बच्चों को ‘केवल साक्ष्य की वस्तु’ की तरह नहीं माना जा सकता है: उच्चतम न्यायालय
बच्चों को ‘केवल साक्ष्य की वस्तु’ की तरह नहीं माना जा सकता है: उच्चतम न्यायालय
नयी दिल्ली, 11 जून (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में बृहस्पतिवार को कहा कि बच्चों को “केवल साक्ष्य की वस्तु’’ की तरह नहीं माना जा सकता है और अलग हो चुके माता-पिता के बीच अभिरक्षा और मुलाकात अधिकारों से जुड़े विवादों में परस्पर विरोधी दावों को पूरा करने के लिए बच्चों का मनोवैज्ञानिक या मनोरोग संबंधी मूल्यांकन मनमाने तरीके से नहीं कराया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने उन मामलों के निपटारे के लिए कई निर्देश जारी किए, जिनमें नाबालिग बच्चों का मनोवैज्ञानिक या मनोरोग संबंधी मूल्यांकन किया जाता है और जो अभिरक्षा और मुलाकात अधिकार से जुड़े विवादों से उत्पन्न होते हैं।
ये निर्देश पीठ द्वारा उस फैसले में जारी किए गए, जिसमें मुंबई उच्च न्यायालय के आदेश में संशोधन किया गया और उन प्रमुख निर्देशों को रद्द कर दिया गया, जिनके तहत मनोवैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की चार सदस्यीय एक समिति को उस लड़की का मूल्यांकन करने की अनुमति दी गई थी, जिसके पिता पर यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत आरोप लगे हैं।
न्यायमूर्ति सिंह ने 65 पृष्ठों के फैसले में नेल्सन मंडेला को उद्धृत किया, जिन्होंने कहा था, ‘‘किसी समाज की आत्मा का इससे बेहतर प्रकटीकरण और कोई नहीं हो सकता कि वह अपने बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करता है।’’
पीठ ने कहा कि किसी बाल पीड़ित का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन केवल इसलिए कि माता-पिता या रिश्तेदारों के बीच अभिरक्षा और मुलाकात अधिकार के विवाद हैं, एक सामान्य प्रक्रिया के रूप में मनमाने ढंग से आदेशित नहीं किया जाना चाहिए।
इसने कहा, ‘‘बच्चे से संबंधित किसी भी ऐसी मूल्यांकनात्मक प्रक्रिया का निर्देश देने से पहले, अदालत को विशिष्ट कारण दर्ज करने होंगे, जिनसे यह स्पष्ट हो कि ऐसे मूल्यांकन की आवश्यकता क्यों है, इसका उद्देश्य क्या है, प्रस्तावित प्रक्रिया की प्रासंगिकता क्या है।’’
फैसले में कहा गया कि अदालतों को बाल पीड़ितों के साथ मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन का निर्देश देते समय “न्यूनतम हस्तक्षेप और न्यूनतम संपर्क” के सिद्धांत को अपनाना चाहिए।
फैसले में कहा गया है कि जहां मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन आवश्यक माना जाता है, वहां आमतौर पर इसे एक स्वतंत्र और अदालत द्वारा नियुक्त बाल मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक द्वारा किया जाना चाहिए।
पीठ ने कहा कि मूल्यांकन प्रक्रिया बाल-केंद्रित और कल्याण-उन्मुख रहनी चाहिए।
अदालत ने कहा कि बच्चे की पहचान, मूल्यांकन के दौरान किए गए खुलासे, चिकित्सीय अभिलेख और मूल्यांकन रिपोर्ट को पूर्णतः गोपनीय रखा जाना चाहिए।
इसने कहा, ‘‘मूल्यांकन के दौरान बनाए गए ऑडियो या वीडियो रिकॉर्डिंग और चिकित्सीय सामग्री को सामान्यतः पक्षकारों के लिए सीधे उपलब्ध नहीं कराया जाएगा।’’
अदालत ने हालांकि स्पष्ट किया कि टिप्पणियों को हर मामले में यांत्रिक रूप से लागू किए जाने वाले संपूर्ण दिशानिर्देशों के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए।
यह विवाद एक लड़की के माता और पिता के बीच हुआ था। मां ने आरोप लगाया था कि 2018 से 2019 के बीच अमेरिका में उनके साथ रहने के दौरान, उसके पति ने लड़की का यौन शोषण किया था।
भारत लौटने के बाद, पिता के खिलाफ पॉक्सो अधिनियम के तहत एक मामला दर्ज किया गया था।
पिता ने आरोपों से इनकार करते हुए दावा किया था कि ये आरोप वैवाहिक कलह के कारण गढ़े गए थे।
शीर्ष अदालत ने कहा कि भावनात्मक स्थिरता, मानसिक सुरक्षा, गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य बच्चे के कल्याण की अवधारणा के महत्वपूर्ण घटक हैं।
अदालत ने कहा कि बच्चे के मनोवैज्ञानिक से बातचीत के बाद, अदालत द्वारा नियुक्त मनोवैज्ञानिक को परिवार न्यायालय में एक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
भाषा देवेंद्र रंजन
रंजन

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