इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एनडीपीएस कानून के तहत एहतियातन हिरासत आदेशों पर नाखुशी जाहिर की

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एनडीपीएस कानून के तहत एहतियातन हिरासत आदेशों पर नाखुशी जाहिर की

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एनडीपीएस कानून के तहत एहतियातन हिरासत आदेशों पर नाखुशी जाहिर की
Modified Date: August 6, 2026 / 09:51 pm IST
Published Date: August 6, 2026 9:51 pm IST

प्रयागराज, छह अगस्त (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने संबंधित अधिकारियों द्वारा बिना विवेक इस्तेमाल किए और हिरासत के आधारों का बगैर जिक्र किए एनडीपीएस कानून के तहत एहतियातन हिरासत के आदेश जारी करने पर नाखुशी जाहिर की है।

अदालत ने आपराधिक न्याय व्यवस्था के हित में केंद्र सरकार को बिना विवेक इस्तेमाल किए दिए जा रहे ऐसे आदेशों पर जल्द से जल्द अंकुश लगाने को कहा है।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की पीठ ने गुरमेल सिंह नामक व्यक्ति की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए उसे एहतियातन हिरासत में रखने का आदेश रद्द किया और तत्काल प्रभाव से उसे रिहा करने का आदेश दिया।

गुरमेल स्वापक औषधि एवं मन:प्रभावी पदार्थ (एनडीपीएस) अधिनियम के तहत दर्ज एक आपराधिक मामले में आरोपी था और उसे हिरासत में रखने का आदेश दो जनवरी, 2026 को उस समय पारित किया गया जब वह पहले से ही एनडीपीएस के एक मामले में न्यायिक हिरासत में था।

अदालत ने पाया कि यद्यपि हिरासत में रखने के आधारों में केवल यह कहा गया कि वह जमानत प्राप्त करने का प्रयास कर रहा है, हिरासत में लेने वाले अधिकारी ऐसे किसी ठोस सबूत या अपनी राय को रिकॉर्ड में दर्ज कराने में नाकाम रहे जिससे यह साबित हो सके कि व्यक्ति के जमानत पर रिहा होने की कोई निकट संभावना है।

अदालत ने कहा कि जब याचिकाकर्ता पहले से ही न्यायिक हिरासत में था तो उसे एहतियातन हिरासत में रखना क्यों जरूरी था।

अदालत ने कहा कि राज्य सरकार ने कानून की अनिवार्य जरूरतों को पूरा करने के लिए ऊपरी तौर पर काम किया।

अदालत ने कहा कि उन्होंने बस रस्म अदायगी तौर पर यह बताया कि याचिकाकर्ता को तस्करी में शामिल होने से रोकने के लिए उसे हिरासत में लेना जरूरी था।

अदालत ने कहा कि हिरासत में लेने वाले अधिकारी को ठोस सामग्री के आधार पर उचित रूप से संतुष्ट होना चाहिए कि जेल से रिहा होने पर व्यक्ति के कुछ आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने की आशंका है।

अदालत ने 31 जुलाई को अपने निर्णय में कहा कि “विश्वास करने का कारण” विश्वसनीय सामग्री और हिरासत में लिए गए व्यक्ति के जेल से रिहा होने पर स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने की वास्तविक संभावना पर आधारित होना चाहिए।

भाषा सं राजेंद्र शफीक

शफीक


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