प्रधान न्यायाधीश ने भारतीय मध्यस्थता परिषद के गठन में देरी को लेकर चिंता जताई

प्रधान न्यायाधीश ने भारतीय मध्यस्थता परिषद के गठन में देरी को लेकर चिंता जताई

प्रधान न्यायाधीश ने भारतीय मध्यस्थता परिषद के गठन में देरी को लेकर चिंता जताई
Modified Date: July 11, 2026 / 06:50 pm IST
Published Date: July 11, 2026 6:50 pm IST

नयी दिल्ली, 11 जुलाई (भाषा) प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने भारतीय मध्यस्थता परिषद के गठन में हो रही देरी पर चिंता जताते हुए शनिवार को उम्मीद जताई कि अब संसद में इस संबंध में एक विधेयक पेश किया जाएगा।

प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) ने भारतीय मध्यस्थता एवं माध्यस्थम संस्थान के रजत जयंती कार्यक्रम में इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत वैकल्पिक विवाद निवारण को न्याय का कोई कमतर विकल्प नहीं, बल्कि न्याय पाने के सामान्य तरीकों में से एक के तौर पर अपनाने की दिशा में बढ़ रहा है।

उन्होंने कहा कि संस्थानों को ‘ग्रेड’ देने और मध्यस्थों को मान्यता देने के लिए 2019 के संशोधन के जरिए भारतीय मध्यस्थता परिषद का सृजन किया गया।

सीजेआई ने कहा, ‘‘छह साल बाद भी इसका गठन नहीं हो पाया है। विश्वनाथन समिति की सिफारिशों के आधार पर अक्टूबर 2024 में सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किया गया ‘मध्यस्थता और सुलह (संशोधन) विधेयक’ का मसौदा अभी भी सिर्फ मसौदा ही बना हुआ है, और उम्मीद है कि इसका नया स्वरूप संसद में पेश किया जा रहा।’’

उन्होंने कहा, ‘‘अगर हमारा मकसद एक पसंदीदा जगह बनना है, तो घोषणा और उसे लागू करने के बीच का यह अंतर ही असल में विश्वसनीयता की वह कमी है जिसे सिर्फ कानून बनाकर दूर नहीं किया जा सकता।’’ उन्होंने यह भी कहा कि विश्वसनीयता सिर्फ फैसलों से नहीं बनती।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि अदालतें अधिकारों की अहम संरक्षक बनी हुई हैं, लेकिन पांच करोड़ से अधिक मामले लंबित होने के कारण, इस लंबित काम का कुछ हिस्सा अदालत के बाहर निपटाना होगा।

उन्होंने कहा कि मध्यस्थता, माध्यस्थम और डिजिटल विवाद समाधान का एकमात्र मकसद भरोसे का एक ऐसा तंत्र बनाना है, जिससे पक्षकारों को यह यकीन हो सके कि पारंपरिक अदालत के बाहर भी उन्हें निष्पक्ष, समय पर और लागू होने योग्य समाधान मिल सकता है।

उन्होंने कहा, ‘‘इस समस्या की गंभीरता को स्पष्ट रूप से समझना जरूरी है। भारतीय अदालतों में वर्तमान में पांच करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें से कम से कम आधे मामले काफी पुराने लंबित मामले हैं, जिनमें से अधिकांश मामले जिला और निचली अदालतों में लंबित हैं।’’

उन्होंने कहा कि ज्यादातर अनुमानों के अनुसार, इन लंबित मामलों में लगभग आधे मामलों में सरकारी विभाग और सार्वजनिक संस्थान पक्षकार हैं। कुल लंबित मामलों में से करीब 20 प्रतिशत हिस्सा जमीन और संपत्ति विवादों से जुड़ा है, जिनमें कार्यवाही अक्सर मूल पक्षकारों के जीवनकाल से भी आगे तक चलती है।’’

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि आधुनिक न्याय व्यवस्था में अब मध्यस्थता केंद्र, मध्यस्थता संस्थान, ऑनलाइन विवाद समाधान मंच, सामुदायिक मध्यस्थता और हाइब्रिड प्रक्रियाएं शामिल हैं।

भाषा सुभाष माधव

माधव


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