निजी धार्मिक संस्था को कानूनी दर्जा प्राप्त नहीं, वैवाहिक स्थिति तय नहीं कर सकती : अदालत
निजी धार्मिक संस्था को कानूनी दर्जा प्राप्त नहीं, वैवाहिक स्थिति तय नहीं कर सकती : अदालत
बिलासपुर, आठ सितंबर (भाषा) छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने तलाक से जुड़े एक मामले में कहा कि निजी धार्मिक संस्था या ‘शरिया अदालत’ को कानूनी दर्जा प्राप्त नहीं है और ऐसी संस्था को संविधान या कानून के तहत गठित न्यायालय की तरह वैवाहिक स्थिति तय करने का अधिकार नहीं है।
उच्च न्यायालय के सूत्रों ने बताया कि न्यायालय की एकल पीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि किसी निजी धार्मिक संस्था या ‘शरिया अदालत’ को कोई कानूनी दर्जा प्राप्त नहीं है।
सूत्रों के मुताबिक, आदेश में कहा गया कि ऐसी संस्था को संविधान अथवा कानून के तहत गठित न्यायालय की तरह वैवाहिक स्थिति तय करने का अधिकार नहीं है और उसकी तरफ से जारी कोई आदेश पक्षकारों के कानूनी अधिकारों या वैवाहिक स्थिति में बदलाव नहीं कर सकता।
न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने सोमवार को सुनाए गए फैसले में ‘इदारा-ए-शरिया इस्लामी अदालत’ की ओर से 18 जनवरी 2022 को जारी उस आदेश को कानूनी अधिकार से रहित करार दिया, जिसमें याचिकाकर्ता महिला को उसके पति द्वारा तलाक दिए जाने की घोषणा की गई थी।
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा, “धर्म किसी व्यक्ति की अंतरात्मा और व्यक्तिगत आस्था का मार्गदर्शन कर सकता है, लेकिन किसी भी धार्मिक संस्था या निजी निकाय को कानून द्वारा स्थापित न्यायालय का अधिकार ग्रहण करने या किसी व्यक्ति की कानूनी स्थिति और अधिकारों का निर्धारण अथवा प्रवर्तन करने के साधन के रूप में धार्मिक विश्वास का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कानून का शासन और संवैधानिक ढांचा सर्वोपरि बने रहते हैं।”
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट से प्राप्त जानकारी के अनुसार, रायपुर की एक मुस्लिम महिला ने अपने पति और ससुराल वालों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत के बाद सखी सेंटर ने काउंसलिंग की कार्यवाही शुरू की, जो विफल रही, जिसके बाद प्राथमिकी दर्ज की गई।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, याचिकाकर्ता के पहले पति का वर्ष 2015 में निधन हो गया था, जिसके बाद जुलाई 2020 में उसके परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों (जिनमें ससुराल वाले भी शामिल थे) की आपसी सहमति से उसका निकाह मोहम्मद आबिद खान के साथ करा दिया गया। पहली शादी से याचिकाकर्ता के बच्चे भी थे।
बाद में आबिद ने आरोप लगाया कि बच्चे नये परिवार के साथ घुल-मिल नहीं पा रहे थे और इसी आधार पर याचिकाकर्ता को तीन बार ‘तलाक’ बोलकर तलाक दे दिया। याचिकाकर्ता ने आबिद के फैसले को नहीं माना। दोनों पक्षों की तरफ से आरोप-प्रत्यारोप लगाए गए। याचिकाकर्ता ने अपने पति और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ उसका तथा उसके बच्चों का उत्पीड़न करने की भी शिकायत की। इस संबंध में एक नवंबर 2021 को मामला दर्ज किया गया।
शिकायत और प्राथमिकी, दोनों में विशेष रूप से दर्ज किया गया था कि शरीयत कानून के तहत ‘तीन तलाक’ प्रभावी करने के मकसद से याचिकाकर्ता को नोटिस दिए गए थे।
जानकारी के मुताबिक, मामला दर्ज होने के बाद सक्षम अधिकारियों के समक्ष कार्यवाही लंबित होने के बावजूद ‘इदारा-ए-शरिया इस्लामी अदालत’ ने 18 जनवरी 2022 को फैसला सुनाया कि याचिकाकर्ता को ‘तीन तलाक’ के माध्यम से तलाक दे दिया गया है। आदेश से व्यथित होकर याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की।
उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति प्रसाद की एकल पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद 12 अगस्त 2026 को फैसला सुरक्षित रख लिया था।
उन्होंने सोमवार को सुनाए गए फैसले में कहा कि शरिया अदालत को संविधान या सक्षम विधायिका की ओर से बनाए गए किसी कानून के तहत गठित न्यायालय के रूप में कार्य करने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं है।
फैसले में कहा गया कि शरिया अदालत की ओर से जारी कोई राय या फैसला बाध्यकारी नहीं है और उसे किसी दंडात्मक अथवा बलपूर्वक कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से लागू नहीं कराया जा सकता।
अदालत ने कहा कि इस निजी संस्था द्वारा जारी दस्तावेज अधिकतम एक धार्मिक राय या अभिमत हो सकता है और इसे विवाह-विच्छेद की न्यायिक डिक्री अथवा वैधानिक न्यायालय की ओर से सुनाए गए फैसले के रूप में नहीं माना जा सकता।
उच्च न्यायालय ने इस मामले में 2014 के विश्व लोचन मदन बनाम भारत संघ मामले में सुनाए गए फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें शीर्ष अदालत ने कहा था कि दारुल- कजा या किसी अन्य अनौपचारिक धार्मिक संस्था की ओर से जारी फतवा कानून के तहत स्थापित न्यायिक प्रणाली से उत्पन्न निर्णय नहीं होता और उसका कोई कानूनी आधार नहीं होता।
हालांकि, उच्च न्यायालय ने ‘तलाक-ए-हसन’ की संवैधानिक वैधता पर कोई टिप्पणी नहीं की। उसने कहा कि इस संबंध में प्रश्न उच्चतम न्यायालय के समक्ष विचाराधीन हैं।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उक्त आदेश महिला द्वारा दर्ज कराई गई प्राथमिकी से संबंधित आपराधिक कार्यवाही अथवा उसके किसी अन्य वैधानिक उपाय को प्रभावित नहीं करेगा। उसने कहा कि सक्षम अधिकारी इस संबंध में स्वतंत्र रूप से कानून के अनुसार कार्रवाई करेंगे।
भाषा
सं संजीव पारुल
पारुल

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