये राज्य के सरकारी स्कूलों में सभी छात्रों के लिए हैं, और किसी भी छात्र को इन गतिविधियों में भाग लेने के लिए अपनी धार्मिक आस्था को बदलने या छोड़ने की जरूरत नहीं है।

उन्होंने कहा कि यह आदेश भारत के संविधान के अनुच्छेद 51अ के संवैधानिक प्रावधान का पूरी तरह से समर्थन करता है, जो हर नागरिक के मौलिक कर्तव्यों को बताता है।

दोनों पक्षों को सुनने के बाद, उच्च अदालत ने पाया कि 12 जून के परिपत्र को ध्यान से पढ़ने पर ऐसा कोई अनिवार्य या दबाव डालने वाला निर्देश नहीं मिला जिससे छात्रों को अपनी धार्मिक मान्यताओं, अंतरात्मा या आस्था के खिलाफ काम करना पड़े।

अदालत ने कहा, ‘चुनौती दिए गए परिपत्र को पूरी तरह से पढ़ने पर, इसमें ऐसी किसी भी गतिविधि में भाग लेने की स्पष्ट जरूरत नहीं दिखती जो छात्रों की संविधान द्वारा सुरक्षित धर्म की स्वतंत्रता या अंतरात्मा की स्वतंत्रता में बाधा डाले।’

अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता किसी भी मौलिक अधिकार के उल्लंघन को दिखाने के लिए रिकॉर्ड पर कोई भी प्रासंगिक सामग्री पेश करने में पूरी तरह से विफल रहे हैं, क्योंकि कोई व्यक्तिगत या सीधा नुकसान नहीं दिखाया गया है।

एकल पीठ ने यह भी कहा कि यह अदालत मानती है कि यह याचिका पूरी तरह से समय से पहले दायर की गई है और यह किसी वास्तविक शिकायत के बजाय केवल आशंका पर आधारित है। इसलिए, इस चरण पर, याचिकाकर्ताओं द्वारा मांगी गई राहत नहीं दी जा सकती है।

पीठ ने हालांकि याचिकाकर्ताओं को भविष्य में ऐसी कोई स्थिति उत्पन्न होने पर ठोस सबूतों के साथ उचित याचिका के साथ अदालत का दोबारा रुख करने की स्वत्रंता दी।

भाषा सं संजीव मनीषा धीरज

धीरज


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