बंगाल में 58 बागी विधायकों ने रिताब्रता को नेता प्रतिपक्ष चुना; विधानसभा अध्यक्ष ने दी मान्यता

बंगाल में 58 बागी विधायकों ने रिताब्रता को नेता प्रतिपक्ष चुना; विधानसभा अध्यक्ष ने दी मान्यता

बंगाल में 58 बागी विधायकों ने रिताब्रता को नेता प्रतिपक्ष चुना; विधानसभा अध्यक्ष ने दी मान्यता
Modified Date: June 3, 2026 / 09:08 pm IST
Published Date: June 3, 2026 9:08 pm IST

(तस्वीरों के साथ)

कोलकाता, तीन जून (भाषा) तृणमूल कांग्रेस के 28 साल के इतिहास में बुधवार को पहली बार विभाजन हुआ, जब 58 बागी विधायकों ने पार्टी के विधायक दल पर नियंत्रण कर लिया और निष्कासित विधायक रिताब्रता बनर्जी को अपना नेता चुना तथा पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष से मान्यता प्राप्त कर ली।

हालांकि, रिताब्रता बनर्जी ने पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी से नवगठित विधायक दल के मुख्य सलाहकार के रूप में कार्य करने का आग्रह किया। वहीं, असंतुष्ट विधायकों ने विधानसभा में खुद को ‘‘असली’’ तृणमूल कांग्रेस घोषित कर दिया।

यह नाटकीय घटनाक्रम उस बगावत की अंतिम परिणति है जो नेता प्रतिपक्ष के नाम के प्रस्ताव संबंधी एक पत्र पर जाली हस्ताक्षरों के आरोपों से शुरू हुई थी। बाद में यह विवाद बढ़ता गया और विधानसभा चुनाव में भाजपा के हाथों तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद पार्टी नेतृत्व को खुली चुनौती में तब्दील हो गया।

विधानसभा अध्यक्ष से मुलाकात के बाद, रिताब्रता बनर्जी ने प्रेसवार्ता में दावा किया कि बागी गुट को तृणमूल कांग्रेस के 80 विधायकों में दो-तिहाई का समर्थन प्राप्त है और उसने विधायक दल का नेतृत्व करने का अपना दावा औपचारिक रूप से पेश किया है।

उन्होंने कहा, ‘‘हमारा दावा विधानसभा अध्यक्ष ने स्वीकार कर लिया।’’

संख्याबल के आधार पर वैधता का दावा करते हुए, उन्होंने कहा कि असंतुष्ट गुट अब सदन में वास्तविक विपक्ष का प्रतिनिधित्व करता है।

रिताब्रता बनर्जी ने कहा, ‘‘तृणमूल विधायक दल 58 विधायकों की टीम है, जिन्होंने तृणमूल के चुनाव चिह्न पर चुनाव जीता है।’’

उन्होंने कहा कि दो और विधायक है जो वर्तमान में राज्य से बाहर हैं तथा उन्होंने अपने समर्थन का आश्वासन दिया है। उन्होंने कहा कि दोनों के जल्द ही औपचारिक रूप से इस खेमे में शामिल होने की उम्मीद है।

उन्होंने कहा कि अध्यक्ष ने विधानमंडल दल की नयी संरचना को स्वीकार कर लिया है। बागी गुट ने विधायक दल के लिए एक नयी नेतृत्व संरचना भी पेश की।

रिताब्रता बनर्जी ने कहा कि अखरुज्ज़मां को मुख्य सचेतक नियुक्त किया गया है, जबकि वरिष्ठ विधायक जावेद अहमद खान, संदीपन साहा, सबीना यास्मीन और शिउली साहा उप-नेता होंगे।

उन्होंने कहा, ‘‘इन नियुक्तियों की सूचना देने संबंधी पत्र विधानसभा अध्यक्ष को सौंप दिए गए हैं।’’

बगावत की वैधता स्थापित करने के प्रयास में, रिताब्रता बनर्जी ने बार-बार संसदीय परंपराओं और अपने विधायक दल के संख्याबल का हवाला दिया।

उन्होंने कहा, “विधानसभा में हम बहुमत में हैं। संसदीय मानदंडों के अनुसार, पश्चिम बंगाल विधानसभा में हम ही वास्तविक और मुख्य विपक्ष हैं।”

उन्होंने कहा, ‘‘हम ममता बनर्जी से अनुरोध करते हैं कि वह तृणमूल कांग्रेस विधायक दल की मुख्य सलाहकार की भूमिका निभाएं।’’

उन्होंने असंतुष्ट खेमे और पार्टी के संगठनात्मक नेतृत्व के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए यह भी संकेत दिया कि असंतुष्ट खेमे का ममता बनर्जी के भतीजे और तृणमूल नेता अभिषेक बनर्जी के साथ बहुत कम राजनीतिक जुड़ाव है।

यह टिप्पणी पार्टी के विधायकों और उसके संगठनात्मक नेतृत्व के एक वर्ग के बीच बढ़ती दरार को रेखांकित करती है, जो चुनाव में मिली हार के बाद और चौड़ी हो गई है।

रिताब्रता बनर्जी ने कहा कि बागी खेमा रचनात्मक विपक्ष के रूप में काम करेगा। उन्होंने कहा, “हम सरकार की उन नीतियों का विरोध करेंगे जो हमें सही नहीं लगेंगी। लेकिन हम सिर्फ विरोध करने के लिए विरोध नहीं करेंगे।”

उन्होंने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी को धन्यवाद देते हुए कहा कि उन्होंने (मुख्यमंत्री ने) विपक्षी विधायकों को आज सुबह राज्य सचिवालय ‘नबान्न’ में आयोजित प्रशासनिक बैठक में आमंत्रित किया था। उन्होंने बताया कि कोलकाता, हावड़ा और उत्तर 24 परगना के बागी विधायकों ने बैठक में भाग लिया।

उन्होंने कहा, ‘‘हम एक जिम्मेदार और रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाएंगे। जरूरत पड़ने पर हम सरकार का डटकर मुकाबला करेंगे, लेकिन सरकार द्वारा उठाए गए सकारात्मक कदम की सराहना भी करेंगे।’’

उन्होंने कहा, ‘‘मैं बॉस नहीं हूं। मैं धौंस जमाने में विश्वास नहीं करता। मैं ‘हम’ में विश्वास करता हूं। सभी निर्णय चर्चा के माध्यम से लिए जाएंगे।’’

इस बगावत की जड़ें विधानसभाध्यक्ष को भेजे गए उस प्रस्ताव से जुड़े विवाद में निहित हैं, जिसमें वरिष्ठ टीएमसी विधायक शोभनदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता देने की मांग की गई थी। इस प्रस्ताव के कारण कई विधायकों के हस्ताक्षर जाली होने के आरोप लगे, जिसके बाद प्राथमिकी दर्ज की गई और सीआईडी ​​​​जांच शुरू की गई।

बनर्जी और उनके साथी बागी विधायक संदीपन साहा ने ही सबसे पहले विधानसभा अधिकारियों के समक्ष कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठाया था, जिससे शुरू में आंतरिक विवाद प्रतीत होने वाला मामला विधायक दल पर नियंत्रण की लड़ाई में तब्दील हो गया।

बुधवार को यह लड़ाई निर्णायक मोड़ पर पहुंचती नजर आई।

विधानसभाध्यक्ष द्वारा असंतुष्ट विधायकों के दावे को स्वीकार करने के साथ पहला विभाजन औपचारिक रूप से हो गया।

भाषा

राजकुमार सुभाष

सुभाष


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