अरावली विवाद: न्यायालय ने पर्यावरण मंत्रालय, अन्य से समिति के लिए विशेषज्ञों के नाम सुझाने को कहा
अरावली विवाद: न्यायालय ने पर्यावरण मंत्रालय, अन्य से समिति के लिए विशेषज्ञों के नाम सुझाने को कहा
नयी दिल्ली, 26 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को पर्यावरण मंत्रालय और अन्य हितधारकों से उस समिति के लिए क्षेत्र विशेषज्ञों के नाम सुझाने को कहा, जो अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषा तय करेगी।
न्यायालय ने कहा कि इस क्षेत्र में केवल वैध खनन की ही अनुमति होगी।
उच्चतम न्यायालय ने 20 नवंबर के फैसले में दिए गए अपने उन निर्देशों को 29 दिसंबर को स्थगित रखने का आदेश दिया था, जिसमें अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला की एक समान परिभाषा को स्वीकार किया गया था।
इसने कहा था कि कुछ ‘‘महत्वपूर्ण अस्पष्टताओं’’ को दूर करने की आवश्यकता है, जिनमें यह भी शामिल है कि क्या 100 मीटर की ऊंचाई और पहाड़ियों के बीच 500 मीटर का अंतर पर्यावरण संरक्षण के दायरे के एक महत्वपूर्ण हिस्से को कम कर देगा।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने बृहस्पतिवार को अपने पहले के स्थगन आदेश को फिलहाल के लिए बढ़ा दिया।
सुनवाई के दौरान, एक वादी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि कंपनी के पास वैध खनन लाइसेंस है और उसने एक लंबी लड़ाई के बाद खनन का अधिकार हासिल किया था और अब, इस अदालत के आदेश के कारण, वही काम रुका हुआ है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘हम केवल वैध खनन की अनुमति देंगे… (परिभाषा) विशेषज्ञों को बताने दीजिए। हम सभी बाधाओं को पार करके सही मंजिल तक पहुंचेंगे।’’
पीठ ने वकील जय चीमा से मामले की सुनवाई में सहायता करने का भी अनुरोध किया। वरिष्ठ अधिवक्ता के परमेश्वर पहले से ही न्याय मित्र के रूप में पीठ की सहायता कर रहे हैं।
पीठ ने कहा, ‘‘हम मंत्रालय (पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय) से अनुरोध करते हैं कि वे संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञों की एक समिति और उनके नामों का सुझाव दें।’’
पीठ ने कहा कि वह इस तथ्य से अवगत है कि सभी गतिविधियां, विशेष रूप से लाइसेंस प्राप्त कंपनियों द्वारा की जाने वाली खनन गतिविधियां, भी रुक गई हैं।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘हालांकि, कुछ प्रारंभिक मुद्दों का चरणबद्ध तरीके से समाधान होने तक फिलहाल ऐसी यथास्थिति बनाए रखनी होगी। इस मामले को समिति के गठन तक स्थगित किया जाता है।’’
उच्चतम न्यायालय की पीठ ने हितधारकों से 10 मार्च तक अपने लिखित सुझाव प्रस्तुत करने को भी कहा, क्योंकि न्यायमित्र ने अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषाओं के पहलू पर अपने सुझाव पीठ को सौंपे थे।
पीठ ने कहा कि वह विशेषज्ञों की समिति गठित करेगी और अगली सुनवाई की तारीख पर तय किये जाने वाले मुद्दों को निर्धारित करेगी।
इससे पूर्व पीठ ने कहा था कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि समिति की पिछली रिपोर्ट और फैसले में ‘‘कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों को स्पष्ट रूप से स्पष्ट करने में चूक हुई है’’ और अरावली क्षेत्र की पारिस्थितिकी अखंडता को कमजोर करने वाली किसी भी नियामकीय खामी को रोकने के लिए ‘‘आगे की पड़ताल की सख्त जरूरत है’’।
इसने यह भी निर्देश दिया था कि 9 मई, 2024 के आदेश के अनुसार, अगले आदेश तक, 25 अगस्त, 2010 की एफएसआई रिपोर्ट में परिभाषित ‘अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला’ में खनन के लिए इसकी पूर्व अनुमति के बिना कोई अनुमति नहीं दी जाएगी।
पीठ ने कहा था, ‘‘पर्यावरणविदों में काफी आक्रोश देखने को मिला है, जिन्होंने नयी स्वीकार की गई परिभाषा और इस न्यायालय के निर्देशों की गलत व्याख्या और अनुचित कार्यान्वयन की संभावना पर गहरी चिंता व्यक्त की है।’’
उच्चतम न्यायालय ने अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की एक समान परिभाषा को 20 नवंबर, 2025 को स्वीकार कर लिया था तथा विशेषज्ञों की रिपोर्ट आने तक दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान एवं गुजरात में फैले इसके क्षेत्रों में नए खनन पट्टे देने पर रोक लगा दी थी।
इसने विश्व की सबसे पुरानी पर्वत प्रणाली की सुरक्षा के लिए अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषा पर पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की एक समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया था।
समिति ने अनुशंसा की थी कि अरावली पहाड़ी की परिभाषा अरावली जिलों में स्थित ऐसी किसी भी भू-आकृति के रूप में की जाए, जिसकी ऊंचाई स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर या उससे अधिक हो; और और ‘‘अरावली पर्वतमाला’’ एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर दो या अधिक ऐसी पहाड़ियों का संग्रह होगा।
भाषा
देवेंद्र माधव
माधव

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