बिखरे मानव अंग, जले शव : विमान हादसे के एक साल बाद, फोरेंसिक वैज्ञानिक ने भयावह घटना याद की

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बिखरे मानव अंग, जले शव : विमान हादसे के एक साल बाद, फोरेंसिक वैज्ञानिक ने भयावह घटना याद की

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  • Publish Date - June 11, 2026 / 01:55 PM IST,
    Updated On - June 11, 2026 / 01:55 PM IST

गांधीनगर, 11 जून (भाषा) महिला का कटा हुआ हाथ और उसकी उंगलियां कसकर बंद मानो वह मदद की गुहार लगा रही हो… अहमदाबाद में एआई-171 विमान हादसे के एक साल बाद भी फोरेंसिक वैज्ञानिक एच.पी. सांघवी यह दर्दनाक दृश्य नहीं भूल पाए हैं।

गत वर्ष 12 जून की दोपहर में अहमदाबाद से उड़ान भरने के कुछ ही सेकंड बाद लंदन जाने वाला ड्रीमलाइनर विमान एक छात्रावास परिसर में दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें सवार 241 लोग और ज़मीन पर 19 लोग मारे गए। सिर्फ़ एक यात्री जीवित बचा। मृतकों में से कई इतनी बुरी तरह जल गए थे कि पहचानना मुश्किल था।

गुजरात फोरेंसिक विज्ञान निदेशालय (डीएफएस) के निदेशक सांघवी और उनकी 38 लोगों की टीम पर यह ज़िम्मेदारी आ गई कि वे मारे गए लोगों की पहचान करने के लिए जैविक नमूनों की जांच करें और राख से निकाले गए टूटे हुए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण की भी जांच करें ताकि अधिक से अधिक जानकारी निकाली जा सके।

पंद्रह दिनों में डीएफएस टीम ने 142 मृतकों की पहचान की। दिन रात मानो एक हो गए और फोरेंसिक वैज्ञानिक इस मुश्किल काम को पूरा करने के लिए जी जान से जुटे रहे।

सांघवी के लिए, कटे हुए हाथ की वह तस्वीर ऐसी है जिसे वह भूल नहीं पाते। उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ‘ऐसा लग रहा था जैसे वह मदद के लिए गुहार लगा रही हो… आज भी, एक साल बाद, हम उसके आखिरी पलों के डर की सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं।’

सांघवी ने कहा कि यह चौबीसों घंटे चलने वाला ऑपरेशन था। उन्होंने कहा कि उन्हें गांधीनगर में डीएफएस मुख्यालय में एक बैठक के दौरान एक मोबाइल संदेश के ज़रिए विमान हादसे के बारे में बताया गया था।

उन्होंने राज्य भर की प्रयोगशालाओं से डीएनए विशेषज्ञों को बुलाया और आवश्यक उपकरण जुटाने के प्रयास शुरु किए। इसके बाद गांधीनगर में 38 फोरेंसिक वैज्ञानिकों का समूह काम पर लग गया।

प्रयोगशाला में 180 से ज़्यादा जैविक नमूने रखे गए थे, जिनमें से कई बहुत ज़्यादा गर्मी और तेज़ी से जलने की वजह से बुरी तरह खराब हो गए थे। इससे ठीक ऊतक निकालना एक बहुत बड़ी चुनौती बन गई।

सांघवी ने कहा, ‘हमारी टीमों ने पहले 100 घंटों में 100 डीएनए प्रोफ़ाइल बनाने में कामयाबी हासिल की।’

मृतकों की पहचान जटिल डीएनए विश्लेषण से की गई। अपने प्रियजनों की खबर का इंतज़ार कर रहे दुखी परिवारों के लिए प्रक्रिया को तेज़ करने के वास्ते, पीड़ितों के रिश्तेदारों के खून के नमूने को रैपिड डीएनए तकनीक का इस्तेमाल करके संसाधित किया गया, जिससे सिर्फ़ 90 मिनट में जेनेटिक प्रोफ़ाइल बन सकती है।

कुछ मामलों में करीबी रिश्तेदारों की गैरमौजूदगी की वजह से डीएनए का मिलान करना मुश्किल हो गया था। सांघवी ने कहा, ‘पहचान की पुष्टि के लिए 100 फीसदी मिलान ज़रूरी है। कई मामलों में, सिर्फ़ दूर के रिश्तेदार ही मौजूद थे, जिससे हमारा काम और भी मुश्किल हो गया।’

इसी बीच साइबर फोरेंसिक इकाई ने एक अलग काम किया। उन्हें मलबे से निकाले गए 200 टूटे हुए, राख से ढके इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, पिघले हुए स्मार्ट फ़ोन, टूटे हुए लैपटॉप, स्मार्ट घड़ियां और टूटे हुए मेमोरी कार्ड दिए गए।

प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों ने ‘एडवांस्ड डेटा एक्सट्रैक्शन सिस्टम’ का इस्तेमाल करके, डिजिटल फ़ाइलें फिर से बनाईं। वे जानते थे कि वे सिर्फ़ हादसे के सबूत ही नहीं, बल्कि पारिवारिक फ़ोटो, आखिरी बार भेजे गए टेक्स्ट मैसेज और वीडियो भी ढूंढ रहे थे।

सांघवी ने कहा, ‘आखिर में, इन डिजिटल अवशेषों को उन शोकाकुल परिवारों को लौटा दिया गया, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया था।’

उन्होंने कहा कि उन 15 पीड़ादायी दिनों में, निजी ज़िंदगी पूरी तरह से पीछे छूट गई थी। उन्होंने बताया कि एक अधिकारी उन दिनों ही मां बनी थीं, लेकिन वह एक घंटे की छुट्टी लेतीं, अपने बच्चे को दूध पिलातीं और सीधे प्रयोगशाला आ जातीं। एक और अधिकारी ने अपनी मां की हार्ट सर्जरी 10 दिन आगे बढ़ा दी।

सांघवी के अनुसार, इस आपदा ने कुछ सबक भी सिखाए जिनका इस्तेमाल भविष्य में बड़े पैमाने पर मौत की ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं में किया जा सकता है। उन्होंने कहा, ‘इस अनुभव से एक बड़ा सबक यह मिला कि मेडिकल कर्मचारियों और फोरेंसिक टीम के बीच सही तालमेल होना ज़रूरी है ताकि तेज़ी से जांच हो सके।’

भाषा मनीषा वैभव

वैभव