बंधक हाथियों की सही देखरेख हो, उन्हें भी मिले दैवीय सम्मान: शीर्ष अदालत

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बंधक हाथियों की सही देखरेख हो, उन्हें भी मिले दैवीय सम्मान: शीर्ष अदालत

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  • Publish Date - August 18, 2026 / 08:49 PM IST,
    Updated On - August 18, 2026 / 08:49 PM IST

नयी दिल्ली, 18 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि हाथियों को देव स्वरूप मानकर उनका सम्मान किया जाना चाहिए। न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि देशभर में कैद करके रखे गए हाथियों की सही देखभाल और स्वास्थ्य जांच होनी चाहिए।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) ‘वाइल्डलाइफ रेस्क्यू एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर’ की एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि शीर्ष अदालत मंदिरों में रखे गये हाथियों के इस्तेमाल से जुड़े धार्मिक अधिकारों या आस्था के मामलों में दखल नहीं देगी।

पीठ ने कहा कि उसका मकसद सिर्फ़ जानवर की सही देखभाल सुनिश्चित करना है और निजी लोगों, मंदिरों, वन विभागों, चिड़ियाघरों और पुनर्वास केंद्रों को अपने यहां रखे गये हाथियों के लिए देखभाल का बेहतर तरीका अपनाना चाहिए।

शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘हम इस बात में नहीं जा रहे हैं कि कोई मंदिर हाथी रख सकता है या नहीं। हम किसी भी व्यक्तिगत अधिकारों या धार्मिक अधिकारों पर चर्चा नहीं कर रहे हैं। हमें धार्मिक अधिकारों और इस क्षेत्र में लागू अन्य कानूनों के बीच सामंजस्यपूर्ण ढंग से तालमेल बिठाने की आवश्यकता है।’’

पीठ ने यह भी कहा कि देवताओं के प्रति सम्मान का भाव हाथियों के मामले में भी दिखाया जाना चाहिए।

न्यायालय ने केंद्र को आवश्यकतानुसार अनिवार्य दिशानिर्देश जारी करने और संबंधित राज्यों के साथ इस मामले को उठाने का निर्देश दिया, ताकि विशेष सुविधाओं वाले हाथी क्लीनिकों की स्थापना के लिए एक प्रभावी और पारदर्शी व्यवस्था शुरू की जा सके। हाथी मालिकों को इन क्लिनिकों में अपने हाथियों को समय-समय पर जांच के लिए ले जाना अनिवार्य किया जाएगा।

शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रत्येक बंधक हाथी का उचित मेडिकल रिकॉर्ड ठीक से बनाए रखा जाना चाहिए और निगरानी समिति यह सुनिश्चित करेगी कि जहां भी आवश्यकता हो, नियमित रूप से इलाज उपलब्ध कराया जाए।

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने ‘‘बंधक हाथियों की स्वास्थ्य देखभाल और कल्याण समिति’’ (सीईएचडब्ल्यूसी) की कार्यवाही पर 25 फरवरी का एक कार्यालय ज्ञापन रिकॉर्ड पर रखा।

दस्तावेज के अनुसार, देश में बंधक हाथियों की संख्या बढ़कर 2,725 हो गई है, जिनमें से 1,678 हाथी निजी व्यक्तियों के पास थे, 47 सर्कस में, 96 मंदिरों में, 768 वन विभागों के पास, 63 चिड़ियाघरों में और 332 पुनर्वास केंद्रों में थे।

याचिकाकर्ता एनजीओ की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अपर्णा भट ने दलील दी कि 2019 से अबतक करीब 300 हाथियों को बंधक बनाया गया, जबकि लगभग 200 हाथियों की जान चली गई।

केरल के मंदिरों के प्रबंधन निकायों की ओर से हस्तक्षेप करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने कहा कि राज्य में जब भी कोई त्योहार होता है, तब हर बार ऐसी याचिकाएं अदालतों में आ जाती हैं।

उन्होंने कहा कि केरल के मंदिरों में बंधक हाथियों की अच्छी देखभाल की जाती है, जिसमें उनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए रेडियो टैगिंग भी शामिल है।

परमेश्वर ने कहा कि हाथियों के स्वास्थ्य और रखरखाव से जुड़े नियम बहुत सख्त हैं और उनका पूरी तरह से पालन किया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि केरल के मंदिर उत्सवों में हाथियों का उपयोग आस्था का एक अनिवार्य हिस्सा है।

भट ने इस दलील पर आपत्ति जताई और कहा कि उनकी याचिका का किसी भी धार्मिक मामले से कोई लेनादेना नहीं है।

हालांकि, उन्होंने रेखांकित किया कि धार्मिक जुलूसों में इस्तेमाल में होने वाले हाथी निजी व्यक्तियों के स्वामित्व में होते हैं और उत्सव समाप्त होने के बाद, उन्हें उनके मालिकों को वापस लौटा दिया जाता है।

उन्होंने दलील दी कि एनजीओ की याचिका मुख्य रूप से उन शारीरिक प्रताड़नाओं पर केंद्रित थी जो बंधक हाथियों को व्यावसायिक और भीख मांगने जैसी अन्य गतिविधियों में इस्तेमाल किए जाने के दौरान झेलनी पड़ती हैं।

पीठ ने पर्यावरण मंत्रालय की ‘प्रोजेक्ट एलीफेंट’ पहल के तहत गठित सीईएचडब्ल्यूसी को बंधक हाथियों के हित में प्रस्तावित किए जा रहे उपायों की स्थिति पर एक रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया।

शीर्ष अदालत ने कहा कि यह समिति ऐसे हाथियों के रहने के स्थान और रखरखाव के लिए न्यूनतम मानक तय करेगी।

पीठ ने देश में मौजूद बंधक हाथियों की डीएनए प्रोफाइलिंग की वर्तमान स्थिति पर भी एक वस्तुस्थिति रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया।

शीर्ष अदालत ने एनजीओ की इस दलील को मानने से इनकार कर दिया कि अब और हाथियों को कैद में नहीं रखा जाना चाहिए।

भाषा सुरेश वैभव

वैभव