शह मात The Big Debate: सरेंडर करो या खाओ गोली.. नहीं चलेगी शांतिवार्ता की बोली! नक्सलवाद पर फिर गरमाई सियासत, आखिर किसके प्रयासों से घुटनों पर आए माओवादी?
सरेंडर करो या खाओ गोली.. नहीं चलेगी शांतिवार्ता की बोली! Naxalites in Chhattisgarh sought time from the government on the pretext of peace talks
रायपुरः नक्सलियों नें सरकार से पीस टॉक के बहाने वक्त मांगा तो जवाब में सरकार ने दो टूक कहा कि पहले सरेंडर फिर कोई बात और सरेंडर भी जल्द से जल्द वर्ना सफाए को फोर्स तैयार हैं। इसी के साथ बहस इस बात पर भी छिड़ गई है कि कौन है जिसने नक्सलियों को बैकफुट पर लाया। किसकी नीतियों ने ये असर पैदा किया? किसके प्रयासों से नक्सली घुटनों पर आए और क्या वाकई अब नक्सली हथियार छोड़ वैचारिक स्तर पर आ गए हैं?
देश के गृहमंत्री ने नक्सलवाद के पूर्व सफाए पर एक बार फिर साफ कर दिया है कि जो नक्सली हिंसा छोड़ सरेंडर करेंगे। सरकार उनके स्वागत में रेड कार्पेट बिछाएगी। केंद्रीय मंत्री शाह ने नई दिल्ली में ‘नक्सल मुक्त भारत’ कार्यक्रम के मंच से फिर ऐलान किया कि 31 मार्च 2026 तक देश से हथियारबंद नक्सलवाद से पूरी तरह मुक्त होगा। शाह ने कहा कि 2014 में मोदी सरकार आने पर देश में 126 नक्सल प्रभावित जिले थे, जो अब घटकर केवल 18 रह गए हैं।
इधर, छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री विजय शर्मा ने पहली बचे टॉप नक्सल लीडर्स का नाम लेकर उन्हें फौरन सरेंडर करने कहा। गृहमंत्री ने कहा कि आत्मसमर्पण के बाद सभी से चर्चा होगी, शर्मा ने दावा किया कि नक्सलवाद के खिलाफ अब लड़ाई हथियारों से विचारों तक पहुंच गई है बयान पर पीसीसी चीफ दीपक बैज ने पलटवार किया और कहा कि नक्सवाद की जड़ में वैचारिक की लड़ाई काफी पहले से है। साथ ही दावा किया कि हमारी वजह से ही नक्सलवाद का दायरा सिमटा,कंट्रोल हुआ है। दावे को खारिज करते हुए बीजेपी ने कहा कि कांग्रेस ने कभी नहीं चाहा कि नक्सलवाद खत्म हो।
बीते दिनों नक्सलियों के दो पत्र सामने आए। इन पत्रों में सरकार से सरेंडर के लिए वक्त मांगा गया। बाद में ये भी कहा गया कि सरेंडर की मंशा कुछ नक्सली लीडर्स की है। अब जवाब में बीजेपी सरकार ने साफ-साफ कह दिया है कि सरेंडर करना है तो जल्द से जल्द करें। सरकार का दावा है कि अब लगाई वैचारिक होगी तो विपक्ष का दावा है कि लड़ाई शुरू से ही वैचारिक रही है। सवाल है कि नक्सलियों के सफाए पर सरकार सही दिशा में है, रिजल्ट सामने हैं तो फिर इस पर बहस और जुबानी विरोध क्यों? क्या नक्सलवाद के खात्मे पर भी किसी को खिसियाहट है?
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