फॉर्म-6 में बदलाव ‘अवैध’, निर्वाचन आयोग में मतभेद ‘बेहद गंभीर’: पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त ओपी रावत

फॉर्म-6 में बदलाव ‘अवैध’, निर्वाचन आयोग में मतभेद ‘बेहद गंभीर’: पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त ओपी रावत

फॉर्म-6 में बदलाव ‘अवैध’, निर्वाचन आयोग में मतभेद ‘बेहद गंभीर’: पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त ओपी रावत
Modified Date: September 23, 2026 / 01:26 pm IST
Published Date: September 23, 2026 1:26 pm IST

नयी दिल्ली, 23 सितंबर (भाषा) पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त ओपी रावत ने बुधवार को कहा कि वैधानिक मतदाता पंजीकरण फॉर्म-6 में किए गए बदलाव ‘‘पूरी तरह गलत और अवैध’’ हैं तथा उन्होंने निर्वाचन आयोग के भीतर मतभेद सामने आने को ‘‘बेहद गंभीर’’ और ‘‘दुर्भाग्यपूर्ण’’ बताया।

अंग्रेजी दैनिक ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने एक खबर दी है कि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने उनकी जानकारी के बिना जारी किए गए फैसलों और आदेशों पर बार-बार आपत्ति जतायी थी।

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए रावत ने कहा कि निर्वाचन आयोग में ऐसी स्थिति ‘‘शायद ही कभी’’ उत्पन्न हुई होगी।

उन्होंने कहा कि मतदाता सूची का सॉफ्टवेयर क्षेत्रीय अधिकारियों के फैसलों को दरकिनार नहीं कर सकता।

रिपोर्ट के अनुसार, दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार मतदाताओं के पंजीकरण और नाम हटाने से लेकर फॉर्म-6 में बदलाव तथा मतदाता सूची के डेटाबेस पर नियंत्रण को केंद्रीकृत करने जैसे मुद्दों पर आपत्ति दर्ज की।

जनवरी से दिसंबर 2018 तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त रहे रावत ने ‘पीटीआई-वीडियो’ से बातचीत में कहा, ‘‘यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। निर्वाचन आयोग में ऐसा शायद ही कभी हुआ होगा। मैं भी वहां रहा हूं, लेकिन मैंने देखा कि फैसले हमेशा सर्वसम्मति से लिए जाते थे।’’

उन्होंने कहा, ‘‘एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) के जरिये एक ऐसी व्यवस्था खड़ी हो गई है, जो अब खुद ही मतदाताओं के बीच डर पैदा कर रही है। यह अच्छी बात नहीं है। हमारे लोकतंत्र के लिए यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।’’

पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने कहा कि फॉर्म-6 को लेकर सामने आई आपत्तियां विशेष रूप से गंभीर हैं, क्योंकि दोनों निर्वाचन आयुक्तों का कहना था कि निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 में संशोधन किए बिना वैधानिक फॉर्म में बदलाव नहीं किया जा सकता।

रिपोर्ट के अनुसार, जोशी ने मई में दर्ज अपनी आपत्ति में कहा था कि एसआईआर के लिए जारी निर्देशों के जरिये फॉर्म-6 में बदलाव नहीं किया जा सकता और ‘‘कानूनी रूप से टिकाऊ’’ रास्ता यही होगा कि नियमों में संशोधन के लिए प्रस्ताव सरकार को भेजा जाए। संधू ने भी इस पर सहमति जताई थी।

हालांकि, बाद में ऑनलाइन फॉर्म-6 में नए मतदाता आवेदनों को एसआईआर से जोड़ने वाली एक घोषणा शामिल कर दी गई। रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त में संधू ने आपत्ति दर्ज करायी कि यह बदलाव ‘‘अनधिकृत और अवैध’’ है तथा इसे तुरंत हटाया जाना चाहिए।

रावत ने कहा, ‘‘निर्वाचन आयुक्तों ने जो कहा है कि फॉर्म-6 में गलत तरीके से संशोधन किया गया, कानून में इसका कोई प्रावधान नहीं है, उनकी राय नहीं ली गई और कोई बैठक नहीं हुई- ये बहुत गंभीर आरोप हैं। जिस तरह फॉर्म-6 में संशोधन किया गया है, वह गलत है। यह पूरी तरह गलत और अवैध है।’’

उन्होंने मतदाता सूची के डेटाबेस पर नियंत्रण को कथित तौर पर केंद्रीकृत किए जाने की भी कड़ी आलोचना की। रिपोर्ट के अनुसार, स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने निर्वाचन आयोग के सूचना प्रौद्योगिकी तंत्र की निगरानी में बदलाव को लेकर कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन से अलग-अलग संपर्क किया।

रावत ने कहा, ‘‘अगर सॉफ्टवेयर इस तरह बनाया गया है कि क्षेत्रीय अधिकारी किसी बदलाव को जरूरी मानते हों, लेकिन वे असहाय हों क्योंकि सॉफ्टवेयर उन्हें बदलाव करने की अनुमति नहीं देता, तो यह पूरी तरह अवैध और गलत है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘किसी को भी सभी शक्तियों पर एकाधिकार रखने और यह कहने का अधिकार नहीं है कि हम सॉफ्टवेयर बनाएंगे और सॉफ्टवेयर जो कहेगा, वही करना होगा। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ और ऐसा कभी होना भी नहीं चाहिए।’’

रावत ने कहा कि इन घटनाक्रमों से एसआईआर को लेकर राजनीतिक दलों द्वारा उठाए गए सवालों के बीच निर्वाचन आयोग पर जनता के भरोसे को और नुकसान पहुंचने का खतरा है।

उन्होंने कहा, ‘‘जिस संस्था पर लोगों ने भरोसा किया है और जिसने हमेशा स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनाव कराए हैं, उस पर उनका भरोसा पूरी तरह टूटता जा रहा है।’’

रावत ने कहा कि संवैधानिक संस्था के सदस्यों के रूप में दोनों निर्वाचन आयुक्तों की भी जिम्मेदारी थी कि वे उन कार्रवाइयों को रोकें जिन्हें वे अनुचित मानते हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘यह सवाल भी उठेगा कि वे 10 महीने तक चुप क्यों रहे। उन्होंने पहले यह मुद्दा क्यों नहीं उठाया? वे भी एक संवैधानिक संस्था के पदाधिकारी हैं। यह उनकी जिम्मेदारी है कि एक भी गलती न होने दें।’’

संधू और जोशी में से किसी ने भी सामने आए मतभेदों या अपनी आपत्तियों के बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 के तहत आयोग के कामकाज को यथासंभव सर्वसम्मति से संचालित किया जाना जरूरी है। यदि सदस्यों के बीच मतभेद हो, तो मामले का फैसला बहुमत की राय के आधार पर किया जाता है।

बहरहाल, निर्वाचन आयोग के सूत्रों ने बुधवार को कहा कि एसआईआर से जुड़े फैसलों समेत आयोग के सभी फैसले मतभेदों के बावजूद सर्वसम्मति से और तीनों निर्वाचन आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए थे।

भाषा गोला मनीषा

मनीषा


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