2024 हल्द्वानी दंगा मामला: शीर्ष अदालत ने दो आरोपियों को मिली ‘डिफॉल्ट’ जमानत रद्द की
2024 हल्द्वानी दंगा मामला: शीर्ष अदालत ने दो आरोपियों को मिली ‘डिफॉल्ट’ जमानत रद्द की
नयी दिल्ली, छह मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने उत्तराखंड के हल्द्वानी में 2024 में आगजनी और दंगों के एक मामले में दो आरोपियों को दी गई ‘डिफॉल्ट’ जमानत के आदेश को रद्द कर दिया है और उन्हें दो सप्ताह के भीतर निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।
यदि किसी मामले में तय समयसीमा के भीतर जांच पूरी नहीं होती है, तो आरोपी ‘डिफॉल्ट जमानत’ का हकदार होता है। अपराध की सजा के आधार पर यह समयसीमा 60 या 90 दिन होती है।
अदालत ने कहा, ‘‘रिकॉर्ड का अवलोकन करने पर हमें लगता है कि उच्च न्यायालय ने जांच अधिकारी के 90 दिनों के भीतर जांच पूरी न कर पाने के आचरण पर सवाल उठाकर पूरी तरह गलती की है।’’
शीर्ष अदालत ने अपराध की गंभीरता और जांच एजेंसी के सामने आई चुनौतियों का भी उल्लेख किया।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने उत्तराखंड सरकार की अपील स्वीकार की, जिसने जनवरी 2025 में उच्च न्यायालय द्वारा जावेद सिद्दीकी और अरशद अयूब को दी गई ‘डिफॉल्ट’ जमानत को चुनौती दी थी।
शीर्ष अदालत ने कहा कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय का यह कहना ‘‘पूरी तरह अनुचित’’ था कि जांच एजेंसी ने मामले की जांच उचित गति से नहीं की या उसने ढिलाई बरती।
पीठ ने चार मई के अपने आदेश में कहा, ‘‘इसमें कोई संदेह नहीं है कि जांच अत्यंत तेजी से आगे बढ़ रही थी, खासकर ऐसे मामले में जिसमें अपराध की गंभीरता, बड़ी संख्या में आरोपी और गवाह होने के कारण जांच एजेंसी के सामने गंभीर चुनौतियां थीं।’’
मामले में राज्य सरकार की ओर से उत्तराखंड के उप महाधिवक्ता जतिंदर कुमार सेठी पेश हुए।
पीठ ने इस बात का भी संज्ञान लिया कि प्राथमिकी एक ऐसे घटना से संबंधित थी, जिसमें व्यापक आगजनी, दंगे हुए और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया था, जिसमें एक पुलिस थाने की इमारत भी शामिल थी। इसमें बड़ी संख्या में आरोपियों पर पेट्रोल बम और अन्य हथियारों के इस्तेमाल के आरोप लगाए गए थे।
शीर्ष अदालत ने कहा कि आसपास के क्षेत्रों में इसी तरह की कुछ अन्य घटनाएं भी हुई थीं, जिनके संबंध में अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज की गई थीं।
पीठ ने कहा, ‘‘रिकॉर्ड का अवलोकन करने पर हम पाते हैं कि उच्च न्यायालय ने 90 दिनों के भीतर जांच पूरी न कर पाने को लेकर जांच अधिकारी के आचरण पर सवाल उठाकर पूरी तरह गलती की है।’’
इसने यह भी कहा कि उच्च न्यायालय का यह अवलोकन कि तीन महीनों में केवल आठ सरकारी गवाहों और चार सार्वजनिक गवाहों के बयान दर्ज किए गए, तथ्यात्मक रूप से गलत था।
पीठ ने कहा कि सेठी ने बताया कि उक्त 90 दिनों की अवधि में जांच एजेंसी ने 65 गवाहों के बयान दर्ज किए थे।
शीर्ष अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय इस महत्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान देने में विफल रहा कि आरोपियों ने जांच पूरी करने के लिए समय बढ़ाने के आदेश और जमानत खारिज होने को तुरंत उच्च न्यायालय में चुनौती नहीं दी, बल्कि सितंबर 2024 तक अपील दायर करने का इंतजार किया।
इसने कहा, ‘‘यह विवादित नहीं है कि अपील दायर होने से काफी पहले ही जांच पूरी हो चुकी थी और आरोप-पत्र दाखिल कर दिया गया था।’’
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा, ‘‘इस प्रकार, हमारा मत है कि जबतक आरोपी प्रतिवादी उच्च न्यायालय पहुंचे, तब तक वे अपनी सहमति के कारण ‘डिफॉल्ट’ जमानत के अनुरोध का अधिकार खो चुके थे। परिणामस्वरूप, विवादित आदेश न्यायिक जांच में टिक नहीं पाता और इसे रद्द किया जाता है।’’
पीठ ने आरोपियों को दो सप्ताह के भीतर निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया और कहा कि ऐसा न करने पर निचली अदालत उन्हें हिरासत में लेने के लिए कड़े कदम उठाए।
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा, ‘‘आरोपी प्रतिवादी नियमित जमानत के लिए आवेदन करने के लिए स्वतंत्र होंगे, जिस पर गुण-दोष के आधार पर और यहां की गई किसी भी टिप्पणी से प्रभावित हुए बिना, विचार किया जाएगा।’’
फरवरी 2024 में इस मामले में प्राथमिकी दर्ज की गई थी, जिसमें भारतीय दंड संहिता, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान से संरक्षण अधिनियम, शस्त्र अधिनियम और गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम, 1967 की विभिन्न धाराओं के तहत कथित अपराध शामिल थे।
भाषा सुरेश मनीषा
मनीषा

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