कोलकाता, दो सितंबर (भाषा) कोलकाता के मोमिनपुर में जन्माष्टमी का जश्न शहर की मिली-जुली संस्कृति का एक बड़ा उदाहरण रहा है, जहां मुस्लिम निवासी इस हिंदू त्योहार के आयोजन में अहम भूमिका निभाते आए हैं। लेकिन इस साल इसमें एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है; भाजपा के एक नेता ने इस आयोजन की कमान संभाली है और घोषणा की है कि इसकी आयोजन समिति में केवल हिंदू ही शामिल होंगे।
इस कदम ने भूकैलाश रोड-हुसैन शाह रोड चौराहे पर लगभग 60 साल पुराने जश्न को धर्म, राजनीति और मिल-जुलकर मनाए जाने वाले त्योहारों के मायने को लेकर एक अप्रत्याशित विवाद का केंद्र बना दिया है। खासकर एक ऐसे शहर में जहां अलग-अलग समुदाय पारंपरिक रूप से एक-दूसरे के सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजनों में शामिल होते रहे हैं।
हाल ही में हुए पश्चिम बंगाल चुनावों में पोर्ट विधानसभा क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी के हारे हुए उम्मीदवार राकेश सिंह ने कहा कि अब से यह त्योहार सिर्फ हिंदू ही आयोजित करेंगे। उनका तर्क था कि जन्माष्टमी हिंदुओं का धार्मिक त्योहार है और इसकी परंपराओं की रक्षा की जानी चाहिए।
सिंह ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “हम आपसी सद्भाव में विश्वास करते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम किसी को अपने धर्म या रीति-रिवाजों का अपमान करने देंगे। जन्माष्टमी हिंदुओं का त्योहार है और इसे हिंदुओं द्वारा ही मनाया जाना चाहिए।”
इस साल आयोजन समिति के प्रमुख सिंह ने दावा किया कि पिछले सालों में मुसलमानों का ही इस उत्सव पर पूरा नियंत्रण था।
उन्होंने कहा, “18 सदस्यों वाली समिति में 16 मुसलमान थे। इस बार मैंने समिति में बदलाव किया है और इसे पूरी तरह से हिंदुओं की समिति बना दिया है। हम नहीं चाहते कि वे हमारे उत्सव का हिस्सा बनें।”
उन्होंने उन रीति-रिवाजों में मुसलमानों की भागीदारी पर भी आपत्ति जताई जिनमें भगवान कृष्ण के साथ गाय की पूजा की जाती है। उन्होंने मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्गों में गाय की बलि देने की प्रथा का हवाला दिया।
सिंह ने कहा, “दूसरे धर्मों के लोगों को जरूर पंडालों में जाना चाहिए, लेकिन अपनी धार्मिक गतिविधियों की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है।”
भाजपा नेता ने पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अक्सर दोहराई जाने वाली बात – कि “धर्म व्यक्ति का निजी मामला है, लेकिन त्योहार सबके होते हैं” – पर भी निशाना साधा और इसे “बेतुका” बताया।
सिंह ने तृणमूल कांग्रेस के पूर्व मंत्री और कोलकाता के महापौर फिरहाद हकीम को भी इसके लिए जिम्मेदार ठहराया है, जो इस आयोजन से जुड़े रहे हैं। सिंह का आरोप है कि हकीम ने मुसलमानों को इसके प्रबंधन में अहम भूमिका देकर त्योहार के हिंदू स्वरूप को कमजोर करने की कोशिश की है।
इस जगह की वजह से यह विवाद और भी अहम हो गया है।
यह जश्न केएमसी वार्ड 79 में भूकैलाश रोड-हुसैन शाह रोड चौराहे पर मनाया जाता है, जो पोर्ट विधानसभा क्षेत्र में और भवानीपुर के पास है।
इस इलाके में दशकों से हिंदू और मुस्लिम समुदाय साथ-साथ रहते आए हैं, जिससे हर साल होने वाला जन्माष्टमी का जश्न, धार्मिक सीमाओं से परे पड़ोसियों की भागीदारी का एक जाना-पहचाना उदाहरण बन गया है।
इसका अपना इतिहास उस परंपरा को दर्शाता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, यह पूजा लगभग 60 साल पहले मुस्लिम समाज सेवक मोहम्मद काशिम ने किद्दरपुर समाज कल्याण समिति के बैनर तले शुरू की थी।
जब इन उत्सवों का पहले जैसा महत्व धीरे-धीरे कम हो गया, तो 2011 में सरकार बदलने के बाद मुस्लिम युवाओं के एक समूह ने इन्हें फिर से शुरू करने में मदद की।
तृणमूल कांग्रेस के पदाधिकारी और आयोजन समिति के पूर्व सदस्य मोहम्मद आलम ने कहा कि समुदाय की भागीदारी को कभी भी पूजा के हिंदू स्वरूप के विपरीत नहीं माना गया।
आलम ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, “हमने सब कुछ मिलकर आयोजित किया, रीति-रिवाजों का पालन किया और प्रसाद बांटा। धार्मिक रीति-रिवाजों से समझौता करने का सवाल ही नहीं उठता था।”
हालांकि, इस साल समिति का गठन काफी बदल गया है और इसमें मुस्लिम सदस्यों को शामिल नहीं किया गया है।
आलम ने कहा, “इतने सालों से हम इसे साथ मिलकर मनाते आ रहे थे। इस बार समिति में किसी भी मुस्लिम सदस्य को नहीं रखा गया है।”
भाषा प्रशांत मनीषा
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