प्रतिकूल आदेश मामले को दूसरे न्यायाधीश के समक्ष स्थानांतरित करने का आधार नहीं: अदालत

प्रतिकूल आदेश मामले को दूसरे न्यायाधीश के समक्ष स्थानांतरित करने का आधार नहीं: अदालत

प्रतिकूल आदेश मामले को दूसरे न्यायाधीश के समक्ष स्थानांतरित करने का आधार नहीं: अदालत
Modified Date: April 14, 2026 / 06:41 pm IST
Published Date: April 14, 2026 6:41 pm IST

नयी दिल्ली, 14 अप्रैल (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि किसी न्यायाधीश द्वारा दिया गया प्रतिकूल आदेश किसी पूर्वाग्रह के चलते मामले को स्थानांतरित किये जाने के अनुरोध का आधार नहीं हो सकता।

न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने कहा कि प्रतिकूल आदेश की स्थिति में, याचिकाकर्ता के पास कानून में उपलब्ध विकल्पों का सहारा लेने का अधिकार है।

न्यायमूर्ति बनर्जी ने यह आदेश एक महिला की उस याचिका पर दिया जिसमें उसने अपने वैवाहिक मामले को एक महिला न्यायालय से दूसरे महिला न्यायालय में स्थानांतरित किये जाने का अनुरोध किया था।

न्यायमूर्ति बनर्जी ने सात अप्रैल को पारित आदेश में कहा कि संबंधित प्रमुख न्यायाधीश और जिला न्यायाधीश ने एक तर्कसंगत आदेश देते हुए मामले को दूसरे न्यायाधीश को स्थानांतरित किये जाने का अनुरोध करने वाली याचिकाकर्ता की याचिका को खारिज कर दिया था।

अदालत ने गौर किया कि प्रमुख न्यायाधीश के आदेश में कहा गया था कि भारतीय दंड संहिता के तहत कथित क्रूरता के आपराधिक मामले में उसके पति और सास को मात्र बरी किया जाना अनुमानित पूर्वाग्रह का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि आरोपों को साबित करने का दायित्व याचिकाकर्ता पर है।

उच्च न्यायालय के समक्ष याचिकाकर्ता ने प्रमुख न्यायाधीश और जिला न्यायाधीश के उस आदेश को चुनौती दी जिसमें उसके मामले को दूसरे न्यायाधीश के समक्ष स्थानांतरित किये जाने से इनकार कर दिया गया था।

अदालत ने याचिका खारिज कर दी और कहा कि याचिकाकर्ता उन्हीं मुद्दों को फिर से उठाने की कोशिश कर रही हैं जिन्हें प्रमुख न्यायाधीश के तर्कपूर्ण आदेश द्वारा पहले ही खारिज कर दिया गया था।

भाषा संतोष नरेश

नरेश


लेखक के बारे में