कई दिनों की भूख हड़ताल से उबर रहीं आइसा की नेता नेहा बोरा ने 20 जुलाई की हिंसा को किया याद

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कई दिनों की भूख हड़ताल से उबर रहीं आइसा की नेता नेहा बोरा ने 20 जुलाई की हिंसा को किया याद

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  • Publish Date - August 2, 2026 / 05:51 PM IST,
    Updated On - August 2, 2026 / 05:51 PM IST

(अंजली ओझा)

नयी दिल्ली, दो अगस्त (भाषा) ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) अध्यक्ष नेहा बोरा का शरीर 23 दिन की भूख हड़ताल खत्म होने के कई दिन बाद भी ‘‘भोजन का आदी’’ नहीं हो पाया है, क्योंकि वह धीरे-धीरे खाना सीख रहा है।

इसके बावजूद, अपनी शारीरिक कमजोरी की परवाह न करते हुए उन्होंने जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन में भाग लेने के कारण हिरासत में लिए गए या गिरफ्तार किए गए प्रदर्शनकारियों की रिहाई को लेकर आवाज उठाने के लिए विभिन्न राज्यों का दौरा किया।

नेहा बोरा उन चुनिंदा छात्र नेताओं में शामिल थीं, जिन्होंने राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) विवाद के खिलाफ तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर कई दिनों तक भूख हड़ताल की थी।

उत्तराखंड की निवासी एवं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में शोधरत नेहा का मानना है कि इस आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में युवाओं का जागरूक होना है। वह यह भी मानती हैं कि इस आंदोलन के बाद उनकी राजनीति को लेकर उनकी मां की सोच में भी सकारात्मक बदलाव आया है।

नेहा ने ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में कहा, ‘‘भूख हड़ताल के दौरान मेरा शरीर बिना भोजन के रहने का आदी हो गया था। अब इसे फिर से खाने के अनुकूल ढलना होगा।’’

उन्होंने कहा, ‘‘मेरा पाचन तंत्र अभी भी सामान्य भोजन का पूरी तरह आदी नहीं हुआ है और अधिक भोजन सहन नहीं कर पा रहा। इसलिए मैं मसालेदार भोजन और लाल मांस से परहेज कर रही हूं, क्योंकि इससे पाचन संबंधी दिक्कतें बढ़ जाती हैं। हालांकि, अब मेरी तबीयत पहले से बेहतर है। धीरे-धीरे मेरा शरीर खाने को पचाने की कोशिश कर रहा है।’’

शारीरिक तकलीफों के बावजूद आंदोलन समाप्त होते ही नेहा बिहार पहुंचीं। वहां उन्होंने उन प्रदर्शनकारियों से मुलाकात की, जिन्हें मुकदमे वापस लेने के आश्वासन के बावजूद गिरफ्तार कर लिया गया था।

उन्होंने कहा, ‘‘यह सफर थोड़ा मुश्किल जरूर था, लेकिन बेहद जरूरी भी। 600 से अधिक छात्रों को गिरफ्तार किया गया था और कुछ पर तो हत्या के प्रयास जैसे गंभीर आरोप भी लगाए गए थे। हम पटना गए, सिवान में घायल प्रदर्शनकारियों से मिले और पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) से भी बातचीत की। अगर हम उस समय वहां नहीं जाते, तो शायद उन छात्रों की रिहाई नहीं हो पाती।’’

नेहा बोरा का कहना है कि जंतर-मंतर पर आंदोलन के दौरान जो लोग उनके साथ मजबूती से खड़े रहे, उन्हें मुश्किल वक्त में अकेला छोड़ देना उनके लिए संभव नहीं था।

उन्होंने कहा कि अपनी 23 दिन की भूख हड़ताल के कारण अत्यधिक कमजोर होने की वजह से वह 20 जुलाई के मार्च में शामिल नहीं हो सकीं।

उन्होंने कहा कि जब घायल लोग लौट रहे थे, तब वह डॉक्टरों के साथ धरना स्थल के टेंट में ही थीं।

उन्होंने कहा, ‘‘उस दिन हमारी भूख हड़ताल समाप्त हुई थी और हमारी शारीरिक हालत ऐसी नहीं थी कि हम मार्च में शामिल हो पाते। अगर उस समय हम पर भी लाठी चली होती, तो शायद हमें सीधे आईसीयू (गहन चिकित्सा कक्ष) में भर्ती कराना पड़ता।’’

नेहा ने कहा, ‘‘हम अपने टेंट में तीन डॉक्टरों और जरूरी चिकित्सीय सामग्री के साथ बैठे थे। मार्च शुरू होने के करीब 30 से 45 मिनट बाद आंसू गैस के गोले छोड़े जाने की आवाजें सुनाई दीं। इसके कुछ ही देर बाद घायल प्रदर्शनकारी वापस लौटने लगे।’’

