भारत के 74 प्रतिशत ‘जेन-जी’ पद के बजाय कार्य-जीवन संतुलन को महत्व देते हैं : सर्वेक्षण
भारत के 74 प्रतिशत ‘जेन-जी’ पद के बजाय कार्य-जीवन संतुलन को महत्व देते हैं : सर्वेक्षण
नयी दिल्ली, एक सितंबर (भाषा) भारत के 74 प्रतिशत ‘जेन-जी’ कार्यस्थल पर ऊंचा मुकाम पाने के बजाय कार्य-जीवन में संतुलन को प्राथमिकता देते हैं, जबकि इस वर्ग के कम से कम 65 प्रतिशत लोगों का मानना है कि सफल करियर के लिए कार्यकारी नेतृत्व प्राप्त करना आवश्यक नहीं है। यह दावा एक नवीनतम रिपोर्ट में किया गया है।
शिक्षा के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर काम करने वाली कंपनी ‘एमरिटस’ ने ‘इंडियाज जेन जी ऑउटलुक-2026: रीकैलकुलेशन, एम्बिशन एंड सक्सेस; द नो कैप जनरेशन (भारती के जेन जी पर एक नजर-2026 : पुनर्आकलन, अकांशा और सफलता; पीढ़ी पर कोई बंदिश नहीं)नाम से एक रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट भारत के बड़े शहरों में 15 से 28 साल की उम्र के 1,010 लोगों पर किये गए सर्वेक्षण पर आधारित है, जो ज़िंदगी के तीन अलग-अलग पड़ावों कॉलेज से पहले का समय, बदलाव का दौर और करियर की शुरुआत से गुज़र रहे हैं।
इस रिपोर्ट में यह जानने की कोशिश की गई है कि वीजा को लेकर अनिश्चितता, विदेश में पढ़ाई का बढ़ता खर्च और कृत्रिम मेधा (एआई) के बढ़ते प्रभाव के बीच युवा भारतीय किस तरह उच्च शिक्षा, कौशल और करियर के पारंपरिक रास्तों पर नए सिरे से विचार कर रहे हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘एक ऐसी पीढ़ी जिसने अपनी ‘फीड’ (सोशल मीडिया पर स्वत: आने वाली अद्यतन जानकारी) पर लोगों की नौकरी जाते हुए देखा है और वीजा की अनिश्चितता के कारण अपनी योजनाओं को बदलते देखा है, उसने एक समझदारी भरा नतीजा निकाला है, करियर की पारंपरिक सीढ़ी पर चढ़ना सुरक्षित नहीं है।’’
इसके मुताबिक, ‘‘74 प्रतिशत लोग औपचारिक नेतृत्व के बजाय काम और निजी जिंदगी के बीच संतुलन को अधिक अहमियत देते हैं। इसी प्रकार 65 प्रतिशत लोग इस बात से सहमत हैं कि सफल करियर के लिए कार्यकारी नेतृत्व प्राप्त करना आवश्यक नहीं है।’’
रिपोर्ट के मुताबिक विदेश में पढ़ाई की पारंपरिक परिपाटी की लोकप्रियता घटती जा रही है। विदेश में पढ़ाई करने पर विचार करने वाले 48 प्रतिशत लोगों का कहना है कि पिछले एक साल में उनकी दिलचस्पी कम हुई है। इसकी वजहें हैं – अधिक लागत , वीजा की शर्तें और पढ़ाई के बाद नौकरी मिलने को लेकर अनिश्चितता है। सबसे अधिक अरुचि अमेरिका के मामले में देखी गई है, जबकि अब कई नए विकल्प सामने आ रहे हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘11-12वीं कक्षा के और महाविद्यालय जाने की तैयारी कर रहे समूह के 87 प्रतिशत और 92 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे भारत में किसी अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग वाले विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने को अधिक तरजीह देंगे। वीजा से जुड़ी अनिश्चितता से बचने के लिए, इस समूह के 69 प्रतिशत छात्र विदेश जाने के बजाय भारत में मौजूद अंतरराष्ट्रीय पाठ्यक्रम को अधिक पसंद करेंगे।’’
सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक, ‘‘ शिक्षण संस्थान के परिसर में पढ़ाई करना अब भी मुख्य विकल्प बना हुआ है, लेकिन ‘पाथवे मॉडल’ तेजी से पसंद किया जाने वाला विकल्प बन रहा है। इस मॉडल में भारत में पढ़ाई के साथ-साथ कुछ समय के लिए मुख्य परिसर में रहने या सेमेस्टर अदान-प्रदान कार्यक्रम का अनुभव शामिल होता है।’’
इसके मुताबिक, ‘‘महाविद्यालय में दाखिले से पहले (27प्रतिशत) और दाखिले के फैसले के करीब पहुंचने वाले छात्रों (39 प्रतिशत) की पसंद में 12 अंकों का अंतर देखा गया है। इसका अभिप्राय है कि छात्र जैसे-जैसे दाखिले का फैसला लेने के करीब आते हैं, उन्हें यह ‘पाथवे मॉडल’ उतना ही आकर्षक लगने लगता है।’’
एमरिटस के सह-संस्थापक और सीईओ अश्विन दमेरा ने कहा, ‘‘जेन-जी (1997 और 2012 के बीच जन्मे लोग) शायद आज सबसे अधिक चर्चा में रहने वाली पीढ़ी है। इन्हें जितना सराहा जाता है, उतना ही गलत समझा जाता है और कम आंका जाता है। इसलिए हमने उनसे जुड़ने और यह समझने का फैसला किया कि वे असल में क्या कह रहे हैं, वे बड़े बदलावों, जानकारी और प्रौद्योगिकी तक पहुंच, और ‘करियर कैपिटल’ (यानी बौद्धिक गहराई, संस्थागत ब्रांड और साथियों के नेटवर्क) के नए आयाम पर कैसी प्रतिक्रिया दे रहे हैं।’’
भाषा धीरज नरेश
नरेश

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