उन्होंने कहा, ‘‘उनके जख्मों को हमने अपनी आंखों से देखा।’’

नेहा ने उस मंजर को याद करते हुए कहा, ‘‘एक छात्र की बांह टूटी हुई थी। डॉक्टरों ने गत्ते के टुकड़े का सहारा देकर पट्टी बांधी, क्योंकि एम्बुलेंस उस तक नहीं पहुंच पा रही थी। एक अन्य साथी की गर्दन पर लाठी मारी गई थी, जिससे उसकी गर्दन लाल, सूजी हुई और मुड़ी हुई थी।’’

नेहा ने आरोप लगाया कि एक महिला प्रदर्शनकारी का ‘‘पैर बुरी तरह जख्मी’’ था, जबकि दूसरी महिला के सीने पर एक पुरुष सुरक्षाकर्मी ने लाठी से वार किया, जिससे उसके सीने में सूजन आ गई और स्नायुबंधन (लिगामेंट) में चोट पहुंची।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों को कई स्तर की बैरिकेडिंग के बीच घेर लिया गया।

उन्होंने आरोप लगाया, ‘‘एक तरफ से आंसू गैस के गोले छोड़े जा रहे थे और दूसरी तरफ लाठीचार्ज हो रहा था, इसलिए लोग जान बचाने के लिए दूसरी ओर भागते थे। लेकिन वहां भी बैरिकेडिंग, आंसू गैस और लाठीचार्ज हो रहा था। बाद में बैरिकेड हटाए गए, जिससे लोग एक ही जगह पर इकट्ठा हो गए और भगदड़ जैसी स्थिति पैदा हो गई। उसमें बुजुर्ग और बच्चे भी फंस गए थे। लोगों को समझ ही नहीं आ रहा था कि वे किस दिशा में जाएं।’’

नेहा ने बताया कि बाद में वह दिल्ली विश्वविद्यालय के एक छात्र से मिलीं, जिसकी आंख में छर्रा लगने से उसकी एक आंख की रोशनी चली गई थी।

छात्र नेता ने कहा कि वह अंबेडकर विश्वविद्यालय के एक ऐसे छात्र से भी मिलीं, जिसके शरीर में छर्रे फंसे हुए थे। इसके अलावा, वह उस छात्रा के माता-पिता से भी मिलीं, जो उस समय वेंटिलेटर पर भर्ती थी।

उन्होंने कहा, ‘‘हमने यह सब अपनी आंखों से देखा है।’’

नेहा का कहना है कि पुलिस की कार्रवाई ने आंदोलन को कमजोर करने के बजाय और अधिक मजबूत कर दिया।

उन्होंने कहा, ‘‘उन्हें (पुलिस) लगा था कि वे हमारे शरीर और हमारा हौसला दोनों तोड़ देंगे। लेकिन 20 जुलाई के बाद जंतर-मंतर पर जितने लोग पहुंचे, वह हमारी कल्पना से भी परे था। सिर फूटे होने और हड्डियां टूटी होने के बावजूद लोग सुबह से शाम तक वहां डटे रहे।’’

प्रदर्शन स्थल पर लौटने के बाद दिए अपने संबोधन को याद करते हुए नेहा ने कहा कि उन्होंने लोगों से कहा था कि ‘‘हमारे शरीरों पर लगे ये निशान गवाही देंगे।’’

उन्होंने कहा, ‘‘आने वाली पीढ़ियों को हम बताएंगे कि संसद में बैठे लोगों ने क्या आदेश दिए थे और इस देश के नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार किया था। हम इसे कभी नहीं भूलेंगे।’’

उन्होंने कहा कि इस आंदोलन ने उनके परिवार के साथ उनके संबंधों को भी बदल दिया।

नेहा ने कहा कि लंबे समय तक उनकी राजनीति से असहमत रहीं उनकी मां 19 जुलाई को जंतर-मंतर पहुंचीं और अगले दिन की पूरी घटना की प्रत्यक्षदर्शी भी रहीं।

उन्होंने कहा, ‘‘जब धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया, तो मेरी माँ ने मुझे फोन किया और कहा कि मुझे अपने साथियों को बधाई देनी चाहिए, क्योंकि हमने यह हासिल कर लिया है। देशभर के अभिभावकों की सोच में जो बदलाव मैंने देखा, वही बदलाव मेरे अपने घर में भी आया। मेरे लिए यह आंदोलन एक व्यक्तिगत उपलब्धि भी है।’’

भारतीय सेना में सेवा दे चुके अपने पिता के बारे में पूछे जाने पर नेहा ने कहा कि आंदोलन के बाद अभी तक उनकी अपने पिता से बात नहीं हुई है।

मुस्कुराते हुए उन्होंने बात खत्म की, ‘‘मैंने अभी अपने पिता से बात नहीं की है। उम्मीद है, जब घर जाऊंगी…।’’

भाषा खारी दिलीप

दिलीप